स्वप्न मंजूषा 'अदा' हिंदी की वेहद लोकप्रिय महिला चिट्ठाकारों में से एक हैं । ये एक संवेदशील कवयित्री भी हैं । राँची में पैदा हुई, दिल्ली थी कर्मभूमि अब ओट्टावा....आईये हिंदी युग्म की काव्य गोष्ठी में उनके द्वारा प्रस्तुत कविता पुरषोत्तम सुनते हैं उनकी ही आवाज़ में । यह ऑडियो विशेष रूप से उनके द्वारा परिकल्पना ब्लॉग उत्सव के लिए प्रेषित किया गया है ।



पुरुषोत्तम

त्याग दिया वैदेही को
और जंगल में भिजवाया
एक अधम धोबी के कही पर
सीता को वन वन भटकाया
उस दुःख की क्या सीमा होगी
जो जानकी ने पाया
कितनी जल्दी भूल गए तुम
उसने साथ निभाया
उसने साथ निभाया
जब तुम कैकई को खटक रहे थे
दर दर ठोकर खाकर,
वन वन भटक रहे थे
अरे, कौन रोकता उसको
वह रह सकती थी राज-भवन में
इन्कार कर दिया था उसने
तभी तो थी वह अशोक-वन में
कैसे पुरुषोत्तम हो तुम !
क्या साथ निभाया तुमने
जब निभाने की बारी आई
तभी मुँह छुपाया तुमने ?
छोड़ना ही था सीता को
तो खुद छोड़ कर आते
अपने मन की उलझन
एक बार तो उसे बताते !
तुम क्या जानो कितना विशाल
ह्रदय है स्त्री जाति का
समझ जाती उलझन सीता
अपने प्राणप्रिय पति का
चरणों से ही सही, तुमने
अहिल्या का स्पर्श किया था
पर-स्त्री थी अहिल्या
क्या यह अन्याय नहीं था ?
तुम स्पर्श करो तो वह 'उद्धार' कहलाता है
कोई और स्पर्श करे तो,
'स्पर्शित' !
अग्नि-परीक्षा पाता है
छल से सीता को छोड़कर पुरुष बने इतराते हो
भगवान् जाने कैसे तुम 'पुरुषोत्तम' कहलाते हो
एक ही प्रार्थना है प्रभु
इस कलियुग में मत आना
गली गली में रावण हैं
मुश्किल है सीता को बचाना
वन उपवन भी नहीं मिलेंगे
कहाँ छोड़ कर आओगे !
क्योंकि, तुम तो बस,
अहिल्याओं का उद्धार करोगे
और सीताओं को पाषाण बनाओगे ...
()स्वप्न मंजूषा 'अदा'

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9 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 4:16 pm

बधाई हो स्वप्न मञ्जूषा जी, सीता की स्थिति को सशक्त आवाज़ दी है,
यह रचना मन को उद्वेलित करती है

Udan Tashtari ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 6:36 pm

बहुत सुन्दर!!

sangeeta swarup ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 7:44 pm

बहुत सुन्दर.....स्त्री के मन को बखूबी कहा है....रचना और स्वर दोनों ही बेमिसाल

Sadhana Vaid ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 7:53 pm

अदाजी आपने बहुत ही भावप्रवण कविता की रचना की है और आपकी आवाज़ में उसका काव्य पाठ मन्त्र मुग्ध कर गया ! आपको बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनायें !

संगीता पुरी ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 7:57 pm

रचना तो गजब की है ही .. सुनने में भी उतनी ही अच्‍छी लगी !!

GUHAR ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 11:56 pm

अदा जी , हर शब्द में सच्चाई है, स्त्री को हर युग अलग अलग रूप में ज़ख्म मिले हैं..और शायद मिले हैं इसलिए आपकी आवाज़ की बुलंदी सीधे दिल में उतरती है ..लिखते रहिये , बहुत अच्छा लगा "पुरुषोतम " सुनकर ..

वाणी गीत ने कहा… 18 अप्रैल 2010 को 3:23 am

छल से सीता को छोड़कर पुरुष बने इतराते हो
भगवान् जाने कैसे तुम 'पुरुषोत्तम' कहलाते हो...
राम के प्रति अगाध श्रद्धा के बावजूद कुछ प्रश्न यक्ष प्रश्न जैसे ही हैं जो प्रत्येक संवेदनशील ह्रदय को आंदोलित करता है ....
बहुत मधुर आवाज़ में खूबसूरत प्रविष्टि ...!!

पूर्णिमा ने कहा… 23 अप्रैल 2010 को 8:00 pm

अदा जी को सुनना अच्छा लगा ...बधाई !

 
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