वाराणसी के डा.अरविंद मिश्र हिंदी विज्ञान कथाकारों की उस पीढी से हैं जिसमे हरीश गोयल, देवेन्द्र मेवाडी सदृश्य लेखकों के नाम हैं। ये भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति के सचिव हैं ! साईब्लाग [sciblog]  और क्वचिदन्यतोअपि..........!  इनके दो व्यक्तिगत ब्लॉग हैं ......प्रस्तुत है उनका सोमरस से संवंधित रहस्यमय आलेख -


‘सोम’ या सोमरस की चर्चा शायद ही किसी न सुनी हो! सोमरस यानि सोम नामक जड़ी बूटी  से प्राप्त होने वाला देवताओं का प्रिय पेय, किन्तु अब अलभ्य। ऋग्वेद में विस्तार से वर्णित चमत्कारिक पादप-लता या जड़ी बूटी ‘सोम’ का अब अता पता ही नहीं है जिससे कथित ‘सोमरस’ प्राप्त होता था। ऋग्वेद में ऋचाओं का एक पूरा ‘मण्डल’ (नवम मण्डल) ही सोम को समर्पित है- जहा सोम को ‘देवत्व’ प्रदान किया गया है। सोम के एक नही अनेक चमत्कारिक गुणों का वर्णन ऋग्वेद में हुआ है- "यह बल और ओज वर्धक है, घावों को तुरत फुरत ठीक करने की क्षमता से युक्त है, इसके नियमित सेवन से चिर युवा बना रहा जा सकता है और यह अनेक रोग व्याधियों से मुक्ति दिलाने की अद्भुत क्षमता युक्त है।" यहाँ तक कि देवों के राजा इन्द्र को सोमरस के पान से सहसा ही बलवान हो उठने के अनेक वृत्तान्त हैं। वर्णन है कि वे सोमपान करके असुरों की विशाल सेना का संहार कर डालते थे ... ... आखिर अब यह अमृत तुल्य औषधीय पेय कहा लुप्त हो गई? क्या सोम प्रसंग केवल कपोल कल्पना ही है? इस चमत्कारिक पेय का क्या ऋग्वेद तथा उत्तरवर्ती ग्रन्थों में अतिशयोक्ति भरा वर्णन महज आदि ऋषि मनीषियों की स्वैर कल्पनायें (फंतासी) ही हंै? विद्वानों ने ‘सोम’ पर काफी शोध किया है और अब तक कोई दर्जन भर पादपों-औषधियों के ‘सोम’ होने की दावेदारी की जा चुकी है (बाक्स-१)। दावेदारी की फेहरिस्त में एक नया नाम उभरा है- ‘यार सा गुम्बा’ (yar-tsa-gumba)। ‘यार सा गुम्बा’ के बारे में जानने के पहले आइये हम ‘सोम’ के लिए किये गये दूसरे दावों पर भी एक नजर डालते चलें।



वैदिक साहित्य के एक विद्वान आर्थर एन्थनी मैकडॉनेल (१८५४-१९३०) ने ऋग्वेद के हवाले से ‘सोम’ पर अच्छी खासी चर्चा की है। उनके अनुसार वैदिक काल में विधिवत ‘सोम अनुष्ठान’ का प्रावधान था, जिसमें ‘सोम’ को देवता तुल्य मानते हुए ‘सोमरस’ देवराज इन्द्र सहित अन्य देवों को अर्पित किया जाता था। सोम शब्द संस्Ñत के जिस धातु से बना है उसका अर्थ है दबाना-‘press’ या ‘cruch’ करना। यानि सोम रस ‘सोम’ को दबाकर (निचोड़कर!) निकाला जाता था- ऋग्वेद के नवें मण्डल में १२० सूक्तियाँ ‘सोम’ की ही प्रशंसा में हैं। मैकWडानेल के अनुमान से सोमरस एक मादक-नशीला पेय था जिसे ऋग्वेद में ही प्राय: ‘मधु’ (मधुर पेय के अर्थ में) या इन्दु (चन्द्रमा के समान उजला) कहा गया है। इसका रंग भूरा या हरीतिमा लिए लाल-गुलाबी वर्णित है। सोम के डंठल को पत्थर के टुकड़ों से दबाकर - कूट पीसकर और भेड़ के Åन से बने छनने से छानकर ‘सोमरस’ प्राप्त करने और उसे काठ के कलशों में रखे जाने का उल्लेख है। सोमपान अतिशय आह्लादकारी और अमरता प्रदान करने वाला बताया गया है। यह वाक्शक्ति को बढ़ाने के साथ ही चिन्तन मनन को भी स्फुरण देने वाला कहा गया है। विवरणों से यह भी जानकारी मिलती है कि सोम को पारसी धर्म की पुस्तक ‘अवेस्ता’ में हाओमा (haoma) कहा गया है और यह पहाड़ों पर ही मिलती थी, ऐसा वर्णित है।

कहाँ लुप्त हो गया सोम?

