वर्त्तमान समय में श्रीमती निर्मला कपिला जी को हिंदी चिट्ठाकारी में वही स्थान प्राप्त है जो कभी हिंदी साहित्य के छायावादोत्तर काल में महादेवी वर्मा जी को प्राप्त था । निर्मला जी एक समर्पित ब्लोगर ही नहीं कुशल कहानीकार और गज़लकार भी हैं , जो सर्वथा निष्पक्ष भाव से ब्लॉग जगत की सेवा में रत रहती हैं। निर्मला जी कहती हैं कि "अपने लिये कहने को कुछ नहीं मेरे पास । पंजाब मे एक छोटे से खूबसूरत शहर नंगल मे होश सम्भाला तब से यहीं हूँ। बी.बी.एम.बी अस्पताल से चीफ फार्मासिस्ट रिटायर हूँ । अब लेखन को समर्पित हूँ। मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है -1-सुबह से पहले [कविता संग्रह] 2 वीरबहुटी [कहानी संग्रह] 3-प्रेम सेतु [कहानी संग्रह] आज कल अपनी रूह के शहर [ इस ब्लाग ] पर अधिक रहती हूँ । आई थी एक छोटी सी मुस्कान की तलाश मे मगर मिल गया खुशियों का समंदर। कविता, कहानी, गज़ल,मेरी मन पसंद विधायें हैं। पुस्तकें पढना और ब्लाग पर लिखना मेरा शौक है।" आज प्रस्तुत है उनकी तीन प्यारी सी गज़लें-


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शोखियाँ नाज़ नखरे उठाते रहे
वो हमे देख कर मुस्कुराते रहे ।


हम फकीरों से पूछो न हाले जहाँ
जो मिले भी हमे छोड जाते रहे ।


याद उसकी हमे यूँ परेशाँ करे
पाँव मेरे सदा डगमगाते रहे ।


हाथ से टूटती ही लकीरे रही

ये नसीबे हमे यूँ रुलाते रहे ।


वो वफा का सिला दे सके क्यों नहीं

बेवफा से वफा हम निभाते रहे ।


शाख से टूट कर हम जमीं पर गिरे
लोग आते रहे रौंद जाते रहे।


जब चली तोप सीना तना ही रहा
लाज हम देश का यूँ बचाते रहे।
[ये शेर मेजर गौतम राजरिशी जी के लिए लिखा था]


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न तो रिश्तेदोस्त ही कोइ मेरा मिला मुझ को
अगर कु छ भी मिला तो दर्द वो तेरा मिला मुझ को ।


रहे तालिब सदा तेरे दीदार -ए-नूर के जानम
न आया तू न कोई भी पता तेरा मिला मुझ को ।


वफा को ही मिले धोखा बता ऐसी रवायत क्यों
मैं हीरा हूँ उजाले मे भी अंधेरा मिला मुझ को ।


हजारों रौनके होती रहें होते रहे उत्सव
उजडता सा सदा मेरा जहाँ डेरा मिला मुझ को ।


सदा जीता रहा मर मर के मैं यारो ख्यालों मे
मिला ये तोहफा देखो जो गम तेरा मिला मुझ को ।


तीरे खंधे पर सिर रख कर लगा कोई मेरा भी है
चलो जीने को कोई साथ ही मेरा मिला मुझ को ।


करे कोई गिला तो क्या ? बताओ तो सही 'निर्मल'
मुहब्बत में बना बन कर खुदा मेरा मिला मुझ को ।


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दर्द अपने सुनाना नहीं चाहती
जख्म दिल के दिखाना नहीं चाहती ।


अब न पूछो कि क्या साथ मेरे हुआ
मैं हकीकत बताना नहीं चाहती ।


मर्ज माना हुआ लाइलाज अब मगर
मैं दवा से दबाना नहीं चाहती ।


वो परिन्दा उड़े तो कहीं भी उड़े
मैं जमीं पर गिराना नहीं चाहती ।


राह मे जो मिले सब मुद्दई मिले
अब उसी राह जाना नहीं चाहती ।


मौसमी फू ल सा प्यार उसका है जी
प्यार उससे जताना नहीं चाहती ।


कौन बेबस नहीं इस जहाँ मे कहो
बेबसी मैं दिखाना नहीं चाहती ।


आंधिया जलजले और वो हादसे
क्या नहीं था बताना नहीं चाहती ।


चाहती हूँ खुशी से कटे जिंदगी
ग़म की महफ़िल में जाना नहीं चाहती ।

() निर्मला कपिला

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3 comments:

kshama ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 3:16 pm

Kitna padhen aur kya,kya! In sabhi diggajon ko naman hai!

रश्मि प्रभा... ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 8:54 pm

दर्द अपने सुनाना नहीं चाहती
जख्म दिल के दिखाना नहीं चाहती ।


अब न पूछो कि क्या साथ मेरे हुआ
मैं हकीकत बताना नहीं चाहती ...
क्या बात है !

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 27 अप्रैल 2010 को 9:57 am

इन पर तो फिदा हो गया हूँ मैं -

"सदा जीता रहा मर मर के मैं यारो ख्यालों मे
मिला ये तोहफा देखो जो गम तेरा मिला मुझ को । "

सर्वसिद्ध नाम है निर्मला जी का ! क्या कहें !
आभार ।

 
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