श्री रवि रतलामी समकालीन हिंदी इंटरनेट में एक जाना पहचाना नाम है । उनकी उपस्थिति अंतरजाल पर एक लेखक के रूप में भी है और ग़ज़लकार के रूप में भी । आप हिंदी का कोई भी महत्वपूर्ण शब्द सर्च इंजन में डालिए-जानकारी खंगालने के लिए, आपको उपलब्ध कराई गई सूची में कहीं न कहीं रवि रतलामी या रवि श्रीवास्तव का नाम और उनके द्वारा प्रयुक्त हिंदी का काम दिख ही जायेगा । वे अंतरजाल पर उस दौर से सक्रिय इंजीनियर हैं जब कम्पयूटर और इंटरनेट पर हिंदी देखने को लोग तरस जाते थे । मूलतः छत्तीसगढ़ की सोंधी मिट्टी के गंध से सने रवि ज्ञान को सीमित रखने के आदी नहीं वे उसे संपूर्ण विश्व में बाँटने के पक्षधर रहे हैं । रवि जी हिंदी के कई प्रतिष्ठित वेबसाईटों के नियमित स्तम्भकार भी हैं । आज परिकल्पना ब्लॉग उत्सव हेतु हिंदी ब्लोगिंग की दिशा-दशा पर वेबाक राय दे रहे हैं  हिंदी के बहुचर्चित ब्लोगर श्री रवि रतलामी ---


(१) आपकी नज़रों में साहित्य-संस्कृति और समाज का वर्त्तमान स्वरुप क्या है?

इस विषय पर मैं कोई अथॉरिटी या प्रवक्ता नहीं हूँ, मगर समाज का वर्तमान स्वरूप भयावह प्रतीत होता है. एक तरफ तो वर्जना विहीन मेट्रो कल्चर विकसित हो रहा है तो दूसरी ओर खाप पंचायतें बाकायदा सुनियोजित मर्डर कर रही हैं और उन्हें सरकारी, राजनैतिक संरक्षण प्राप्त हो रहा है. अलबत्ता साहित्य संस्कृति अभी भी थोड़े से जागृत प्रतीत होते हैं. मगर वह दिन दूर नहीं जब इनमें भी प्रदूषण फैलने लगेगा तेजी से. धर्म का चोला ओढ़े गरबा संस्कृति इसका प्रमाण है.


(२) हिंदी ब्लोगिंग की दिशा दशा पर आपकी क्या राय है ?

हिन्दी ब्लॉगिंग शैशवा-वस्था से आगे निकल कर किशोरावस्था को पहुँच रही है. अलबत्ता इसे मैच्योर होने में बरसों लगेंगे. अंग्रेज़ी के गुणवत्ता पूर्ण (हालांकि वहाँ भी अधिकांश - 80 प्रतिशत से अधिक कचरा और रीसायकल सामग्री है,), समर्पित ब्लॉगों की तुलना में हिन्दी ब्लॉगिंग पासंग में भी नहीं ठहरता. मुझे लगता है कि तकनीक के मामले में हिन्दी कंगाल ही रहेगी. बाकी साहित्य-संस्कृति से यह उत्तरोत्तर समृद्ध होती जाएगी - एक्सपोनेंशियली.


(३) आपकी नज़रों में हिंदी ब्लोगिंग का भविष्य कैसा है ?

बेहद उज्जवल. हिन्दी के नए सूर और तुलसी ब्लॉगिंग के जरिए ही पैदा होंगे, यकीनन.


(४) हिंदी के विकास में इंटरनेट कितना कारगर सिद्ध हो सकता है ?

इंटरनेट तकनालाजी ने भाषाई बंधन को समाप्त किया है. आज आप भारतीय लिपि को परिवर्तित कर पढ़ सकते हैं. कम्प्यूटर से हिन्दी-उर्दू लिपि में आपसी रूपांतरण संभव होने लगा है यानी उर्दू सामग्री भी अब देवनागरी में एक क्लिक पर उपलब्ध रहेगी. देवनागरी लिपि न जानने वाले एक क्लिक से रोमन में पढ़ और फ़ोनेटिक रोमन में लिख पा रहे हैं. ये सब हिन्दी के विकास के काम ही आ रहे हैं. कम्प्यूटर व इंटरनेट ने पिछले पांच साल में हिन्दी के विकास के लिए जितना किया उतना पिछले पच्चीस साल में भी तमाम जतन करके नहीं हुआ था. नेट पर तमाम किताबें, सामग्री, पठन-पाठन के औजार चहुँओर से चले आ रहे हैं. इनमें से बहुत से मुफ़्त भी हैं. नए हार्डवेयरों / कम्प्यूटिंग उपकरणों / मोबाइलों में जब अंतर्निर्मित हिन्दी आने लगेगी तो परिदृष्य और तेजी से बदलेगा.

