प्रकाश सिंह "अर्श" हिंदी के वेहद सक्रीय चिट्ठाकारों में से एक हैं गज़लें कहना और कविताएँ लिखना इनका जूनून अपने बारे में ये कहते हैं कि -"मैं मेरा पूरा नाम प्रकाश कुमार सिंह "अर्श " बिहार का रहने वाला हूँ, और एम्.बी.ए करने के पश्चात दिल्ली में ही एक निजी संस्थान में प्रबंधक के तौर पर कार्यरत हूँ ! ग़ज़ल कहना मेरा शौक ही नहीं मेरी आदतों में अब है, और आदतें बदली नहीं जा सकती हैं , मैं ग़ज़ल की तकनीक अपने गुरु देव परम आदरणीय श्री पंकज सुबीर जी से सिख रहा हूँ ! अर्श के नाम से खुद का एक ब्लॉग है जिस पर समय- समय पर कुछ एक ग़ज़ल पेश करता हूँ आप सभी के लिए... कुछ पत्र पत्रिकाओं में मेरी गज़लें आती हैं , ज्यादा नहीं भेजता !" प्रस्तुत है इनकी तीन गज़लें-

(1).

आजकल हिचकियाँ नहीं आतीं
यादों की अर्जियां नहीं आतीं ।

पत्ते जब टूट कर के गिरते हैं
थामने टहनियां नहीं आतीं ।

अब यकीं हो गया जवानी पे
सामने तितलियाँ नहीं आतीं ।

उन घरों की भी सोचिये जिनमे
रोज दो रोटियाँ नहीं आतीं ।

जब से दीपक बुझा दिये मैंने
तब से ही आंधियां नहीं आतीं ।

बात रिश्तों की हो मगर उनमे
जामुनी  लडकियां नहीं आतीं ।


(2)

. ग़मों से दूर जाना चाहता हूँ
मैं फ़िर से मुस्कुराना चाहता हूँ ॥

मैं बच्चा बन के मां की गोद से फ़िर
लिपट के खिलखिलाना चाहता हूँ ॥

पिता ही धर्म हैं ईमां हैं मेरे
वहीं बस सर झुकाना चाहता हूँ ॥

जहां कोई खड़ा है राह ताकता
वहीं फ़िर लौट जाना चाहता हूँ ॥

सुना है रूठ कर सुन्दर लगे है
उसे गुस्सा दिलाना चाहता हूँ ॥

लहू का रंग मेरा इश्क जैसा
मैं साँसे शाईराना चाहता हूँ

ग़ज़ल होती नहीं बस वो मुकम्मल
जिसे उसको सुनाना चाहता हूँ ॥


(3)

.रिश्ते नातों का यही किस्सा हुआ
रेत का घर रेत पर बिखरा हुआ ॥

जब तलक रोका था तो कतरा था ये
बह पड़ा तो देखिये दरिया हुआ ॥

रूठ कर जाते हो पर बतला तो दो
आपको किस बात का गुस्सा हुआ ॥

तिनके तिनके से बनाया घोसला
टूट कर बिखरा तो फिर तिनका हुआ ॥

फन मेरा जो दिख रहा है आजकल
सब बुजुर्गों से है ये सीखा हुआ ॥

देखकर सूरज भी शरमा जाएगा
नथ का मोती इस कदर चमका हुआ ॥

कैसे कह दूँ अजनबी अब उसको मैं
अजनबी जो था वही अपना हुआ ॥

मेरे चेहरे को पढा कब आपने
प्यार का ख़त उसपे था लिक्खा हुआ ॥
() () ()

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7 comments:

वन्दना ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 3:54 pm

arsh ji
aapki teeno hi gazalein nayab hain.........ab yadi kisi ek sher ki tarif karungi to doosre ke sath nainsafi hogi kyunki har sher dil mein bahut gahre utar gaya............marvellous.

वीनस केशरी ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 4:53 pm

बात रिश्तों की हो मगर उनमे
जामुनी लडकियां नहीं आतीं ।

मैं बच्चा बन के मां की गोद से फ़िर
लिपट के खिलखिलाना चाहता हूँ ॥

देखकर सूरज भी शरमा जाएगा
नथ का मोती इस कदर चमका हुआ ॥

जय हो जय हो :)

दिगम्बर नासवा ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 7:31 pm

Arsh ji ki shaayri mein gzab ka aakarshan hot hai .. unki adaaygi lajawaab hai ... khilta huva hai har sher ...

mala ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 8:29 pm

achchhee gazal, badhaayiyaan !

रश्मि प्रभा... ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 8:53 pm

गजलों के मंच पर किसे कितना सराहूँ, समझ से परे है
कोई कम ही नहीं

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 27 अप्रैल 2010 को 9:49 am

उत्सव में चिटठाजगत के इन सक्रिय गज़लकारों का प्रतिनिित्व सराहनीय है!
एक सच्ची सक्रिय रचनाधर्मी जमात है ब्लॉग पर गज़लों के रचना परिदृ्श्य में ! अर्श उसके सशक्त हस्ताक्षर हैं !

प्रस्तुति का आभार !

shyam gupta ने कहा… 14 अप्रैल 2014 को 6:49 pm

क्या बात है ..सुन्दर गज़लें ..

 
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