प्रमुख हिंदी पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के समूह संपादक बालेन्दु शर्मा दाधीच सन 1998 से सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी को आगे बढ़ाने के प्रयासों में जुटे हैं। 2007 और 2008 में माइक्रोसॉफ्ट की ओर से 'मोस्ट वेल्युएबल प्रोफेशनल' करार दिए गए बालेन्दु ने राजस्थान पत्रिका से अपना कॅरियर शुरू किया और इंडियन एक्सप्रेस समूह (जनसत्ता), हिंदुस्तान टाइम्स समूह (होम टीवी) और सहारा समूह (सहारा टीवी) में विभिन्न पत्रकारीय उत्तरदायित्व निभाए। वे 1998 में सूचना प्रौद्योगिकी की ओर मुखातिब हुए। बालेन्दु ने सिर्फ लेखन ही नहीं बल्कि तकनीकी विकास के माध्यम से भी हिंदी की सेवा का प्रयास किया है। उनके सफल अनुप्रयोगों तथा परियोजनाओं में 'माध्यमः हिंदी शब्द संसाधक', 'वेबसमर्थः वेब विकास तंत्र', 'न्यूजग्रैबरः हिंदी समाचार संकलन तंत्र' तथा हिंदी समाचार पोर्टल 'प्रभासाक्षी.कॉम' प्रमुख हैं। वे माइक्रोसॉफ्ट विजुअल स्टूडियो २००८ के स्थानीयकरण से भी जुड़े हैं। भारतीय भाषाओं में, विशेषकर यूनिकोड में सूचना प्रौद्योगिकीय विकास को प्रोत्साहन देने के लिए वे 'लोकलाइजेशनलैब' नामक द्विभाषीय वेबसाइट का संचालन करते हैं। हिंदी में 'वाहमीडिया' नामक ब्लॉग के माध्यम से उन्होंने मीडिया में आत्मालोचना की पहल की है। राजनैतिक मुद्दों पर टिप्पणी के लिए उनका ब्लॉग 'मतान्तर' भी सराहा गया है। शैक्षणिक योग्यता के लिहाज से एम.सी.ए. और एम.बी.ए. होने के साथ-साथ वे हिंदी साहित्य में एम.ए. एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमाधारी हैं। बालेन्दु की दो कृतियां प्रकाशित हुई हैं और वे हिंदी में श्रेष्ठ लेखन के लिए विश्व खाद्य संगठन (FAO) द्वारा पुरस्कृत किए जा चुके हैं। वे विश्व हिंदी सम्मेलन 2007 के आयोजन से भी जुड़े थे।प्रस्तुत है हिंदी ब्लोगिंग के संवंध में उनकी राय-


ब्लॉगिंग: ऑनलाइन विश्व की आजाद अभिव्यक्ति"

दूसरे धर्मों का तो पता नहीं पर मैंने अपने धर्म में इतने दंभी, स्वार्थी और बेवकूफ लोग देखे हैं कि मुझे पछतावा है कि मैं क्यों जैन पैदा हुआ? अब जैन में तो हर चीज करने में पाप लगता है.... कुछ जैन संप्रदाय मूर्ति पूजा करते हैं तो कुछ मूर्तिपूजा के खिलाफ हैं। अब एक जैन मंदिर में जाकर लाइट चालू करके, माइक पे वंदना करके यह संतोष व्यक्त करते हैं कि मुझे स्वर्ग मिलेगा तो कुछ 'स्थानकवासी' जैन मानते हैं कि बिजली चालू करने से पाप लगता है और मूर्ति बनाने से बहुत छोटे जीव मरते हैं इसलिए पाप लगता है। यहां दोनों संप्रदाय एक ही भगवान की पूजा करेंगे लेकिन अलग ढंग से। फिर आठ दिन भूखे रहकर यह मान लेंगे कि उनका पाप मिट गया। यानी आपने तीन खून किए हों या लाखों लोगों के रुपए लूटे हों फिर भी कुछ दिन भूखे रहने से पाप मिट जाएंगे।" (तत्वज्ञानी के हथौड़े)।