अफसोस है कि वैदिक काल के बाद के वा³मय में ‘सोम’ की जान पहचान को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती दीखती है। जिसका सबसे रोचक विवरण वाल्मीकि रामायण (युद्ध काण्ड, ७४वाँ एवं १०१वाँ सर्ग) में है- राम-रावण युद्ध में एक नही दो-दो बार राम और लक्ष्मण की प्राण रक्षा के लिए हनुमान को संजीवनी बूटी (या सोम?) लेने के लिए पहाड़ों (हिमालय तक) जाना पड़ता है (सोम का पहाड़ी उद्गम!) किन्तु वे दोनों बार संजीवनी की सही पहचान कर पाने में असमर्थ होकर सम्बन्धित पूरे पहाड़ को ही उखाड़ लाते हैं। वैसे तो यह एक काव्यात्मक अतिशयोक्ति है किन्तु इससे स्वयं ग्रन्थकार की ‘सोम’ की पहचान न करने की विवशता ही इंगित होती है। यहाँ स्पष्ट संकेत है कि रामायण-महाभारत (महाकाव्य) काल तक सोम की वास्तविक पहचान पूरी तरह से लुप्त हो चुकी थी। आगे सोम शोधार्थियों ने तरह-तरह के कयास लगाने शुरू किये। कभी मधु के छत्ते जिसे दबा-निचोड़कर ही मधु प्राप्त की जाती है तो कभी ईख-गन्ने (जिसे भी दबाकर (पेर कर) रस निकालते है को सोम कहा गया। भांग जिसे सिल बट्टे पर कूट पीस कर पीने योग्य बनाया जाता है भी कुछ लोगों की राय में ‘सोम’ है। गांजा आदि को भी सोम तुल्य कहा गया है। ईरानी धर्मग्रन्थ में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ है- यहाँ का सोम वहाँ ‘ह·ओम’ है। मजेदार बात यह है कि हिन्दू अनुष्ठानों में आज भी ‘होम’ करने का प्रचलन है जो सम्भवत: सोम (होम) अनुष्ठान की ही एक स्मृति शेष परम्परा है और अब भी ‘होम’ में ‘सोमरस’ न सही ‘पंचामृत-चरणामृत’ बाँटने का प्रावधान है। अब आज के अनुष्ठानकत्र्ता सोम पायें भी तो कहाँ से, अत: उसके स्थान पर तरह-तरह के पेय नुस्खों से ही काम चलाया जा रहा है। वैसे कालान्तर की एक वैदिक ऋचा में सोम-अनुष्ठान में आयोजक यह चिन्ता भी प्रगट करते हैं कि "वे वास्तविक ‘सोम’ की अनुपलब्धता के चलते देवताओं को वैकल्पिक पेय अर्पित कर रहे हैं और इस धृष्ठता के लिए उन्हें क्षमा कर दिया जाय ... ..."।

सोम की दावेदारियाँ

"सोम" की अब तक की ससबसे प्रबल दावेदारी १९६८ में एक शौकिया फफूँद प्रेमी (ethnomycologist)आर० गार्डन वैसन द्वारा की गयी। उन्होंने अपनी चर्चित पुस्तक, ‘सोम : डिवाईन मशरुम आफ इम्मार्टेलिटी’ में एक प्रजाति की खुम्बी (कुकुरमुत्ता, गुच्छा)- ‘फ्लाई एगैरिक’ (amanita muscaria) को ही सोम माना है। अपनी फफँूद विशेषज्ञ पत्नी वैलेन्टाइना के साथ किये गये शोध के परिणाम स्वरुप उनका संयुक्त दावा था कि सोम की विशेषताओं का जैसा विवरण ऋग्वेद में है वह सटीक रुप से मशरुम की उक्त प्रजाति में विद्यमान है। यहाँ एक रोचक तथ्य यह भी है कि मशरूम की कुछ बेशकीमती प्रजातियों को सूअर संँूघ कर जमीन के नीचे से खोदकर निकालते हैं। इसी सन्दर्भ में ही इन पंक्तियों के लेखक की निगाह अथर्ववेद में एक जगह (पंचम मंडल, सूक्त-१६) सोम के बारे में इस वर्णन पर गयी कि "तुम्हें वाराह ने नाक से खोदा ... ..." और प्रथम काण्ड के सूक्त-१५ में भी "मैं तुम मधुरमयी को खोदता हूँ"। मशरूम की ही कई प्रजातियों को परम्परा से प्रशिक्षित सूअरों द्वारा जमीन के भीतर से खोद कर निकलाने का प्रचलन यूरेशिआई देशों में रहा है। हो न हो सोम के लिए किसी मशरूम की दावेदारी ही सही हो-मगर कई विद्वानों ने मशरूम के दावे का खण्डन भी किया है।

