मेरा नाम है शुभम सचदेव । मेरी उम्र है चार साल तीन महीने । पता है मेरा जन्म-दिवस कब होता है ३१ दिसम्बर को । मम्मी कहती हैं एक दिन बाद में होता तो नया साल और तुम्हारा जन्म-दिन हम एक साथ मनाते । अब साल के आखिरी दिन मनाते हैं , पर इसमें मेरी गलती थोडे ही है ,मम्मी भी तो हर काम जलदी-जलदी करती है तो मैं भी जलदी आ गया । आप मेरी मम्मी को जानते हैं न , मुझे मम्मी से कहानियां सुनना बहुत अच्छा लगता है । पापा भी कभी-कभी कहानी सुनाते हैं , लेकिन कहानी से ज्यादा मस्ती करते हैं , तो मैं भी मस्ती करने लगता हूं । मुझे यैलो कलर बहुत अच्छा लगता है । मैं य़ू.के.जी. में एयरफ़ोर्स स्कूल में पढता हूं । मुझे मेरा स्कूल बहुत अच्छा लगता है लेकिन वहां का सख्त अनुशासन कभी-कभी मुझे पसंद नहीं आता । मैं म्यूजिक और डांस भी सीखता हूं । आज इस उत्सव में मैं भी अपनी तीन मौलिक कहानियों के साथ उपस्थित हुआ हूँ . अब क्या करूँ मुझे इस उत्सव की जानकारी बाद में हुई है नहीं तो मैं भी पाखी दीदी की तरह मेले के पहले दिन ही उपस्थित होता . खैर मेरी कहानियां पढ़िए और बताईये कि भविष्य में मैं प्रेमचंद की तरह लिखूंगा या नहीं ? मम्मी कहती है कि वे बड़े कथाकार थे और मैं छोटा कथाकार ....ये रही मेरी तीनों कहानियां -


!! एक कौआ !!


एक बार न एक कौआ था , वह फ़्लाई कर रहा था तो उसे बहुत प्यास लगी थी । पर उसके पास पानी नहीं था । फ़िर उसनें पता है क्या किया ?
क्या किया ?
वो अपने घर चला गया
, और घर जाकर उसनें पता है क्या किया ?
क्या किया ?
उसनें नींबू पानी पिया । उसको फ़िर से प्यास लग गई ।
तो फ़िर उसनें क्या किया ?
उसनें पता है फ़िर पानी में ग्लूकोज़ डाल कर पिया तो उसकी प्यास भागी
-भागी कर गई ।
और कौआ फ़िर से फ़्लाई करने लगा ।

!!.डागी डब्बू !!

एक डागी था , उसका नाम था डब्बू ।
वह ना अपने घर जा रहा था , तो उसनें पता है क्या देखा ?
क्या देखा ?
डागी नें एक बनाना देखा । पता है बनाना कहां पडा था ?
कहां पडा था ?
गली में
, और उसके ऊपर तो मोटो( मच्छर ) भी बैठे थे और डागी नें वो बनाना खा लिया ।
फ़िर पता है डागी के पेट में कीडे आ गए ।
क्यों डागी के पेट में कीडे क्यों आ गए ।
उसनें गंदा बनाना खाया था न ।
छी
-छी कितनी गंदी बात की न डागी नें ।गंदी चिज्जी खाना गंदी बात होती है न ।
हां , गंदी चिज्जी खाना तो बहुत ही गंदी बात होती है । तुम कभी गंदी चिज्जी नहीं खाना ।
मैं तो अच्छा बच्चा हूं न गंदी चिज्जी कभी नहीं खाता । आप भी मत खाना ।
ओ .के. मैं भी कभी गंदी चिज्जी नहीं खाऊंगी । फ़िर डागी नें क्या किया ?
फ़िर डागी नें मैडिसन ली ।
कौन सी मैडिसन ली ?
जो आप नहीं मुझे देते हो कभी
-कभी वार्म्स वाली मैडिसन ।
हां
.....
वही मैडिसन डागी नें भी ली
, तो सारे कीडे भाग गए ।
फ़िर डागी की मम्मी नें उसको जोर से डांटा ।
कैसे ?
आगे से गंदी चिज्जी खाओगे
, सेअ सारी मैं आगे से गंदी चिज्जी नहीं खाऊंगा ।
तो डागी नोई
-नोई करने लगा , सारी मम्मी प्लीज़ फ़ारगिव मीं , मैं आगे से गंदी चिज्जी नहीं खाऊंगा ।
और वो अच्छा बच्चा बन गया ।

!!.रैबिट और कछुए !!