(५) आपने ब्लॉग लिखना कब शुरू किया और उस समय की परिस्थितियाँ कैसी थी ?

जून 2004 से मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया तब मुश्किल से हिन्दी के (यूनिकोड हिन्दी के) दर्जन भर ब्लॉग थे. जब भी हम कोई पोस्ट लिखते तो कभी कोई 5 या कोई 10 लोग ही पढ़ते थे. नेट पर हिन्दी में सामग्री थी ही नहीं. तब मैंने एक प्रण लिया था कि रोज एक पोस्ट हिन्दी में लिखूंगा. कम से कम सामग्री तो एकत्र होगी. तब बीबीसी हिन्दी का पन्ना भी यूनिकोड हिन्दी में होता था. उस समय कोई भी कुछ भी यूनिकोड हिन्दी में गूगल पर (गूगल में यूनिकोड हिन्दी में सर्च की सुविधा तब आ चुकी थी) सर्च करता था तो जाहिर है, सामग्री की प्रचुरता के लिहाज से या तो बीबीसी हिन्दी का पन्ना खुलता था या मेरे ब्लॉग का. उस समय कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखने पढ़ने के लिए तमाम जुगाड़ करने पड़ते थे. इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर कई फोरम तो बने ही, मैंने उन खास हिन्दी संबंधी कम्प्यूटिंग तकनीकों को अपने ब्लॉग पर सहेजना प्रारंभ किया जो अब तक जारी है.


(६) आप तो स्वयं साहित्यकार हैं, एक साहित्यकार जो गंभीर लेखन करता है उसे ब्लॉग लेखन करना चाहिए या नहीं ?

बिलकुल. हर साहित्यकार को अपनी रचना नेट पर डालनी ही चाहिए. हम लिखते किसलिए हैं? जाहिर है कि लोग पढ़ें. लेखन से कमाई की बात तो बाद में आती है. तो यदि लेखन से किसी कॉपीराइट या रॉयल्टी इत्यादि की समस्या नहीं आती हो तो हर लेखक को अपनी तमाम रचनावली नेट पर डालना ही चाहिए. अब चाहे वो ब्लॉग के जरिए हो या स्वयं के डोमेन पर. और ब्लॉग जैसा सस्ता सुंदर और टिकाऊ माध्यम कहीं नहीं मिलेगा.


(७) विचारधारा और रूप की भिन्नता के वाबजूद साहित्य की अंतर्वस्तु को संगठित करने में आज के ब्लोगर सफल हैं या नहीं ?

अगर आप फ़ालतू के हल्ला मचाते ब्लॉगों-पोस्टों से निगाह हटा लें, तो आप पाएंगे कि हर स्तर पर स्तरीय सामग्री, बल्कि बेहद प्रयोगधर्मी सामग्री की प्रचुरता है. लोग उपहास में कहते फिरते हैं कि जो चीजें प्रिंट में छपने लायक नहीं होतीं वो ब्लॉग में अवरतिर होती हैं. मगर दरअसल प्रिंट में छापने वाले कमजोर - कोवार्ड होते हैं जो ऐसी चीजें छाप ही नहीं सकते. ब्लॉग तो भाषाई एक्सपेरीमेंट का प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ हर रूप और विचारधारा के लिए समान प्लेटफ़ॉर्म सदैव उपलब्ध रहेगा. देरी है तो इसके पूरे दोहन की.

(८) आज के रचनात्मक परिदृश्य में अपनी जड़ों के प्रति काव्यात्मक विकलता क्यों नहीं दिखाई देती ?

मेरे विचार में विकलता तो है, स्कैटर्ड है, इधर उधर बिखरी पड़ी है. बस वह प्रकट नहीं हो पा रही है सही तरीके से. काव्यात्मक विकलता को रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत करने का सुंदर माध्यम ब्लॉग के अलावा और क्या हो सकता है भला?


(९) आपकी नज़रों में साहित्यिक संवेदना का मुख्या आधार क्या होना चाहिए ?

