प्रख्यात चित्रकार इमरोज की उपस्थिति मात्र से ही इस प्रेमपरक उत्सव का मान बढ़ गया है । हम कृतज्ञ हैं कि इमरोज इस उत्सव में शामिल हुए । अपना साक्षात्कार दिया, अमृता जी की अप्रकाशित रचनाएँ दी और अपने दो रेखाचित्र भी । इमरोज जो अमृता की जिन्दगी में एक ऐसी बहार बन कर आए जिसकी खुशबू आज भी बरकार है। एक नज्म में इमरोज अपने आपको कुछ तरह से बयान करते हैं-" मैं एक लोक गीत बेनाम हवा में खड़ा हवा का हिस्सा जिसे अच्छा लगे वो याद बना ले और अच्छा लगे तो अपना ले जी में आए तो गुनगुना ले मैं इक लोकगीत सिर्फ इक लोक लोकगीत जिसे नाम की कभी दरकार नहीं" प्रस्तुत है इस उत्सव के लिए ख़ास तौर पर प्रेषित उनके दो रेखाचित्र -



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9 comments:

sangeeta swarup ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 3:42 pm

प्रेम से ओत प्रोत चित्र ...सुन्दर

Akanksha~आकांक्षा ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 3:59 pm

बहुत सुन्दर चित्र...यही अंदाज तो इमरोज़ साहब को एक नई पहचान देता है.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 4:09 pm

jaane pehchaane chitr bahut accha laga inhe yahan dekh kar shukriya

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 4:37 pm

चित्र देखते ही पहचाने जाते हैं। अपनी कहानी खुद कह जाते हैं।

दिगम्बर नासवा ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 5:56 pm

बोलते हुवे चित्र .... कवि मन का आईना .... लाजवाब ....

मनोज कुमार ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 6:42 pm

भावावेग की स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वाभाविक परिणति दीखती है।

ρяєєтι ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 6:57 pm

मुझे भी इमरोज़ जी के घर जाने का सौभाग्य मिला था. प्रेम कुटीर में उनके बनाये चित्र, अमृता जी की तस्वीरे, नज्मो का प्रवाह पाया... यहाँ इस् उत्सव के लिए उन चित्रों को देखना, उत्सव के आरम्भ की शंखध्वनी सा प्रतीत हुआ...

निर्मला कपिला ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 11:49 pm

चित्र नही ये एक सजीव सा एहसास हैदिल की किसी पर्त से निकाल कर कागज़ पर हौले से रख दिया गया। प्रभात् जी आज कल आपको पता है व्यस्त हूँ। बेटी का सिजेरियन हुया है । लगता है इन्डिया आ कर ही अधिक अक्टिव हो पाऊँगी ब्लाग पर।अपका ये उत्सव बहुत अच्छा लगा और इस उत्सव के बहाने ये मुलाकात अच्छी लगी । धन्यवाद और शुभकामनायें

दिव्य नर्मदा divya narmada ने कहा… 16 अप्रैल 2010 को 11:55 pm

जीवंत रेखाचित्र मन को ताज़गी दे गए. इमरोज़ जी को बधाई. आपको धन्यवाद.

 
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