कुछ विद्वानों के मतानुसार एक पादप-इफेड्रा (efedra) भी सोम हो सकता है जिसका सेवन आज भी ईरान वासियों में आनन्दानुभूति के लिए किया जाता है- इसे ईरान में बोलचाल की भाषा में "होम" भी कहते हैं। लेकिन इस दावे का सबसे कमजोर पहलू है कि इफेड्रा भारत में उगता ही नहीं । हाँ, कई मध्य एशियाई देशों में इसकी बहुतायत है। इफेड्रा से निकलने वाला सक्रिय रसायन (alkaloid) ‘इफेड्रीन’ जहाँ ‘उत्तेजक’ (Stimulant)(Depressent) है। और मादक पदार्थ, ‘एम्फीटेमाइन’ के समान है, वहीं फ्लाई-एगैरिक मशरूम का सक्रिय रसायन एक अवसादक है। चूँकि वैदिक सोमपान से उत्पन्न लक्षण ‘उत्तेजना’ उत्पन्न करने के सदृश है अत: ‘अमैनिटा मशरूम’ की जगह इफेड्रा को ‘सोम’ या उसका उपयुक्त प्रतिनिधि मानने वालों की संख्या अधिक है। इन दोनों पौधों

के अलावा कैनाबिस (Hemp-भांग, गाजा) सीरियन रयू, पीगैनम हर्मला

;(Peganum harmala) नील कमल (Blue Lotus-Nelumbonucilera) आदि के दावे भी सोम के लिए किये गये हैं। डेविड फ्लैटरी नामक अनुसन्धानकर्ता ने ‘पीगैनम हर्मला’ से प्राप्त जूस-रस को चैतन्यता प्रदान करने वाला बताया है। यह भारत में भी प्राप्य है।

रुस के कई स्थलों (तुर्कमेनिस्तान, कोराकम मरुथल) में अभी हाल ही के वर्षों में हुए कई उत्खननों में धार्मिक स्थलों से दर्जन भर ‘सिरामिक’ कटोरों में कैनाबिस, अफीम और इफेड्रा का मिश्रण पाया गया था। इसका वर्णन विक्टर सैरियानिडी नामक शोधार्थी ने १९९४ में विस्तार से किया है।

आज भी कई तिब्बती मठवासियों (Monks) में कुछ मशरुम प्रजातियों से प्राप्त पदार्थों के सेवन से मादकता की अनुभूति की जाती है जिसका रोचक विवरण टेरेन्स मैकेन्ना नाम के शोधार्थी-लेखक ने अपनी पुस्तक ‘द फूड आफ गॉड्स’ में किया है। जिन सभी मशरुम प्रजातियों की दावेदारी हुई है वे फफूँदियों के ‘वेसिडीयोमाइसीटीज’ परिवार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

क्या भारतीय ‘सन’ ही सोम है?

अकेले कैनाबिस (सन, पटसन-भारतीय हेम्प) के पौधे जिसके विभिन्न हिस्सों से भाँग, गाँजा चरस, हशीश आदि मादक पदार्थ-औषधियों (डेल्टा-९ टेट्राहाइड्रो कैनाबिनाल) को प्राप्त किया जाता है, सोम की प्रबल दावेदारी करता है। १९२१ में ‘जर्नल आफ द रायल एशियाआटिक सोसाइटी’ में ब्रजलाल मुखर्जी का एक बहुचर्चित लेख "द सोमा प्लान्ट" प्रकाशित हुआ था जिसमें भारतीय सन (Cannabis sativa) को ही सोम कहा गया। तर्क यह दिया गया था कि इसकी अत्यधिक मात्रा भी ली जा सकती है और आनन्दानुभूति (Blissful State) की लम्बे समय तक अनुभूति की जा सकती है जैसा कि ‘सोम’ के बारे में ऋग्वेद में वर्णित है। आज भी कितने ही साधु-सन्यासी भाँग गाँजे के व्यसनी पाये जाते हैं। सिंधी सूफियों में ‘भाँग की ठंडई’ का प्रचलन भी रहा है। शिव भक्तों में तो भाँग का सेवन सबसे प्रिय है। भाँग की सूखी पत्तियों को गुलाब की पंखुड़ियों, पोस्तादाना, काली मिर्च आदि के साथ सिलबट्टे से महीन पीसकर मलमल के कपड़े से छानकर चीनी दूध मिलाकर भांग युक्त ठंडई तैयार की जाती है। ब्रजलान मुखर्जी का दावा था कि यह सारी प्रक्रिया ‘सोमपान’ के वैदिक अनुष्ठान की ही प्रतीति कराती है।

... और अब एक नयी दावेदारी!

