आज के ब्लॉग उत्सव को एक मुकाम देने के उद्देश्य से श्री सुनील सिंह डोगरा स्वर दे रहे हैं हिंदी की वरिष्ठ महिला चिट्ठाकार श्रीमती निर्मला कपिला जी की एक ग़ज़ल को,जिसका शीर्षक है - फूल जैसे बचपने में खेली पली है जिन्दगी/क्या पता किस आग में फिर क्यूं जली है जिन्दगी... 



पुन: परिकल्पना पर वापस जाएँ 


10 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 1:17 pm

बचपन की कोमलता से आग सी ज़िन्दगी के दर्द को जितने संवेदित ढंग से निर्मला जी ने लिखा है,
सुनील जी ने उतनी ही कशिश से उसे उभारा है.... हादसों की गठरी खुली तो आखिर इस उत्सव में
, समय ने पेश तो किया इसे हमारे बीच

arun c roy ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 2:15 pm

parikalpna saakaar roop le rahi hai... kapila ji ke shabdo ki kamvedna ko aur bhi jiwant kar diya hai dogra ji ne! Hindi blogging ke itihaas me ek naya adhyaya hai parikalpna! kalpana se kahi aage

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 4:05 pm

निर्मला जी की ग़ज़ल को सुनील ने जिस तरह पेश किया है उस की गुणवत्ता में उछाल आ गया।

दिगम्बर नासवा ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 5:58 pm

कमाल की ग़ज़ल और उतना ही मधुर स्वर ....
सोने पर सुहागा ...

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 6:02 pm

बहुआयामी परिकल्पना को साकार होते देख रहा हूँ हर करवट में !
पहले दिन की हर प्रस्तुति उतर रही है मन में ! सोच रहा हूँ इस उत्सव का मूल्य !
निर्मला जी की इस गज़ल का बेहद प्रभावी गायन ! सुनील जी का आभार !
उभर-चमक रहे हैं ब्लॉग-रत्न ! साकार हो रही है परिकल्पना !

मनोज कुमार ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 6:43 pm

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 7:11 pm

... बेहद सराहनीय कदम ... शानदार प्रस्तुति .... बधाईंया व शुभकामनाएं !!

विनोद कुमार पांडेय ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 11:08 pm

खूबसूरत स्वर में एक सुंदर ग़ज़ल...बहुत कर्णप्रिय लय ...सुनकर अच्छा लगा....

Udan Tashtari ने कहा… 17 अप्रैल 2010 को 7:41 pm

बहुत उम्दा रचना निर्मला जी की और उस पर से सुनील जी का स्वर और प्रस्तुति..चार चांद लग गये.

निर्मला कपिला ने कहा… 18 अप्रैल 2010 को 11:02 am

धन्यवाद रविन्द्र जी और इस उत्सव के लिये शुभकामनअयें

 
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