साहित्यिक संवेदना का मुख्य आधार तो जग जाहिर है - भारतेंदु के अंधेर नगरी से लेकर श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी तक - सामाजिक विषमताओं विसंगतियों दुरूहों की पड़ताल की जाए, उन्हें साहित्य के जरिए समाज के सामने आइना दिखाते हुए रखा जाए ताकि विसंगतिया, विद्रूपताएँ दूर हों.


(१०) आज की कविता की आधुनिकता अपनी देसी जमीन के स्पर्श से वंचित क्यों है ?

नो कमेंट. इस विषय पर मेरी पकड़ नहीं है. यदा कदा मैं ग़ज़ल नुमा कुछ तुकबंदी करता हूं, जिसे मैंने व्यंज़ल नाम दिया है.


(११) क्या हिंदी ब्लोगिंग में नया सृजनात्मक आघात देने की ताक़त छिपी हुई है ?

बिलकुल. मैंने पहले ही कहा हिन्दी का अगला सूर और तुलसी ब्लॉगिंग के जरिए ही पैदा होंगे.


(१२) कुछ अपनी व्यक्तिगत सृजनशीलता से जुड़े कोई सुखद संस्मरण बताएं ?

कुछ समय पहले मेरे एक मित्र (जो लिनक्स का बड़ा जानकार है) के पास एक व्यक्ति पहुँचा और उसने बताया कि वो हिन्दी में लिनक्स सिखाने का उद्यम खोल रहा है. उसे थोड़ा समर्थन और आशीर्वाद चाहिए. उस व्यक्ति ने मित्र को नेट से मुफ़्त में उतारी हिन्दी में लिनक्स सिखाने वाली किताब भी दिखाई. दरअसल वह किताब मेरी थी.

(१३) कुछ व्यक्तिगत जीवन से जुड़े सुखद पहलू हों तो बताएं ?

सुख दुख तो जीवन के पहलू हैं, और असंख्य हैं, नित्य के हैं. हिन्दी ब्लॉगिंग ने एक पहचान दी है, जो शायद हिन्दी ब्लॉगों व ब्लॉगरों की संख्या कम होने के कारण जल्द ही हासिल हो गई. अभी भी हिन्दी ब्लॉगिंग में तमाम संभावनाएँ हैं. नए लोग आ रहे हैं और आते ही अपना सिक्का जमा रहे हैं. कुछ समय बाद जब भीड़ हो जाएगी तब ये स्थिति नहीं रहेगी. आप पर निगाह पड़े इसके लिए खासा मेहनत करनी होगी.


(१४) परिकल्पना ब्लॉग उत्सव की सफलता के सन्दर्भ में कुछ सुझाव देना चाहेंगे आप ?

आलोचनाओं से घबराएँ नहीं. लोगों के पास कीबोर्ड है फ़ालतू समय है. टेबल पर बैठकर आंख मूंद कर किसी की भी ऐसी तैसी कर सकते हैं, किए हैं. बहुतों को ऐसी चीजों में रस मिलता है, मजा आता है. बहुत सी जनता बिना तली में जाए, ऐसी बातों को सुनकर लहर का अनुमान लगा लेती है. ऐसे लोगों को अनदेखा करें. ब्लॉग उत्सव को निरंतर बनाए रखें, नई चीजें लाएं, स्केलेबल बनाएँ.


(१५) नए ब्लोगर के लिए कुछ आपकी व्यक्तिगत राय ?


प्रोब्लॉगर.कॉम (जो ब्लॉगिंग टिप्स देने के मामले में विश्व के # 1 ब्लॉगों में से एक है) ने कभी कहा था कि जब तक 1000 पोस्ट न लिख ली जाए, किसी ब्लॉगर को सफलता असफलता के बारे में सोचना नहीं चाहिए. तो जो नए लोग आते हैं, उन्हें लगातार, नियमित रचते रहना होगा. 1000 पोस्ट के बाद ही वे देखें कि वे कहाँ तक सफल हुए हैं. वरना आजकल होता ये है कि कोई भी नया ब्लॉगर आता है, चार-पांच पोस्टें ठेलता है और देखता है कि उसके ऊपर कोई तवज्जो नहीं दे रहा है तो वो ग्रुप-समूह-मठाधीशी जैसी बातें करने लग जाता है. जबकि यदि आपकी पोस्ट में दम है, सामग्री सारगर्भित है, तो लोग आज भी पढ़ेंगे, कल भी पढ़ेंगे और नेट पर खोजबीन कर पढ़ेंगे. एक उदाहरण देना चाहूँगा -दिव्य प्रकाश दुबे की एक कविता है -
क्या लिखूं... (http://rachanakar.blogspot.com/2009/03/blog-post_04.html ) उसे नेट पर सर्वाधिक बार कॉपी किया गया है. फोरमों में, ब्लॉगों में , ओरकुट पर, फेसबुक में .. न जाने कहाँ कहाँ. दरअसल वो कविता ही ऐसी है. बाद में उस कविता पर वीडियो भी बनाया गया. आप कहेंगे कि ऐसी हर कविता या हर रचना नहीं हो सकती. ठीक है, मगर आप उससे प्रेरणा लेकर वैसा रचने की कोशिश तो कर सकते हैं?

