प्रिय रवीन्द्र प्रभात,
स्नेह !

हिन्दी ब्लॉगिंग शैशवा-वस्था से आगे निकल कर
किशोरावस्था को पहुँच रही है, ऐसे में जरूरत है हिंदी ब्लोगिंग के माध्यम से एक नयी क्रान्ति की प्रस्तावना की जाए । सफलता-असफलता के बारे में न सोचा जाए, केवल कर्त्तव्य किया जाए । सामूहिक कर्त्तव्य के बल पर ही हिंदी ब्लोगिंग का विकास संभव है ।

इंटरनेट की दुनिया में पहली बार हिंदी ब्लॉग पर उत्सव की परिकल्पना, सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ । परिकल्पना ब्लॉग उत्सव का शुभारम्भ आपने किया है वह स्वागत योग्य है । आपका यह कदम आन्दोलन धर्मी, रंगकर्मी, साहित्यकार व उद्यीमान रचनाकारों के लिए एक उपयोगी कदम है। मैं परिकल्पना ब्लॉग उत्सव का स्वागत करता हूँ।
- राम नाथ सिंह ' अदम गोंडवी '






इस अवसर पर श्री राम नाथ सिंह 'अदम गोंडवी' ने अपनी दो गज़लें
परिकल्पना ब्लॉग उत्सव-2010 के लिए दी हैं।  

(1)

मुक्ति का़मी चेतना अभ्यसर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की।

यक्ष प्रश्नों में उलझकर रह गयी बूढी सदी
क्या प्रतीक्षा की घडी है या हमारे प्यास की।

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी की आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगिनिया या गोलियां सल्फास की।

दूसरी गज़ल है -

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर यह आंकडें झूठे हैं यह दावा किताबी है ।

लगी है होड़ सी देखो अमीरी व गरीबी में
यह पूँजीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है ।

तुम्हारी मेज चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर आज भी फूटी रकाबी है । 
() अदम गोंडवी

(यह कार्य लोकसंघर्ष के रणधीर सिंह 'सुमन' व जनकवि श्री राम नाथ सिंह 'अदम गोंडवी' की बातचीत पर आधारित है )

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16 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 1:22 pm

तुम्हारी मेज चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर आज भी फूटी रकाबी है ।
मैं समय हूँ , मैंने वह सब देखा है , जो तुमने नहीं जाना,
तुम्हें चकाचौंध नज़र आई , मैं तो जुम्मन के हालत भी
झेल आया और मेरे साथ अनुभवी अदम गोंडवी जी

sangeeta swarup ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 3:33 pm

यक्ष प्रश्नों में उलझकर रह गयी बूढी सदी
क्या प्रतीक्षा की घडी है या हमारे प्यास की।

दोनों गज़लें लाजवाब....बहुत अच्छी लगीं

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 3:54 pm

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी की आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगिनिया या गोलियां सल्फास की।
अदम गोंडवी साहब को नमन!

Akanksha~आकांक्षा ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 3:57 pm

अदम गोंडवी साहब को देखना व पढना सुकूनदायी लगा..

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 4:35 pm

आभारी हैं अदम गोंडवी जी की सकारात्‍मक राग के।

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 5:54 pm

अदभुत कृ्तित्व से मिले हम !
"यक्ष प्रश्नों में उलझकर रह गयी बूढी सदी
क्या प्रतीक्षा की घडी है या हमारे प्यास की। "
इन पंक्तियों का क्या जो्ड़ ! आभारी हूँ !

दिगम्बर नासवा ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 6:00 pm

लगी है होड़ सी देखो अमीरी व गरीबी में
यह पूँजीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है ..

व्यवस्था पर करारी चोट करती ... सामाजिक ग़ज़ल ...

मनोज कुमार ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 6:45 pm

ये ग़ज़लें आधुनिक अनुकरण प्रवृत्ति और अपसंस्कृति की दशा का वास्तविक चित्रण है।

दिव्य नर्मदा divya narmada ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 9:40 pm

वाह..वाह... अदम गौंडवी जी का पुराना प्रशंसक हूँ मैं. उन्हें व् आपको साधुवाद. काश आज नूर साहब भी होते...

RajeevBharol ने कहा… 16 अप्रैल 2010 को 5:58 am

बहुत सुंदर रचनाएं.

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा… 16 अप्रैल 2010 को 1:32 pm

agar adam gondavi ji jaise log is blog jagat se judte rhe to nishchit taur pe iska faayda blog jagat ko hoga.... unka khat ek urza de raha hai ..aur inki ghazlen nazmen humesha se marg darshak rahi hain.....

aaiye mehsoos kariye zindagi ke taap ko....jaisi rachanayen muddat hui padhe fir bhi yaad hain ... :)

Udan Tashtari ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 7:45 pm

अदम गोंडवी साहब की गज़लें पढ़ना सुखदायी रहा.

सुरेश यादव ने कहा… 18 अप्रैल 2010 को 11:59 am

ब्लोगोत्सव में अगम गोंडवी जी की सामाजिक चेतना से भरपूर गज़लें पढ़ीं बधाई.

विनोद पाराशर ने कहा… 19 अप्रैल 2010 को 3:22 pm

वा्कई दुष्यंत की याद आ गई.

नीरज गोस्वामी ने कहा… 20 अप्रैल 2010 को 10:31 am

तुम्हारी मेज चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर आज भी फूटी रकाबी है ।

गौंडवी साहब को शत शत नमन
नीरज

ramadwivedi ने कहा… 2 मई 2010 को 11:15 am

अदम गोंडवी जी की लेखनी को शत-शत नमन.....सभी शेर एक से बढ़कर एक हैं ....साधुवाद एवं शुभकामनाएँ

डा.रमा द्विवेदी

 
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