"मैं अपने आपको मुसलमान नहीं मानता मगर मैं अपने मां-बाप की बहुत इज्जत करता हूं, सिर्फ और सिर्फ उनको खुश करने के लिए उनके सामने मुसलमान होने का नाटक करता हूं, वरना मुझे अपने आपको मुसलमान करते हुए बहुत गुस्सा आता है। मैं एक आम इन्सान हूं, मेरे दिल में वही है जो दूसरों में है। मैं झूठ, फरेब, मानदारी, बेईमानी, अच्छी और बुरी आदतें, कभी शरीफ और कभी कमीना बन जाता हूं, कभी किसी की मदद करता हूं और कभी नहीं- ये बातें हर इंसान में कॉमन हैं। एक दिन अब्बा ने अम्मी से गुस्से में आकर पूछा- क्या यह हमारा ही बच्चा है? तो वो हमारी तरह मुसलमान क्यों नहीं? कयामत के दिन अल्लाह मुझसे पूछेगा कि तेरे एक बेटे को मुसलमान क्यों नहीं बनाया तो मैं क्या जवाब दूं? पहले तो अब्बा-अम्मी ने मुझे प्यार से मनाया, फिर खूब मारा-पीटा कि हमारी तरह पक्का मुसलमान बने... यहां दुबई में दुनिया भर के देशों के लोग रहते हैं और ज्यादातर मुसलमान। मुझे शुरू से मुसलमान बनना पसंद नहीं और यहां आकर सभी लोगों को करीब से देखने और उनके साथ रहने के बाद तो अब इस्लाम से और बेजारी होने लगी है। मैं यह हरगिज नहीं कहता कि इस्लाम गलत है, इस्लाम तो अपनी जगह ठीक है। मैं मुसलमानों और उनके विचारों की बात कर रहा हूं।" (नई बातें, नई सोच)।

ये दोनों टिप्पणियां दो अलग-अलग लोगों ने लिखी हैं। दो ऐसे साहसिक युवकों ने, जो प्रगतिशीलता का आवरण ओढ़े किंतु भीतर से रूढ़िवादिता ब्लॉगिंग है एक ऐसा माध्यम जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी। ऐसा माध्यम जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, और राजनैतिक-सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वतंत्र है। जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है, न अल कायदा से डरने को।

को हृदयंगम कर परंपराओं और मान्यताओं को बिना शर्त ढोते रहने वाले हमारे समाज की संकीर्णताओं के भीतर घुटन महसूस करते हैं। क्या इस तरह की बेखौफ, निश्छलतापूर्ण और ईमानदार टिप्पणियां किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित की जा सकती हैं? क्या क्रुद्ध समाजों की उग्रतम प्रतिक्रियाओं से भरे इस दौर में ऐसे प्रतिरोधी स्वर किसी दूरदर्शन या आकाशवाणी से प्रसारित हो सकते हैं? क्या कोई धार्मिक, सामाजिक या राजनैतिक मंच इस ईमानदार किंतु विद्रोही आक्रोश की अभिव्यक्ति का मंच बन सकता है? ऐसा संभवत: सिर्फ एक मंच है जिसमें अभिव्यक्ति किन्हीं सीमाओं, वर्जनाओं, आचार संहिताओं या अनुशासन में कैद नहीं है। वह मंच है इंटरनेट पर तेजी से लोकप्रिय हो रही ब्लॉगिंग का।

औपचारिकता के तौर पर दोहरा दूं कि ब्लॉगिंग शब्द अंग्रेजी के 'वेब लॉग' (इंटरनेट आधारित टिप्पणियां) से बना है, जिसका तात्पर्य ऐसी डायरी से है जो किसी नोटबुक में नहीं बल्कि इंटरनेट पर रखी जाती है। पारंपरिक डायरी के विपरीत वेब आधारित ये डायरियां (ब्लॉग) सिर्फ अपने तक सीमित रखने के लिए नहीं हैं बल्कि सार्वजनिक पठन-पाठन के लिए उपलब्ध हैं। चूंकि आपकी इस डायरी को विश्व भर में कोई भी पढ़ सकता है इसलिए यह आपको अपने विचारों, अनुभवों या रचनात्मकता को दूसरों तक पहुंचाने का जरिया प्रदान करती है और सबकी सामूहिक डायरियों (ब्लॉगमंडल) को मिलाकर देखें तो यह निर्विवाद रूप से विश्व का सबसे बड़ा जनसंचार तंत्र बन चुका है। उसने कहीं पत्रिका का रूप ले लिया है, कहीं अखबार का, कहीं पोर्टल का तो कहीं ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा के मंच का। उसकी विषय वस्तु की भी कोई सीमा नहीं। कहीं संगीत उपलब्ध है, कहीं कार्टून, कहीं चित्र तो कहीं वीडियो। कहीं पर लोग मिल-जुलकर पुस्तकें लिख रहे हैं तो कहीं तकनीकी समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। ब्लॉग मंडल का उपयोग कहीं भाषाएं सिखाने के लिए हो रहा है तो कहीं अमर साहित्य को ऑनलाइन पाठकों को उपलब्ध कराने में। इंटरनेट पर मौजूद अनंत ज्ञानकोष में ब्लॉग के जरिए थोड़ा-थोड़ा व्यक्तिगत योगदान देने की लाजवाब कोशिश हो रही है।

