आज मैं आपकी मुलाकात प्यार के जाने-माने स्तम्भ इमरोज़ से करवाने जा रही हूँ...

प्यार कभी दर्द,कभी ख़ुशी, कभी दूर ,कभी पास के एहसास से गुजरता है. हर प्यार करनेवालों का यही रहा अफसाना.

पर इन अफसानों से अलग एक प्यार- जहाँ कोई गम, कोई दूरी नहीं हुई, कोई इर्ष्या नहीं उठी, बस एक विश्वास की लौ प्रोज्जवलित रही ...विश्वास - जिसका नाम है इमरोज़ !

अमृता के इमरोज़ या इमरोज़ की अमृता - जैसे भी कह लें, एक ही अर्थ है.

तो मिलाती हूँ आपसबों को इमरोज़ से.

“नमस्कार इमरोज़ जी,

..........

शुरू करें हम अपनी बातें ख़ास?

..........

शुरू करती हूँ बातें उम्र के उस मोड़ से जहाँ आप एक युवक थे...वहाँ चढ़ते सूरज सी महत्वाकांक्षाएं होंगी...”





(१) कूची और कैनवास से आपकी मुलाक़ात कब हुई ?



इमरोज़ - बचपन मैंने पंछियों के साथ
तितलियों के साथ उड़कर देखा था
पर ख्यालों के साथ में
स्कूल में ड्राइंग कहीं भी नहीं थी
न प्राइमरी स्कूल में न हाई स्कूल में
पर मेरे हाथों में ड्राइंग थी
अपने आप आई हुई
मैं स्कूल की हर कॉपी पर
कुछ न कुछ बनाता रहता था
ब्रश के साथ मेरी मुलाकात


लाहौर के आर्ट स्कूल में हुई थी
आर्ट स्कूल में वाटर कलर के रंगों से
मैं तीन साल खूब खेला था
वो खेल अब भी जारी है...


कैनवस के साथ मेरी मुलाकात
ज़िन्दगी के स्कूल में हुई आर्टिस्ट होकर
जब रंगों से दोस्ती हुई अमृता से भी दोस्ती हो गई

कैनवस पर पहली पेंटिंग
मैंने अमृता के लिए ही बनाई थी.........

(२) ख़्वाबों की लकीरों से परे अमृता कब कैनवस पर उतरीं ?



इमरोज़- अमृता मेरे ख़्वाबों में नहीं आई
सीधी ज़िन्दगी में आ गई
वो बात और है
कि वो ख्वाब जैसी ज़िन्दगी है
मिलकर मैं ज़िन्दगी को भी मिलता रहा
और साथ अपने आपको भी मिलता रहा
साथ मिलकर चलते चलते

अपने आप ज़िन्दगी राह भी होती रही
और मंजिल भी
एक दिन चलते चलते उसने पूछा
तेरा क्या ख्याल है
ज़िन्दगी सच है कि सपना
मैंने उसकी बोलती आँखों को देखकर कहा
ज़िन्दगी सपने जैसा सच भी है
पर तेरे साथ .....
उसके आने पर
मुझे लिखना आया
और उसको देख देख लिखा ...
तू अक्षर अक्षर कविता
और कविता कविता ज़िन्दगी ....

कभी कभी खूबसूरत ख्याल
खूबसूरत बदन भी धार लेते हैं ....

(3) अमृता नज़्म बनकर आईं या ज़िन्दगी ?
इमरोज़ - अमृता ज़िन्दगी बनकर आई
और कविता बनकर मिली

एक खूबसूरत माहौल बनाकर
सुबह शाम करती रही
रसोई करती तो वो भी मज़े से करती

वो ज़िन्दगी के सपने देखती
और सपने उसकी नज्में लिखते .....

(४) कैसा लगता है इमरोज़ जी जब आपको प्यार का स्तम्भ कहा जाता है ?
इमरोज़ - जिन्होंने ये कहा है मेरे बारे में
उनसब मेहरबान लोगों का
बहुत-बहुत शुक्रिया

(५) आज की भागती ज़िन्दगी में आप क्या सोचते हैं? क्या महसूस करते हैं?
इमरोज़ - सुकून उसमें है जो आपके पास है
और जो मिला हुआ है
वो ज़िन्दगी का सुकून बन जाता है
पर जो भाग रहे हैं
वे बहुत कुछ चाहते हैं
बहुत कुछ
चाहत की दौड़ कभी ख़त्म नहीं होती
ये ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है
खाना सेहत बनाता है
पर ज़रूरत से ज्यादा खाना
ज़हर भी बन जाता है