प्रस्तुति: रवीन्द्र प्रभात

10 comments:

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 21 अप्रैल 2010 को 12:55 pm

भाई रवि रतलामी जी के सूर्य के तेजयुक्‍त विचार निश्चित ही हिन्‍दी और ब्‍लॉगिंग का हित संधान कर रहे हैं। उनके विचारों को तो मैं बिना कहे ही महसूस लेता हूं।

रश्मि प्रभा... ने कहा… 21 अप्रैल 2010 को 1:40 pm

साक्षात्कार के जरिये सम्पूर्ण व्यक्तित्व का एक चित्र सामना आ जाता है...प्रशंसनीय

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 21 अप्रैल 2010 को 1:44 pm

अभी अभी श्री र‍वीन्‍द्र प्रभात जी से बात हुई है। कुछ बेकाबू कारणों यथा पॉवर, की वजह से अब इस उत्‍सव की आगामी पोस्‍टें आप सांय 5 बजे ही देख पाएंगे और आपको शाम को 3 घंटे और समय देना होगा। आप तब तक अपने अन्‍य कार्य कर सकते हैं। वैसे कल का पूरा दिन तो आपके पास रहेगा ही।

hindizen.com ने कहा… 21 अप्रैल 2010 को 11:41 pm

बहुत ही अच्छा साक्षात्कार. ऐसी बातें पढने से ही तो जानकारी बढ़ती है और समझ विकसित होती है!
और १००० पोस्ट वाली बात भी बहुत अच्छी लगी! इस लक्ष्य को पूरा करने में तो मुझे अभी दो साल और लग जायेंगे:)
यह पढना भी अच्छा लगा - "लोगों के पास कीबोर्ड है फ़ालतू समय है. टेबल पर बैठकर आंख मूंद कर किसी की भी ऐसी तैसी कर सकते हैं, किए हैं."

Udan Tashtari ने कहा… 22 अप्रैल 2010 को 4:47 am

बहुत अच्छा लगा रवि जी के विचार पढ़कर. यूँ भी हम उनके पुराने फैन हैं और मजेदार बात यह है कि वो इस बात को जानते भी हैं. :)

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 22 अप्रैल 2010 को 7:36 am

रवि जी की बातें सदैव ही मार्गदर्शन करती हैं ! हम ब्लॉगरों ने रवि जी से निरन्तर सीखा है !
आभार इस साक्षात्कार के लिए !

विष्णु बैरागी ने कहा… 22 अप्रैल 2010 को 11:57 am

ब्‍लॉगियों के लिए यह साक्षात्‍कार संजीवनी का काम करेगा। कई भ्रम और कई दुराग्रह दूर करता है यह साक्षात्‍कार। 'ब्‍लॉग विधा' पर बात शुरु हुई बात अचानक ही 'ब्‍लॉगर' पर चली आती है और सारी बात का भट्टा बैठ जाता है।

रविजी को नमन।

वन्दना ने कहा… 22 अप्रैल 2010 को 10:47 pm

बहुत बढिया साक्षात्‍कार रहा।

मनोज कुमार ने कहा… 23 अप्रैल 2010 को 8:31 pm

आपसे सहमत। सफलता के लिये कोई लिफ्ट नही जाती इसलिये सीढ़ीयों से ही जाना पड़ेगा।

Dr. shyam gupta ने कहा… 25 अप्रैल 2010 को 3:16 pm

१००० पो्स्टे की बात कुछ जमी नहीं--आप सख्या या गु्णवत्ता में किसे ठीक समझते हैं--

 
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