दिल्ली निवासी रंजना [रंजू भाटिया] विगत दिनों परिकल्पना ब्लॉग विश्लेषण-२००९ में नौ श्रेष्ठ महिला चिट्ठाकारों में शुमार हुई थी इनकी कवितायें आप अक्सर इनके ब्लॉग कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** पर पढ़ते होंगे इनकी कवितायें संवेदनाओं के गहरे सागर में उतरने को विवश करती है अपने रचना संसार के बारे में ये कहती हैं कि "प्यार के एक पल ने जन्नत को दिखा दिया प्यार के उसी पल ने मुझे ता -उमर रुला दिया एक नूर की बूँद की तरह पिया हमने उस पल को एक उसी पल ने हमे खुदा के क़रीब ला दिया !!चलना चाहते हो मेरे संग तो बन आकाश चलो मैं धरती बन कर कहीं तो तुम्हे छू ही लूंगी दूर रह कर भी दिलो में हो प्यार सा सहारा लौटना चाहूँ भी तो भी लौट सकूंगी थाम कर हाथ चलो संग मेरे वहां जहाँ कहीं दूर मिला करते हैं धरती गगन विश्वास के साए में नया जहान ढूंढ ही लूंगी !!" आप इनकी कविताओं से रूबरू तो हैं हीं आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं इनकी यात्रा का वृत्तांत इनकी लेखनी के माध्यम से -




जब घर से चले थे तो दिल्ली की गर्मी से निजात पाने की उम्मीद थी और दिल में था कुछ गुनगुनाता सामीठा मीठा संगीत मंद बहती हवा का एहसास और ॥आँखो में सपने थे ..पेडो से ढके पहाड़ की हरियाली और भी बहुत कुछ ...ख़ुद बा ख़ुद दिल किसी गीत की रचना करने लगा था
कल- कल बहती गंगा यही संदेश देती है चलते चलो- चलते चलो !!
बहती मस्त बयार , ठंडी जैसे कोई फुहार
लहराते डगमगाते पहाडी से रास्ते नयना ना जाने किसकी है राह तकते

सफ़र शुरू हुआ ... दिल्ली की गर्मी भी सफ़र में दूर दूर तक साथ चलती रही ... .शहर की भाग दौड़ से दूर दो पल शांत बिताने की चाहा हमे उतराँचल की गोद में ले गयी ... तेज़ गर्मी और लंबा सफ़र के बीच मोदी नगर की जैन शिकजी और चीतल रिसोर्ट ने हमारे सफ़र को कुछ मीठा सा बना दिया .... हरिद्वार और ऋषिकेश को पार करते हुए थोडा सा आगे हम कोडियल के गड़वाल रेस्ट हाउस तक जब पहुचे तो जैसे सफ़र की सारी थकावट गंगा के कल कल बहते पानी को देख कर उतरने लगी .. पर गरमी का असर यहाँ भी ख़ूब दिख रहा था .. हवा का एक झोंका नही ..
- ज़िंदगी जीने की चाहा में सब कुछ अपना बनाने की राह में यहाँ सब छूटा सा जाता है जंगल से पेडो का , मंद बहती समीरो का साथ अब रूठा जाता है



पर चारो तरफ़ पहाड़ से घिरे और गंगा के किनारे बसे इस रेस्ट हाउस ने हमे जैसे अपने मोह में बाँध लिया .... अगले दिन रफ्टिंग का जोश सबके चेहरे पर दिख रहा था ...बहुत ही रोमांचक लगता है गंगा की शीतल बहाव और तेज़ धारा में कूदना ..गर्मी होते ही दिल कुछ ठंडक पाने को मचल उठता है ...और तब दिल को तलाश होती है आस पास के उस ठंडे स्थान कि जहाँ दो पल सकून के मिल सके
वहाँ से मेरिन ड्राइव से शिवपुरी का रास्ता कई रॅपिड को पार करते हुए मेरे लिए तो बहुत ही नया और रोमांचक अनुभव रहा ..... उसके बाद भी कितनी देर हम यूँ ही गंगा की गोद में बैठे गर्मी को दूर करने में लगे रहे ....