(६ ) आपकी चित्रकला का मुख्य केंद्र अमृता प्रीतम के अलावा और क्या रहा ?
इमरोज़ - मैं रंगों से खेलता हूँ
और रंग मुझसे
रंगों से खेलते खेलते
मैं भी रंग हो जाता हूँ
कुछ बनने ना बनने से
बेफिक्र बेपरवाह

कभी कभी खेलते खेलते
कुछ अच्छा भी बन जाता है
वो ही अच्छा मेरी पेंटिंग बन जाती है
मैं अपने लिए अपने आपको
पेंट करता हूँ
लोगों को सोचकर
मैंने कभी कुछ नहीं बनाया
लोगों को सोचकर कभी भी पेंटिंग नहीं हो पाती

(७ ) एक प्रेमी से अलग आपकी क्या सोच रही?
इमरोज़ - मेरी सोच....
किताबें पढ़ने से लिखना पढना आ जाता है
और ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
प्यार होने से प्यार का पता लगता है
सिंगलिंग्रों ने पढ़ाई तो कोई नहीं की पर ज़िन्दगी से पढ़ लिया लगता है. सिंगलिंग्रों की लड़की जवान होकर जिसके साथ जी चाहें चल-फिर सकती हैं, दोस्ती कर सकती हैं और जब वो अपना मर्द चुन लेती हैं. एक दावत करती हैं, अपना मर्द चुनने की ख़ुशी में. अपने सारे दोस्तों को बुलाती हैं और सबसे कहती हैं कि आज अपनी दोस्ती पूरी हो गई और उसका मनचाहा सबसे हाथ मिलाता है, फिर सब जश्न मानते हैं।


कुछ दिनों से ये दावत और ये जीने की दलेरी ये साफगोई मुझे बार बार याद आ रही है. मेरे एक दोस्त को उम्र के आख़री पहर में मोहब्बत हो गई. एक सयानी उम्र की खूबसूरत औरत से, जो खूबसूरत कवि भी है, दोस्त आप भी मशहूर शायर है...मोहब्बत के बाद दोस्त की शायरी में एक खूबसूरती बढ़ने लगी है पर उसके घर की खूबसूरती कम होनी शुरू हो रही है !

जब किसी का घर से बाहर ध्यान लग जाता है, तो उसके घर का ध्यान टूट जाता है. वो पत्नी के पास बैठा भी, पत्नी के पास नहीं होता घर में होकर भी घर में नहीं होता अब घर भी घर नहीं लगता, पत्नी भी पत्नी नहीं लगती ! रिश्ता अपने आप छोट गया है, पर संस्कार नहीं छोट रहे वो माना हुआ सयाना है , कॉलेज में फिलोसोफी पढ़ाता रहा है - कई साल !

आस-पास के लोगों की मुश्किलें आसान कर देनेवाले को आज अपनी मुश्किल का हल मिलना मुश्किल हो गया है... ज़िन्दगी दूर खड़ी हैरान हो रही है !

मोहब्बत करनेवालों को जाने की राह नहीं नज़र आ रही ! राह तो सीधी है, पर संस्कारों के अँधेरे में नज़र नहीं आ रहा ! जब से पत्नी को मर्द की मोहब्बत का पता लगा है , वह हैरान तो है , मगर उदास नहीं !

पूछा सिर्फ हाजिर से जा सकता है, गैर हाजिर पति से क्या पूछना ? वह चुपचाप हालात को देख रही है और अपने अकेले हो जाने को मानकर अपने आपके साथ जीना सोच रही है !

मोहब्बत यह इलज़ाम कबूल नहीं करती कि वो घर तोडती है ! मोहब्बत ही घर बनाती है, ख्यालों से भी खूबसूरत घर... सच तो ये है कि मोहब्बत बगैर घर बनता ही नहीं.

पत्नी अब एक औरत है अपने आप की आप- जिम्मेदार और बदमुख्तियार चारों तरफ देखती है ,घर में बड़ा कुछ बिखरा हुआ नज़र आता है !कल के रिश्ते की बिखरी हुई मौजूदगी और एक अजीब ख़ामोशी भी ....वह सब बिखरा हुआ बहा देती है !

और चीजों को संवारती है, सजाती है और सिंग्लिरी लड़की की तरह एक दावत देने की तैयारी करती है !

