अलका सर्वत मिश्रा हिंदी चिट्ठाकारी में वेहद नाम है, स्वास्थ्य- चर्चा और जडी बूटियों से संवंधित ज्ञान बांटने वालों में अलका जी सर्वाधिक सक्रिय चिट्ठाकारों में से एक हैं .इन्होनें बी एस. सी. (बायो) २००५ में किया और २००७ में बी एच यू से हर्बल प्लान्टेशन में डिप्लोमा कोर्स करने के बाद आजकल ये जड़ी बूटियों पर शोध कार्य में संलग्न हैं . इनका जडी बूटियों से संवंधित व्यक्तिगत ब्लॉग है मेरा समस्त . प्रस्तुत है इनका स्वास्थ्य संवंधी आलेख-

मानव शरीर प्रकृति की एक अद्भुत संरचना है ,यह संरचना मुख्यतः विचारों द्वारा नियंत्रित होती है. परन्तु 'विचारों द्वारा नियंत्रण 'की प्रक्रिया पराविज्ञान की श्रेणी में आती है और वर्तमान के परिदृश्य में हम इसे जटिलतम मान लेते हैं .फिर भी हम इसके बारे एन निम्न पंक्तियों से समझ सकते हैं-- अगर हम विचारों से आपके प्रति लगाव या अच्छी भावना रखते हैं तो आपके मन में भी हमारे प्रति वैसी ही भावना प्रकट हो जाती है . विचार एक तेलीपैथी है जो इस सीमा तक जा सकती है कि अगर हम चाहें कि अभी बारिश हो जाए तो प्रकृति हमारी इच्छा का सम्मान करेगी और वर्षा होगी .

इस विषय को यहीं छोड़ते हुए हम प्रकृति तक आते हैं. ये शरीर जो प्रकृति के ५ तत्वों द्वारा निर्मित है,उन्हीं के द्वारा पोषित होता है , उन्हीं को शक्तिशाली बनता है और अंत में उन्हीं ५ तत्वों में विलीन हो जाता है .आधुनिक समय में जब हमें इस बारे में सोचने की फुर्सत ही न हो तो भी हम इतना तो ध्यान रख ही सकते हैं कि हमारे शरीर में ५ में से किसी भी तत्व की कमी या अधिकता हमें रोगी बना सकती है. अगर हम अपना जीवन-यापन इतना संयमित रख सकें कि ये तत्व -मिट्टी ,पानी ,हवा ,अग्नि और आकाश तत्व अपना संतुलन बनाये रखे तो हमें कोई रोग कभी छूकर न गुजरेगा . लेकिन ऐसा असंभव है ,विशेषतया आज के समय में . जीवन और शरीर की सरलतम परिभाषा हम यूं दे सकते हैं कि हमारा शरीर एक मकान की तरह है जिसमें नित्य-प्रति छोटी - मोटी टूट-फूट होती ही रहती है और प्रत्येक ६ माह पर हमें उसकी मरम्मत का ध्यान रखना चाहिए ,नहीं तो यही छोटी-मोटी टूट-फूट / दरार बढ़ते -बढ़ते इतनी हो जायेगी कि मकान की कोई छत या दीवार ढह जायेगी .अपने जीवन को हँसी -खुशी बिताने के लिए अपने शरीर का बस इतना ही ध्यान रखना है हमें .

धूप में छाता लेकर चलना या बारिश से बचने की कोशिश तो एक बचपना है क्योंकि इसी जल और अग्नि से तो शरीर बना है .ये तो शक्ति प्रदान करते हैं,इनसे डरना कैसा?

अब मैं प्रतिदिन की दिनचर्या पर चर्चा करना चाहूंगी कि हम कैसे जीते हैं ?

हम सुबह उठते हैं. रात भर का लेटा हुआ शरीर एक ही दशा में ६-७ घंटे रहता है और अकड़न में आ जता है . धर्मग्रन्थ सिखाते हैं कि जग कर पहले धरती को प्रणाम करना चाहिए . इसके पीछे हमारे अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है .अकडा हुआ शरीर जब धीरे धीरे झुक कर हाथों की उँगलियों से धरती का स्पर्श करता है तो धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति शरीर में एकत्र हो चुकी अनावश्यक धनात्मक एवं ऋणात्मक ऊर्जाओं को ग्रहण कर लेती है.और शरीर हल्का-फुल्का हो जाता है, जब हम मुड़ते या झुकते हैं तो अकड़न टूट जाती है .उसके बाद अगर हम नंगे पैर जमीन पर उतारते हैं तो पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पुनः काम करती है और विसर्जित करने योग्य मल पदार्थों को शरीर से बाहर निकलने हेतु आवश्यक ऊर्जा देती है .जबकि आज के समय में कालीन ,चटाई ,स्लीपर और चप्पलें आदि हमें पृथ्वी के संपर्क में आने से रोकटी हैं और अनावश्यक ऊर्जाएं इसीशारीर में भ्रमण करती रह जाती हैं जो कई रोगों का कारण बनती हैं. जिनमें अपच ,अनिद्रा , और जोड़ों में दर्द प्रमुख हैं .

शरीर में रोग पनपने का एक और महत्वपूर्ण कारण ये यूरिया है जो हमारे सभी अनाज ,फल ,फूल और सब्जियों में ही नहीं डिब्बा बंद खाद्य-पदार्थों में भी पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है ,इसे हम दिन भर में ११ -१२ बार यूरिन डिस्चार्ज करके बाहर निकाल सकते हैं ,लेकिन हम सोचते हैं कि कौन इतना पानी पीये ,बार बार कौन जाए टायलेट .हम ये जहर शरीर में ही एकत्र करते रहते हैं जो पथरी ,मोटापा ,शूगर हड्डियों की कमजोरी आदि बीमारियों का जनक है.

हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हमारा दिमाग है ,जिसे तेज बनाए रखने के लिए ५० वर्ष पहले तक सर में सरसों का तेल लगाने की परम्परा थी .अब ये परम्परा फैशन की भेंट चढ़ गयी है और नतीजा आँखें कमजोर होने ,बाल सफ़ेद होने ,बाल झड़ने , याददाश्त कम होने ,सर दर्द ,माईग्रेन के रूप में सामने आता है

हमें प्रकृति के साथ रहना चाहिए ,मिट्टी पानी आग और हवा से दोस्ती रखनी चाहिए ,शायद तभी हमारा शरीर हमें सुख देगा .
पहला सुख निरोगी काया .

1 comments:

संगीता पुरी ने कहा… 21 अप्रैल 2010 को 6:05 am

बहुत बढिया जानकारी !!

 
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