सीमाओं से मुक्त अभिव्यक्ति 

ब्लॉगिंग है एक ऐसा माध्यम जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी। ऐसा माध्यम जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, और राजनैतिक-सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वतंत्र है। जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है, न अल कायदा से डरने को। इस माध्यम में न समय की कोई समस्या है, न सर्कुलेशन की कमी, न महीने भर तक पाठकीय प्रतिक्रियाओं का इंतजार करने की जरूरत। त्वरित अभिव्यक्ति, त्वरित प्रसारण, त्वरित प्रतिक्रिया और विश्वव्यापी प्रसार के चलते ब्लॉगिंग अद्वितीय रूप से लोकप्रिय हो गई है। ब्लॉगों की दुनिया पर केंद्रित कंपनी 'टेक्नोरैटी' की ताजा रिपोर्ट (जुलाई २००७) के अनुसार ९.३८ करोड़ ब्लॉगों का ब्यौरा तो उसी के पास उपलब्ध है। ऐसे ब्लॉगों की संख्या भी अच्छी खासी है जो 'टेक्नोरैटी' में पंजीकृत नहीं हैं। समूचे ब्लॉगमंडल का आकार हर छह महीने में दोगुना हो जाता है। सोचिए आज जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं, तब अभिव्यक्ति और संचार के इस माध्यम का आकार कितना बड़ा होगा?

आइए फिर से अभिव्यक्ति के मुद्दे पर लौटें, जहां से हमने बात शुरू की थी। हालांकि ब्लॉगिंग की ओर आकर्षित होने के और भी कई कारण हैं ...!
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6 comments:

Arvind Mishra ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 11:00 am

बहुत सारगर्भित आलेख है यह ,,बधाई

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 11:21 am

बालेन्‍दु जी का लिखा तो जितना पढ़ा जाए उतनी जिज्ञासा और बढ़ती जाती है और उन्‍होंने तो सिर्फ इतना सा लिखकर सिर्फ चखने का स्‍वाद दिया है। इस उत्‍सव में आप फिर आ जाओ एक बार, इसी वंस मोर के आह्वान के साथ। वैसे गागर में सागर का आनंद दे गया है आपका आलेख।

रश्मि प्रभा... ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 1:05 pm

सम्पूर्णता से भरा आलेख

shashisinghal ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 2:00 pm

बालेन्दुजी को जब भी पढा है उनसे कुछ न कुछ ज्ञान ही हुआ है । कादम्बिनी में अकसर बालेन्दुजी इंटरनेट व ब्लॉग के बारे में लिखते हैं जिससे काफी जानकारी हासिल होती है । आज परिकल्पना पर उनका आलेख पढा जिसका एक - एक शब्द गूढ है । उन्होंने ब्लॉगिंग की परिभाषा जिन दो टिप्पणियों से जोडकर बताई है वह काफी सटीक है । सच ही तो है कि ऑनलाइन विश्व की आजाद अभिव्यक्ति ब्लॉगिंग है। यह एक ऎसा माध्यम जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी।जो ब्लॉगिंग कि भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, और राजनैतिक-सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वतंत्र है। जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है, न अल कायदा से डरने को। इन लाइनों में उन्होंने कितनी गूढ बात कह डाली है ।

संगीता पुरी ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 4:47 pm

जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है, न अल कायदा से डरने को। इस माध्यम में न समय की कोई समस्या है, न सर्कुलेशन की कमी, न महीने भर तक पाठकीय प्रतिक्रियाओं का इंतजार करने की जरूरत।
बालेन्‍दु दधीच जी ने सही कहा है .. बहुत बडी ताकत बनने जा रही है ये ब्‍लागिंग !!

 
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