मर्द को विदा करने के लिए और विदा लेने के लिए जा रहे मर्द की मर्जी का खाना बनाती है, मेज़ फूलों से सजाती है, सामने बैठकर खाना खिलाती है.... वो ऑंखें होते हुए भी ऑंखें नहीं मिलाता !

जाते वक़्त औरत ने पैरों को हाथ लगाने की बजाय मर्द से पहली बार हाथ मिलाया और कहा- पीछे मुड़कर न देखना, आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है और 'आज' में है , अपने आप का ख्याल रखना , मेरे फिकर अब मेरे हैं !

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है . पर आज ने रोज़ आना है ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी , आदर के साथ विदा लेने के लिए भी ....

(८ ) अब बहुत कुछ बदल गया है , अब आपकी दिनचर्या क्या होती है ?
इमरोज़ - उसकी धूप में
और अपनी छाँव में बैठा
मैं अपनी फकीरी करता रहता हूँ ...
पता नहीं ये फकीरी मुझे ज़िन्दगी ने दी है
कि ज़िन्दगी देनेवाले ने...

(९ ) अमृता जी के लिए क्या कहना चाहेंगे ?
इमरोज़ - सपना सपना होकर
औरत हुई
और अपने आपको
अपनी मर्जी का सोचा ...
फिक्र फिक्र होकर
कवि हुई
वारिस शाह को जगाया
और कहा- देख अपना पंजाब लहुलुहान ...
मोहब्बत मोहब्बत होकर
एक राबिया हुई
किसी से भी नफरत करने से
इनकार किया
और अपने वजूद से बताया
कि मोहब्बत किसी से भी नफरत नहीं करती
ज़िन्दगी ज़िन्दगी होकर
वो मनचाही हुई
मनचाहा लिखा भी
और मनचाहा जिया भी....
मैं अमृता पर
कितना भी बोल लूँ
अमृता अनलिखी रह जाती है ....
वो जब भी मिलती है
एक अनलिखी नज़्म नज़र आती है
मैं उस अनलिखी नज़्म को
कई बार लिख चुका हूँ
वो फिर भी अनलिखी ही रह जाती है
हो सकता है
ये अनलिखी नज़्म
लिखने के लिए हो ही
ना सिर्फ जीने के लिए ही है ....

(१० ) जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है?
इमरोज़ - हर जगह आदर
पहली तालीम होनी चाहिए
जो इस वक़्त कहीं नहीं
ना सोच में ना घर में ना ज़िन्दगी में
माँ बाप बच्चों के लिए आदर जानते ही नहीं
आदर करनेवाले माँ बाप हुकम कभी नहीं करते
स्कूलों में टीचर बच्चों के साथ
थप्पड़ों से गुस्से से
बच्चों का निरादर करते रहते हैं
आदर ना टीचरों में है ना किसी स्कूल के कोर्स में

आदर ज़िन्दगी का
एक खूबसूरत रंग भी है
हर मेल मिलाप हर रिश्ते का
लाजमी रंग और ज़रूरी अंग भी है
यहाँ तक कि
एक-दूसरे से विदा
होने के लिए भी आदर ज़रूरी है
और एक दूजे को विदा करने के लिए भी ज़रूरी ....

किसी को भी फूल देते वक़्त
कुछ खुशबू अपने हाथों को भी लगी रह जाती है ....
आदर रिश्तों की खुशबू है



(11 ) आप तो आम लोगों से बिल्कुल अलग हैं, शांत,स्थिर ..... फिर भी जानना चाहूँगी
क्या ज़िन्दगी में क्षणांश के लिए भी कोई शिकायत आपके मन को नहीं हुई?

इमरोज़ - एक छोटी सी शिकायत
जो बता सकते हैं
वो लोगों को क्यूँ नहीं बताते
कि पाप सोच करती है
जिस्म नहीं
गंगा जिस्म साफ़ करती है
सोच नहीं
शिकायत के लहजे में
कोई मुझसे पूछता है
कि मैं अपनी पेंटिंग पर
अपना नाम क्यूँ नहीं लिखता ?
मैंने कहा
मेरा नाम मेरी पेंटिंग का
हिस्सा नहीं बनता इसलिए......
वैसे किसी भी पेंटर का नाम
उसकी पेंटिंग का हिस्सा
कभी नहीं बना
जब कभी भी
मैंने शब्द तो बोले
पर अर्थ नहीं जिए
तब अपने आप से शिकायत होती रही है....
दूसरों से शिकायत करना
गुस्सा ही है
अपने से शिकायत अपनत्व ....!