जो भी हो, सोम की दावेदारी में अब एक नया नाम भी जुड़ गया है- "यार सा गुम्बा" तिब्बती बोल चाल की भाषा के इन शब्दों का मतलब है "जाड़े में कीड़ा, गर्मी में घास’ (Summer grass-winter worm)। यह फफूँद और एक पतंगे (Larvae of Chongcao bat moth) के परजीवी सम्बन्ध की देन - कैटर पिलर-मशरुम (भुनगा-मशरूम) है, जिसकी बड़ी रोचक दास्तान है। होता यह है कि तिब्बत और चीन के कुछ इलाकों (क्विंघई, जिजांग, युन्नन), भूटान, सिक्किम तथा हिमालय, उत्तरांचल के कुमायूँ, पिथौरागढ़ (धारचूला, मुंशियारी) की पहाड़ियों पर उक्त पतंगे जाड़े से थोड़ा ही पहले अंड़े देते हैं जिससे भुनगे (Caterpillar) निकलकर उदर पोषण की तलाश में भटकना शुरू करते हैं और तब तक बर्फ गिरनी शुरु हो जाती है। अत्यधिक Åँचाइयों पर कोई शरणस्थली न होने से ये भुनगे अस्तित्व रक्षा के लिए भूमिगत होते हैं किन्तु एक कीट भोजी कवक-फफूँद प्रजाति (Entomophilic Fungus) की चपेट में आ जाते हैं जिनकी जड़े इनके शरीर को वेधकर इनसे जाड़े भर पोषण प्राप्त करती हैं। जब बर्फ पिघलती है और ग्रीष्म ऋतु दस्तक देती है तो फफूँद के तन्तु अब तक मृत इन भुनगों के शरीर से फूट पड़ते हैं- घास की तरह। इसलिए ही इस फफूँद और भुनगे के मिश्रित स्वरुप को स्थानीय लोगों में ‘यार सा गुम्बा’- "जाड़े में कीड़ा, गर्मी में घास" के नाम से जाना जाता है। अरुणांचल प्रदेश की अत्यधिक Åँचाई वाले भागों में भी इसके पाये जाने की रिपोर्ट है। कुमायूँ में इसे ‘कीर घास’ तथा चमोली में ‘मिती मन्ना" कहा जाता है।

कहते हैं कि ‘यार सा गुम्बा’ चीन और तिब्बत की एक मशहूर पारम्परिक औषधि रही है जिसके बारे में यह दावा है कि इसे सबसे पहले चीन के कुछ चरवाहों ने अकस्मात ही खोज लिया था। उन्होंने पाया था कि उनके वृद्ध मवेशी भी एक खास तरह की घास-बूटी खाकर शक्ति-Åर्जा से भर उठते थे। मध्य हिमालय के कुमायूँ की पहाड़ियों में इसकी खोज का श्रेय वहाँ तिब्बती मूल के प्रवासियों- खम्बास जनजाति के लोगों को है। अब यह चिप्लाकोर, ब्रâमकोट उल्टापाश आदि क्षेत्रों में भी मिल रही है।
‘यार सा गुम्बा’ का नाम सहसा चर्चा में १९९३ में आया जब चीन के एथलीटो ने जर्मनी की खेल प्रतिस्पर्धा - वल्र्ड आÅटडोर ट्रैक में नौ विश्व कीर्तिमानों को भी तोड़ दिया। कारण यह था कि वे नियमित रुप से ‘यार सा गुम्बा’ से निकलने वाले रसायन-‘कार्डीसेप्स’ का इस्तेमाल करते थे। इसे अब व्यापारिक ‘कार्डीसेप्स सी एस-४’ (डीहाइड्रेटेड हाट वाटर इक्स्ट्रैक्ट) के नाम से दुनियाभर में आकर्षक पैकिंग में बेचा जा रहा है। इसका रासायनिक संघटन है-१८ प्रतिशत बीटा ग्लूकागान; २ प्रतिशत एडीनोसीन। इसका लैटिन नाम है- Cordyceps Sinensis तथा प्रचालित नाम- ‘कैटर पिलर मशरूम’ है।
इस तरह ‘सोम’ की दावेदारी के रुप में अब ‘यार सा गुम्बा’ का नाम भी जुड़ गया है। मगर शायद अभी भी मनुष्य की जिज्ञासु वृत्ति असली सोम की खोज में लगी हुई है और कोई आश्चर्य नहीं यदि शोधरत विज्ञानी देर सबेर ‘सोमरस’ कलश को मानवता के हाथ थमा दें।
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बाक्स-१
इन पौधों में किसे कहेंगे सोम?

