संगीता स्वरुप का जन्म  ७ मई १९५३  रुड़की ( उत्तर प्रदेश ) में हुआ .आपने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर किया और संप्रति एक कुशल गृहिणी की भूमिका का निर्वहन करते हुए हिंदी ब्लॉगजगत में पूरे समर्पण के साथ सक्रिय हैं .यद्यपि ये  पूर्व में केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका रह चुकी हैं . हिंदी साहित्य पढ़ने का , कुछ टूटा फूटा अभिव्यक्त करने का शौक इन्हें ब्लॉग के निकट ले आया .दिल्ली में रहती हैं . इनके बिखरे मोती और गीत  दो व्यक्तिगत ब्लॉग है - प्रस्तुत है इनकी एक कविता  -

!!  नर - नारी संवाद !!

नर ---

हे प्रिय ,
मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ
तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ
तुम कहो तो चाँद तारों से
तुम्हारी झोली भी भर सकता हूँ ।
बस तुम मेरी ये प्यास बुझाओ
मेरे दग्ध होठों को
शीतल कर जाओ
मैं तुममे समां जाऊं
तुम मुझमें सिमट जाओ।


नारी -----------

दावा करते हो कि
तुम मुझे प्यार करते हो
लेकिन क्या कभी
मेरा मन भी पढते हो ?
मेरी ज़रूरत को आज तक
समझ नही पाये
और चाँद तारों की बात करते हो ।
तुमने सदैव अपना स्वार्थ साधा है
जब भी मुझे अपनी बाँहों में बांधा है
तुम कहते हो कि मुझमें समाते हो
पर क्या कभी मेरा मन भी छू पाते हो ?
तुमने हमेशा बस अपनी खुशी चाही
तुम्हें मालूम नही कि
मुझ पर क्या गुज़री है
गर चाहते हो सच ही मुझे पाना
तो तन से पहले मन का पाना ज़रूरी है ।
जिस दिन तुम मेरा मन पा जाओगे
सारे एहसास अपने आप सिमट आयेंगे
न तुमको कुछ कहने की ज़रूरत होगी
और न ही मुझे कोई शब्द मिल पायेंगे।
फिर न तुम्हारे सुर में प्रार्थना का पुट होगा
और न ही मेरा मन यूँ आहत होगा
समर्पण ही मेरा पर्याय होगा
मौन ही मेरा स्वीकार्य होगा ....

()संगीता स्वरुप
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10 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 23 अप्रैल 2010 को 4:40 pm

तो तन से पहले मन का पाना ज़रूरी है ।
जिस दिन तुम मेरा मन पा जाओगे
सारे एहसास अपने आप सिमट आयेंगे
yahi satya है

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 23 अप्रैल 2010 को 5:58 pm

"समर्पण ही मेरा पर्याय होगा "..
सत्य ही !
कविता का आभार !

मनोज कुमार ने कहा… 23 अप्रैल 2010 को 8:23 pm

अनुराग, यौवन, रूप या धन से उत्पन्न नहीं होता। अनुराग, अनुराग से उत्पन्न होता है।

rashmi ravija ने कहा… 23 अप्रैल 2010 को 10:41 pm

फिर न तुम्हारे सुर में प्रार्थना का पुट होगा
और न ही मेरा मन यूँ आहत होगा
समर्पण ही मेरा पर्याय होगा
मौन ही मेरा स्वीकार्य होगा ...
बहुत ही सुन्दर रचना..

अनामिका की सदाये...... ने कहा… 23 अप्रैल 2010 को 10:48 pm

sabse pahle to bahut bahut badhayi ki aapki ye rachna parikalpna par prakashit hui. na jane kitne nari man ki baat keh di aapne is rachna ke zariye... aur umeed karti hu ki pursh bhi padh kar is rachna ke marm tak jaye aur nari man ko samjhe. aapki ye rachna mujhe bahut bahut acchhi lagi. Aur agar apki anumati ho to me ise apni ek known ko bhej du padhne k liye???

Sadhana Vaid ने कहा… 24 अप्रैल 2010 को 6:12 am

एक अत्यंत यथार्थवादी कविता ! बहुत सशक्त और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति !
दावा करते हो कि
तुम मुझे प्यार करते हो
लेकिन क्या कभी
मेरा मन भी पढते हो ?
मेरी ज़रूरत को आज तक
समझ नही पाये
और चाँद तारों की बात करते हो ।
कितने दंपत्ति हैं जो वास्तव में एक दूसरे को समझ पाते हैं !
बहुत सुन्दर !

निर्झर'नीर ने कहा… 24 अप्रैल 2010 को 9:51 am

pahle bhi padhi hai aapki ye kavita ...

iski tariif karne ke liye shabd nahi hai

bahut badii baat chuupi hai ismein .

lekin iska ulat bhi to ho sakta hai .

sangeeta swarup ने कहा… 24 अप्रैल 2010 को 10:52 am

anamika ji,

aap yahan ka link bhej sakati hain...isamen puchhane ki koi aawashyakta nahi hai...adhik se adhik log padh saken , hamaara yahi prayaas rahata hai...shukriya


sabhi pathakon ko mera aabhaar

वन्दना ने कहा… 24 अप्रैल 2010 को 11:13 am

समर्पण ही मेरा पर्याय होगा
मौन ही मेरा स्वीकार्य होगा ....
नारी मन की सारी वेदना को बहुत ही सुन्दरता से ढाला है।

 
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