यह मुलाक़ात अविस्मरनीय , अद्भुत, ज्ञानवर्धक रही ........... इस मुलाकात के दरम्यान मैंने जाना इमरोज़ प्यार का स्तम्भ ही नहीं, हम जिसे खुदा कहते हैं, उसकी परछाईं हैं.........



() रश्मि प्रभा

पुणे, महाराष्ट्र ( भारत )

खिलौने वाला घर…..मेरी भावनायें........ क्षणिकाएं……इनके प्रमुख व्यक्तिगत चिट्ठे हैं .

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13 comments:

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 4:40 pm

सवालों के जवाब कविता में। मन कविता कविता करने लगा।

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 5:45 pm

व्यक्तित्व ही, कृतित्व ही कवितामय !
प्रेम का अदभुत सौन्दर्य निखरा,बिखरा है यहँ सर्वत्र !
इस संवाद का मूल्य बहुत है हम सबके लिए ! आभार ।

मनोज कुमार ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 6:41 pm

अपने मन की सच्ची बातें कवि हृदय निकलकर पाठक के समक्ष इस तरह उपस्त्जित हो गई है कि पाठक को उन भावों के साथ तादातम्य अनुभव करने में बड़ी सुगमता होती है।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा… 15 अप्रैल 2010 को 11:05 pm

शुरुआत ही प्रभावी...बढ़िया प्रस्तुति.....धन्यवाद जी

ALOK KHARE ने कहा… 16 अप्रैल 2010 को 11:33 am

अदभुत kam कर रही हैं ये आप
एक शायर /पेंटर, जिसने रंगों को जिया,
शब्दों को पिरोया, अपनी असल जिन्दगी में
शाकछातकर बहुत ही इन्तेरेस्तिंग रहा

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा… 16 अप्रैल 2010 को 1:46 pm

asambhav vyaktitva...ruhaani baaten....bahur rangi saadgi .... avchetan bhi sachet....ek ek baat me hazaar baaten .... rashmi ji aur mumma (sangeeta swarup) inke zariye main mil paya imroz ji se..bahut bahut shuqriya ap sab ka..aur yah interveiw yad rahega.. :)

Manju Gupta ने कहा… 16 अप्रैल 2010 को 5:48 pm

प्रभावशाली साक्षात्कार के लिए रश्मि जी को बधाई .
आदर - प्रेम का संदेश मिला . जो इंसान को इंसान से जोड़ता है .

दिव्य नर्मदा divya narmada ने कहा… 16 अप्रैल 2010 को 11:53 pm

इमरोज़ जी से साक्षात्कार वस्तुतः जान दार है. साधुवाद. अन्तरंग तथा अछूते पहलुओं को उद्घाटित कर पाना आपकी सफलता है.

नीरज गोस्वामी ने कहा… 20 अप्रैल 2010 को 10:21 am

इमरोज़ जैसी शख्शियत के बारे में जितना जानो कम लगता है...बेहतरीन बातें जो जीने को नयी दिशा देती हैं...रश्मि जी का आभार
नीरज

शोभना चौरे ने कहा… 30 अप्रैल 2010 को 6:57 pm

भीड़ से अलग एक सुकून सी साँस मिलती है कुछ इसी तरह महसूस हुआ, ये साक्षात्कार पढ़कर |
रश्मिजी ,इमरोज जी के इस अलग से द्रष्टिकोण से इतनी सहजता से बात करने के लिए और हमे पढवाने का बहुत बहुत धन्यवाद |

kshama ने कहा… 22 जून 2010 को 2:30 pm

Bahut dinon baad tippanee de rahi hun...yah mulaaqaat na jane kaise meri nazar me nahi aayi...padhke ek ajeeb sukun aur bechaini donon ki anubhooti hui.

Aparna Manoj Bhatnagar ने कहा… 3 सितंबर 2010 को 9:16 pm

Rashmi ji, prabhavshaali interview! jis khoobsoorti se aapne milwaya aur jis sahajta se Imroz ji ke jawab mile - jitni taarif ki jaaye kam hai.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा… 14 सितंबर 2010 को 3:47 pm

बहुत बढ़िया रही यह मुलाकात ..इमरोज़ शख्सियत ही ऐसी है जिनसे बहुत परभावित हो जाता है मन

 
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