अपने बारे में ललित शर्मा कहते हैं कि -"परिचय क्या दुं मैं तो अपना, नेह भरी जल की बदरी हुँ। किसी पथिक की प्यास बुझाने, कुँए पर बंधी हुई गगरी हुँ। मीत बनाने जग मे आया, मानवता का सजग प्रहरी हुँ। हर द्वार खुला जिसके घर का, सबका स्वागत करती नगरी हुँ।" नुक्कड़…..एक लोहार की…..जबलपुर-ब्रिगेड….….चर्चा पान की दुकान पर…..ललितडॉटकॉम….ठेनेत्प्रेस.कॉम…..अड़हा के गोठ…..उल्टा तीर……आदि सामुदायिक और सामूहिक चिट्ठों में योगदान देने वाले श्री ललित शर्मा का एक ब्लॉग शिल्पकार के मुख से…. जून २००९ को आया और अपनी साफगोई से सबको मोह लिया विगत दिनों परिकल्पना फगुनाहट सम्मान के अंतर्गत इनके गीतों को काफी सराहा गया और इनके गीतों की जबरदस्त लोकप्रियता को देखते हुए परिकल्पना ब्लॉग उत्सव की टीम ने इनके दो मधुर गीतों को आज पूरे सम्मान के साथ प्रकाशित कर रहा है-













दो गीत : ललित शर्मा के


(एक)


!! देखो मेरा गाँव !!

हरियाली के चादर ओढे, देखो मेरा गांव ,
झूमके बरसी बरखा रानी,थिरक उठे हैं पांव,
मेरे थिरक उठे हैं पांव..............................

खेतों में है हल चल रहे, बूढे पीपल पर हरियाली,
अल्हड बालाओं ने भी, डाली पींगे सावन वाली,
गोरैया के संग-संग मै भी, अपने पर फैलाऊ,
मेरे थिरक उठे हैं पांव.................................

छानी पर फूलों की बेले, बेलों पर बेले ही बेले,
नवयोवना सरिता पर भी हैं,लहरों के रेले ही रेले,
हमको है ये पार कराती, एक मांझी की नाव,
मेरे थिरक उठे हैं पांव................................

भरे हैं सब ताल-तलैया,झूमी है अब धरती मैया,
मेघों ने भी डाला डेरा, छुप गए हैं अब सूरज भैया,
गाय-बैल सब घूम-घाम कर, बैठे अपनी ठांव,
मेरे थिरक उठे हैं पांव................................


(दो)

!! जैसे कोई गर्भपात हो गया !!

एक बीज से आस जगी थी,
मृगतृष्णा सी प्यास जगी थी,
सारा चौपाल सूना-सूना था,
जैसे गांव में आग लगी थी,
चारों तरफ़ सन्नाटा-ही सन्नाटा,
जैसे कोई सन्निपात हो गया,
उगे बीज को मरते देखा, जैसे कोई गर्भपात हो गया

तेरे इस विशाल नीले आँचल में,
पंख फैलाये उड़ता था मै,
प्रगति के नए सोपानों में,
नित्य सितारे जड़ता था मै,
मुझसे क्या अपराध हो गया,
मुझ पर क्यों आघात हो गया,
उगे बीज को मरते देखा, जैसे कोई गर्भपात हो गया,

पहले भी मै तडफा-तरसा था,
तू कभी समय पर बरसा था,
लिए हाथ में धान कटोरा,
मै फ़िर भी बहुत - बहुत हर्षा था,
नई सुबह की आशा में था,
सहसा ही वज्रपात हो गया,
उगे बीज को मरते देखा, जैसे कोई गर्भपात हो गया,

()ललित शर्मा 

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6 comments:

ललित शर्मा ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 3:35 pm

धन्यवाद रविन्द्र जी
मेरे गी्त परिकल्पना उत्सव में सम्मिलित करने के लिए।

कोटिश: आभार

संगीता पुरी ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 4:30 pm

भरे हैं सब ताल-तलैया,झूमी है अब धरती मैया,
मेघों ने भी डाला डेरा, छुप गए हैं अब सूरज भैया,
गाय-बैल सब घूम-घाम कर, बैठे अपनी ठांव,
मेरे थिरक उठे हैं पांव....
ऐसा ही होता है गांव !!
बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति !!

रश्मि प्रभा... ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 7:46 pm

खूबसूरत कल्पनाओं सी रचना

girish pankaj ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 8:50 pm

lalit sharmaa sahitya ki pathshalaa ke numbar one vidyaarthi hai. mujhe bahut ummeed hai iss lalit-kavbodh poorn sarjak se.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने कहा… 28 अप्रैल 2010 को 11:46 pm

सारगर्भित गीतों हेतु गीतकार और प्रकाशक दोनों को धन्यवाद..

M VERMA ने कहा… 29 अप्रैल 2010 को 5:11 pm

सहसा ही वज्रपात हो गया,
उगे बीज को मरते देखा, जैसे कोई गर्भपात हो गया.

झकझोर कर ठहर जाती रचना.

 
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