कुछ वर्षों पहले वनस्पति विज्ञानी एवं लोकप्रिय विज्ञान लेखक और विज्ञान परिषद, प्रयाग की आमुख पत्रिका ‘विज्ञान’ के पूर्व सम्पादक श्री प्रेमचन्द श्रीवास्तव ने वैदिक सोम के साहित्य का विशद् अध्ययन किया था और दर्जन भर पौधों-लताओं की फेहरिस्त तैयार की थी, जिन्हें कई अध्येताओं ने ‘सोम’ अथवा ‘सोम’ के तुल्य माना है। विवरण निम्नवत है:-



वनस्पति का नाम .................अध्येता सन्दर्भ

सारकोस्टेमा एसिडम (मदार कुल)

Sarcostemma acidum..................................... डा० वाट, १९७०

पेरीप्लोका एफ+ाइला (मदार कुल)

Periploca aphylla...................................... ,, ,,

सेरोपेजिया ट्यूबरोसा

Ceropegia tuberosa................................डा० उस्मान अली एवं नारायण स्वामी, १९८२

एफिड्रा

Ephedra spp...................................... डा० वीरेश्वर गुप्त, १९५२

डा० मायर्स

टिनोस्पोरा कार्डिफोलिया (गिलोय,गुड़चि)

Tinospora cordifolia............................. डा० आर०एन० चोपड़ा (१९५८)

रुटा र्गेवियोलेन्स

(Ruta graveolens)................................ डा० आर०एन० चोपड़ा (१९५८)

सोरैलिया कैरिलिफोलिया

Psoralea corylifolia...............................,, ,,

वेर्नोनेनिया एन्थेल्मेन्टिका

Vernonia anthelmintica............................ ,, ,,

एरैलिया जिनसेग चीनी साहित्य में वर्णित

अमानिता मस्कैरिया (मशरुम).............................. डॉ० रिचर्ड गार्डन वासन (१९६९)

...................................................श्री एन०सी० शाह

पिम्पीनैला एनिसमु (धनिया कुल)

Pimpinella anisum.................................(तमिल साहित्य में वर्णित)

बाक्स-२

यहाँ भी वर्णित है ‘सोम’!

अल्डुअस हक्सले के प्रसिद्ध साइंस फिक्शन उपन्यास ‘द ब्रेव न्यू वल्र्ड’ में ‘सोमा बटी’ का उल्लेख है जिसे खाकर लोग आनन्द विभोर होते रहते हैं जिसे किसी भी तरह का कोई तनाव होता है तुरन्त ‘सोम’ वटी खा लेता है। अमेरिकन कवि जान ह्विटियेर (१८०७-१८९२) ने भी सोम सदृश पेय का वर्णन किया है। हिन्दुकुश पर्वतों को सोमा प्राप्ति का स्थान बताया गया है।

() डा.अरविंद मिश्र
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8 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 5:13 pm

महत्वपूर्ण जानकारी

mala ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 7:49 pm

यह उत्सव उस सोपान को प्राप्त कर लिया हैं जहां हर किसी की परिकल्पना नहीं पहुँचती है .....शुभकामनाओं के साथ !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा… 1 मई 2010 को 5:23 pm

इस महत्वपूर्ण जानकारी को यहां देख कर प्रसन्नता हुई। हार्दिक बधाई।
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गुफा में रहते हैं आज भी इंसान।
ए0एम0यू0 तक पहुंची ब्लॉगिंग की धमक।

अल्पना वर्मा ने कहा… 3 मई 2010 को 12:14 am

अद्भुत जानकारी!
यह तो संग्रहणीय पोस्ट है अरविन्द जी !धन्यवाद.

Udan Tashtari ने कहा… 3 मई 2010 को 6:44 am

अद्भुत...जानकारीपूर्ण.

Arvind Mishra ने कहा… 3 मई 2010 को 10:01 pm

शुक्रिया रवीन्द्र जी और सुधी पाठको का

sangeeta swarup ने कहा… 12 मई 2010 को 11:44 am

इस लेख से बहुत नयी जानकारी मिली ...धन्यवाद

 
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