एक बार एक रैबिट नें एक कछुए को पता है क्या बोला ?
क्या बोला ?
रैबिट नें बोला
:- देखो तुम कितने गंदे बच्चे हो , भागी-भागे नहीं कर सकते ।
फ़िर कछुए नें पता है क्या बोला ?
क्या बोला ?
कछुए नें बोला, तुम मेरे साथ रेस लगाकर देखो , मै तो तुमसे ज्यादा भागता हूं ?
रैबिट नें बोला हां हम रेस लगाएंगे ।
तो कछुए नें पता है क्या किया ?
क्या किया ?
कछुए नें रैबिट को बोला, हम दोनों तो फ़्रैण्ड हैं और उसे एक चाक्लेट भी खाने को दी ।
रैबिट नें चाक्लेट खा ली । फ़िर दोनों भागी-भागी करने लगे ।
फ़िर पता है क्या हुआ ?
क्या हुआ ?
रैबिट को वोमेट होने लगी ।
क्यों रैबिट को वोमेट क्यों होने लगी ?
कछुए नें जो चाक्लेट दी थी वो गंदी वाली थी न, इसी लिए ।
इस लिए गंदी चिज्जी नहीं खानी चाहिए न \हां गंदी चिज्जी भी नहीं खानी चाहिए और किसी से भी चिज्जी लेकर नहीं खानी चाहिए, न ही किसी से मांगनी चाहिए ।
हा, नहीं तो वोमेट हो जाती है । मैं तो किसी से चिज्जी नहीं लेता । मै तो अच्छा बच्चा हूं न , मुझे तो वोमेट नहीं होगा ।
हां आपको तो वोमेट नहीं होगा, पर फ़िर रैबिट नें क्या किया ?
फ़िर रैबिट तो वोमेट करने लगा और कछुआ भागी -भागी करके जीत गया ।

() () ()

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7 comments:

mala ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 8:20 pm

शुभम सचदेव की तीनों कहानियां की तारीफें जितनी की जाए कम है ...आनंद आ गया इस उत्सव में शामिल होकर !

पूर्णिमा ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 8:28 pm

प्रयास सराहनीय है !

रश्मि प्रभा... ने कहा… 26 अप्रैल 2010 को 8:46 pm

अले शुभम तुम तो बाले प्याले हो ..... फ्लाई करता कौवा ,डब्बू डौगी,और रैबिट कछुए की कहानी तो बहुत अच्छी है,
और सुनाओ ना , मेरा आशीर्वाद तुमको... रखा है सर पे हाथ , यूँ ही चलो हमारे साथ

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 27 अप्रैल 2010 को 9:42 am

वाह ! बाल-प्रतिनिधित्व देखकर सदैव ही हरषित होता है मन !

संगीता पुरी ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 4:51 pm

बच्‍चो की भाषा में ज्ञानवर्द्धक रचनाएं लिखा है शुभम सचदेव ने .. पढकर बहुत अच्‍छा लगा !!

सुधाकल्प ने कहा… 19 मई 2012 को 1:31 pm

Good boy kii achchhii. achchhii kahaniyan hain.
Sudha Bhargava

सुधाकल्प ने कहा… 19 मई 2012 को 1:43 pm

Sachdev
Tumharii kahaniyon kii style ek dam naii hai.Itnee saral,it nee sahaj kahanii hamne kabhee padhee hee nahin .Hamko to tumse bahut kuchh siikhna hai .

 
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