कवि पन्त की मानस पुत्री श्रीमती  सरस्वती प्रसाद जी का जन्म आरा (शाहाबाद) में हुआ . इन्होने १९६३ में हिंदी प्रतिष्ठा के साथ स्नातक की शिक्षा ली .  पुस्तकें पढ़ने से गहरा लगाव , कलम हमजोली बनी , अपनी भावनाओं को कविता , कहानी और संस्मरण का रूप देना . यह कार्य इनका स्वान्तः सुखाय है . कभी किसी पत्रिका में छप जाना ही इनका  गंतव्य नहीं था , फिर भी कुछेक रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपीं . 'कादम्बिनी' के एक मुखपृष्ठ पर (तब संपादक अवस्थी जी थे) इनकी  कविता की निम्नांकित पंक्तियाँ थी -

"किसकी बाहें बढ़के मेरी कल्पना में
दमकते नौलाख तारे टाँकती हैं "
 श्री मती सरस्वती प्रसाद जी  की कहानी को इस उत्सव में शामिल करते हुए हमें गर्व की अनुभूति हो रही है .



!! मूढीवाला !!

() सरस्वती प्रसाद  


गर्म हवा के झोंके उदंडता पर उतारू होकर खिड़की किवाड़ पीट रहे थे ! पिघलती धूप में प्यासे कौवे की काँ s s काँ s s में घिघिआहट भरा विलाप शामिल था . मैं घर के काम-धाम से निबटकर हवा की झाँय-झाँय , सांय- सांय को अन्दर तक महसूसती अपने कमरे में लेटने की सोच ही रही थी कि गेट खुलने की आवाज़ आई .

उफ़ ! कौन होगा अभी ... सोच ही रही थी कि एक परिचित हांक कानों में आई- मूढ़ी है . आवाज़ ऐसी जैसे कह रही हो - आपको इंतज़ार था, लीजिये हम आ गए .

कुफ्त होकर मैं स्वयं में बड़बड़ाई - यह मूढीवाला भी ... समय-असमय कुछ नहीं देखता ! साधिकार ऊँची आवाज़ में हांक लगा रहा है- मैं जगी हूँ या सोयी, इससे बेखबर !.....

उसे विश्वास है, मैं मूढ़ी लेने निकलूंगी . बडबडाते हुए स्टोर रूम से मूढ़ी का डब्बा निकालकर मैंने बाहर का दरवाज़ा खोला ! दरवाज़ा खुलते ही लू के ज़ोरदार थपेड़े झुलसा गए .

पर मूढीवाला वातावरण से बेखबर बरामदे में मूढ़ी वाली पोटली और छिटपुट समान रखकर इत्मीनान से बैठ चुका था ! पोटली खोलने के क्रम में उत्साहित होकर बोला -' बहुत कुरकुरी मूढ़ी लाया हूँ और आपकी मनपसंद चीज इमली भी है ' .

मैंने सामने की ओर दृष्टि उठाई , कोलतार की सड़क जेठ की भरी दुपहरी में लावे की तरह पिघल रही थी ! पसीने से लथपथ मैंने मूढीवाले को देखा और पूछ बैठी ' जूते हैं ना ? '

मूढीवाला सहज भाव से बोला ' जूते पहने हुए ही आया हूँ मालकिन , अभी बरामदे में आते समय नीचे निकल कर रख दिया है '. मेरा ध्यान जूतों की ओर गया - रबर के काले जूते धूप में तपकर जलते होंगे ... ! इस सोच को झटककर मैंने मूढीवाले से पूछा - ' मूढ़ी घर में बनाते हो या खरीद कर लेट हो ?'

' मूढ़ी मेरे घर में मेरी माँ बनाती है मालकिन - मेहनत- मजूरी में जो धान मिलते हैं, उसीसे बनाती है ! काफी मेहनत का काम है मूढ़ी बनाना , पर परिवार को चलाने के लिए देह तो चलाना ही पड़ता है !'

' तुम्हारी पत्नी क्यूँ नहीं बनाती ?'

' कभी वही बनाती थी--- थी बड़ी फुर्तीली , पर बीमार क्या पड़ी अच्छी होने का नाम ही नहीं लिया ! मेरे पास जो थोड़ा बहुत खेत बधार था उसे बंधक रखकर रांची के बड़े अस्पताल में ले गया ! सोचा था बच जाएगी तो दिन लौट आयेंगे , पर मेरी सारी दौड़-धूप पर पानी फिर गया . वह दगा देकर चली गई ! अब घर में मैं , बूढ़ी माँ और तीन बच्चे हैं , बडावाला ८ ९ का होगा - घरेलु कामधाम में दादी की मदद करता है . '

मेरा मन कैसा तो होने लगा , यूँ ही बोल उठी - ' बच्चों को पढ़ाना मूढीवाले - बड़ेवाले को स्कूल भेजो, गाँव में स्कूल तो होगा ही

'स्कूल तो है ,पर कॉपी किताब पेंसिल...! पहनने को साफ़ सुथरे कपड़े .. पार नहीं लगता '

मैंने सूखे गले से सहानुभूति दिखाई, जो बेकार थी . कहना चाहा - ' किताबें कापियां और ...' भीतर का मन बोला - हुंह कब तक !

मूढीवाले ने अपना समान उठाया - ' अब चलता हूँ, देर हो रही है ' और सर पर मूढ़ी की बोरी रखे आगे बढ़ गया .

मैं उसे जाते देखती रही - गेट बन्द करके आगे बढ़ते ही उसने पूर्ववत सहजता से हांक लगे - ' मूढ़ी है ' और तेज तेज क़दमों से चलते हुए

आँखों से ओझल हो गया.

दो रूपये की मूढ़ी और दो रूपये की इमली के साथ मूढीवाले की कहानी लिए मैं अन्दर आ गई और देर तक सोचती रही .... कितने दृश्य बने ,

मिटे , धुंधलाये और अंत में मुझे बच्चन जी की ये पंक्तियाँ याद आईं -

"दिन जल्दी-जल्दी ढलता है

बच्चे प्रत्याशा में होंगे

नीड़ों से झांक रहे होंगे

ये ध्यान परों में चिड़ियों के

भरता कितनी विह्वलता है..."

बरसों बीत गए, आज तक मूढीवाला मेरी यादों में है

() () ()
 

7 comments:

संगीता पुरी ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 12:07 pm

बरसों बीत गए, आज तक मूढीवाला मेरी यादों में है
कुछ यादें सचमुच पीछा नहीं छोडती !!

mala ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 1:30 pm

सचमुच कुछ यादें हमेशा पीछा करती है ....यह कहानी नहीं यथार्थ को रेखांकित करता संस्मरण है , बहुत अच्छा लगा

रश्मि प्रभा... ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 1:42 pm

यादें कभी सुकून, कभी दर्द बन जाती हैं

पूर्णिमा ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 1:46 pm

बहुत खूब, बहुत सुन्दर ....पढ़कर आनंद आ गया !

गीतकार /geetkaar ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 1:48 pm

आदरणीया सरस्वती जी को नमन और रवीन्द्र जी को आभार इस खुबसूरत कहानी की प्रस्तुति के लिए !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा… 4 मई 2010 को 3:43 pm

Amma ki kahani, iss pyare se Blogotsav kee jubani.....:)

Bahut khub!! ........:)

ρяєєтι ने कहा… 4 मई 2010 को 3:50 pm

yaade yaad aati hai... love U Ammaa...

 
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