!! उत्सव गीत !!() संजीव 'सलिल'

परिकल्पना साकार हो,
परिकल्पना साकार हो...
*
अवध में स्वागत पधारें.
गगन से तारे निहारें.
गोमती-सरयू की लहरें-
पुलक आशिष दें-गुहारें.
राम-सिय का धाम-
अंतरजाल का आगार हो.

परिकल्पना साकार हो,
परिकल्पना साकार हो...
*
शब्द-अक्षर के पुजारी.
राह जग देखे तुम्हारी.
भारती की आरती-मिल
साथ हम सबने उतारी.
ग्राम जग, परिवार वसुधा-
हर ह्रदय में प्यार हो.
परिकल्पना साकार हो,
परिकल्पना साकार हो...
*
आस का सूरज उगायें.
नित नए सपने सजायें.
भेँट भुज भर, लग गले हम-
गैर को अपना बनायें.
हास अधरों पर 'सलिल'-
अब श्वास का श्रृंगार हो.
परिकल्पना साकार हो,
परिकल्पना साकार हो...
* ****

( तकनीकी कारणों से उत्सव गीत के साथ ऑडियो प्रसारित नहीं कर पा रहे हैं जिसके लिए हमें खेद है )

7 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 6:36 pm

परिकल्पना साकार हो,

sangeeta swarup ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 7:46 pm

बहुत सुन्दर..... साकार हो रही है परिकल्पना..

Sadhana Vaid ने कहा… 18 अप्रैल 2010 को 7:50 am

अति सुन्दर ! समस्त शुभकामनायें स्वीकार करें !

दिगम्बर नासवा ने कहा… 18 अप्रैल 2010 को 4:25 pm

'सलिल'जी की अनुपम रचना ... बहुत ही सुंदर ...

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा… 29 अप्रैल 2010 को 12:19 am

गीत 'पुरी' में 'रश्मि', ने 'पंकज' को ले साथ.
शुभाशीष दे 'सलिल' के, सिर पर रक्खा हाथ.

मिलकर गले 'रवींद्र' ने, उज्जवल किया 'प्रभात'.
नव्य-भव्य 'परिकल्पना', बनी दिव्य अवदात..

'सलिल' साधना-रश्मिमय, साधक लखे स्वरूप.
शुभ प्रभात कह नासवा, बाँटे खुशी अनूप..

धन्य लखनवी सभ्यता, सबसे भुजभर भेट.
है-कर आनंदित 'सलिल', खुशियाँ बाँट-समेट..

alka sarwat ने कहा… 7 मई 2010 को 10:56 am

हम इस अनोखे ब्लागोत्सव के साथ हैं
ये ब्लॉग के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा
और सलिल जी को इस मर्मस्पर्शी कविता के लिए साधुवाद

 
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