हमारा अगला पडाव ओली था .. सुबह 5 बजे पहाड़ के उगते सूरज की लालिमा और कुछ हद तक ठंडी हवा में सफ़र शुरू हुआ ....
देवप्रयाग.श्रीनगर .. रुद्रप्रयाग और जोशीमठ तक कई सुंदर नज़ारे आँखो में बस गये ...जोशीमठ से 14 किलोमेटर उँचाई पैर स्केटिंग के लिए मशहूर ओली इस मौसम में अपने में अदभुत सुंदरता समेटे हुए हैं ..वहाँ बनी हट्स और उस के सब तरफ़ खिले सफ़ेद फूल , आस पास विशाल पहाड़ दूर किसी किसी छोटी पर अभी भी कुछ बर्फ़ दिख रही थी . जैसे हम से कह रहे थे की आओ कुछ देर हमारे साए में अपनी ज़िंदगी की सारी भाग दौड और परेशानी भुला दो ..बस कुछ पल सिर्फ़ यहाँ सुंदरता में खो जाओ ..भर लो बहती ताज़ी हवा जो शायद कुछ समय बाद यहाँ भी नही मिलेगी ..... बादलो के बीच में ट्राली का सफ़र जैसे बादलो के संग ही उड़ता सा लगता है ...


चेहरे को छूते बादल जैसे अपने स्पर्श से बता देना चाहते हैं की जो ठंडक उन में है वो आज के चलते -सी में नही " और यह पहाड़ जब सर्दी में सफ़ेद बर्फ़ से ढ़क जाते होंगे तो कितने सुंदर लगते होंगे इसका अंदाज़ा यहाँ पर बिखरी सुंदरता से आसानी से लगाया जा सकता है ....उपर कुछ पहाड़ो में लगे देवदार के पेड़ जैसे किसी समाधी में लीन लगे जो शायद यह तपस्या कर रहे थे की यूँ हमारी सुंदरता को बना रहने दो आओ ..कुछ पल सकुन की साँस लो और आने वाले कल के लिए यह सब रहने दो ....पर फिर भी जैसे कुदरत अंतिम सांसो तक कुछ ना कुछ मानव को देती लगती थी ..जैसे कह रही हो की देख लो मैं अभी भी तुम्हारे साथ अपने संपूर्ण सुंदरता के साथ रह सकती हूँ यदि तुम मुझे सहज कर संभाल कर रखो ..... यह सफ़र अभी आधा था क्यूँकी ............उतराखंड की वास्तिवक सुंदरता तो बदरीनाथ . केदार नाथ .. हेम कुंड साहिब और फूलो की घाटी में छिपी हुई है .. और मुझे वहाँ अभी जाना है जल्दी ही ... पर जितना भी देखा वो ना भूलने वाले पल थे ...दिल जैसे कह उठा ..

सारी कायनत एक धुन्ध की चादर में खो रही है एक कोहरा सा ओढ़े यह सारी वादी सो रही है
गूँज रहा है झरनो में कोई मीठा सा तराना हर साँस महकती हुई इन की ख़ुश्बू को पी रही है
पिघल रहा है चाँद आसमान की बाहो में सितारो की रोशनी में कोई मासूम सी कली सो रही है



रूह में बस गया है कुछ सरूर इस समा का सादगी में डूबी यहाँ ज़िंदगी तस्वीर हो रही है
है बस यही लम्हे मेरे पास इस कुदरत की सोगात के कुछ पल ही सही मेरी रूह एक सकुन में खो रही है !!















मुस्कानसुंदरता यूँ ही रहने दे

हमारे दल का नन्हा यात्री मुस्कान


इसके चेहरे की मुस्कान यही कहती है की मेरे बड़े होने तक यह सुंदरता यूँ ही रहने देना


6 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 3:01 pm

दिलचस्प यात्रा वृतांत .......

sangeeta swarup ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 3:10 pm

अच्छा संस्मरण

संगीता पुरी ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 3:20 pm

रंजना जी की लेखनि का जबाब नहीं .. इन सुंदर चित्रो और यात्रा वृतांत ने इतनी गर्मी में भी शीतलता का अहसास दिया !!

Udan Tashtari ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 6:41 pm

रोचक वृतांत..ऐसा लगा हम भी यात्रा कर रहे हैं.

Sadhana Vaid ने कहा… 18 अप्रैल 2010 को 8:16 am

बहुत ज्ञानवर्धक एवं कुदरत की सुंदरता की ओर आकर्षित करता रोचक यात्रा वृत्तांत ! जी करता है आज ही निकल पड़ें !

दिगम्बर नासवा ने कहा… 18 अप्रैल 2010 को 4:21 pm

रोचक वृतांत .... लगा हम भी यात्रा कर रहे हैं ...

 
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