मैं  प्रिया  चित्रांशी  अदब, तहजीब, नजाकत नफासत के शहर लखनऊ में ही आँखे खोली. इसी शहर में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा ग्रहण की. विधि स्नातक करने के उपरांत कुछ दिनों तक लखनऊ- उच्च न्यायालय में प्रक्टिस भी की. लेकिन अदालती कार्यवाही और रवैये में मन नहीं रमा तो वहाँ से विदा ले ली. वर्तमान में एक प्राइवेट कंपनी में "प्रोसेस एनालिस्ट" के रूप में कार्यरत हूँ. कविता का शौक कब लगा ठीक से याद नहीं. पर हमेशा से कविताओं ने आकर्षित किया। हमेशा पढ़ते-पढ़ते कॉपी के पीछे के पन्नों पर कुछ लिख दिया करती और कुछ नजदीकी दोस्तों को सुनाया करती थी। वो सुनते और वाह-वाह करते, उनलोगों की प्रशंसा मन में अपार आनंद भर देती बस इसी तरह शुरूवात हुई इनके लेखन की. लिखा तो बहुत पर कभी अपनी रचनाओं का संकलन नहीं किया. कबाड़ी के हाथों बिकी उन नोटबुक्स पर लिखी मेरी कृतियों पर किसी ने समोसे खाए होंगे, तो किसी ने भेलपुरी. वक़्त के साथ ये शौक भी दम तोड़ चुका था, मेरी लेखनी भी सृजन कर सकती हैं पूरी तरह भूल चुकी थीं। पर वक़्त ने फिर करवट ली, एक खूबसूरत इत्तफाक हुआ, डॉ॰ कुमार विश्वास से मुलाकात हुई . छोटी सी मुलकात, गहरा असर डाल गई, दबा हुआ शौक अक्षरों के रूप में बाहर निकला और लेखनी को गति मिल गई। समय - समय पर ई - पत्रिका हिन्दयुग्म में रचनाये भेजती रहती हूँ और प्रकाशित होती रहती हैं. प्रस्तुत हैं  मेरी एक कृति -

!! कविता- बूँद !!

अंजाम से बेखबर बूँद जब आसमां से चलती है
कभी ज़मी उसकी राह तकती है,
तो कभी सीप उसके आने से डरती है,
फ़ना होना तो उसका मुक्कदर है,
फिर भी जिंदगी से प्यार करती है.
गिरी एक पत्ते पे तो शबनम बनी,
शायर की नज़र पड़ी तो ग़ज़ल बनी,
सूरज ने जो रोशनी से जो जलाना चाहा
बन तारे उसने धरा को सजाना चाहा,
नन्ही सी उम्र में सूरज को चुनौती दे दी,
जाते-जाते जहाँ को निशानी दे दी,
समंदर के पानी में मोती बन वो रहती है,
किसी के आँखों में दरिया बन वो बहती है,
कलियाँ ओस चख चटक जाती है,
तितलियाँ रस पी जवां हो जाती है,
पेड़ नई कोंपले रख नहाने को तैयार है,
बादल फिर धरा को भिगोने को बेताब है।
बूँद पलकों पे आंसू सजा बाबुल से जुदा होगी फिर,
सैया संग, उमंग ले भारी मन से विदा होगी फिर,
"धरा ससुराल" बहार संग स्वागत के लिए तैयार है,
एक नव-वधु का आज फिर दूसरे जहाँ में दीदार है

!!. याद बिल्कुल नहीं आते मुझे तुम !!

सोचते होगे के
तुम याद आते हो मुझे
गलत हो तुम
हमेशा की तरह
मैं उनमें से नहीं
के यादों की गठरी
साथ बाँध टहलू
गुज़रे को भूल
वर्तमान को जीती हूई
भविष्य का निर्माण
आदत है मेरी
कल एक कॉमन फ्रेंड
से मुलाकात हुई
उसके साथ मिल
तुम्हारी बुराई में
पूरा दिन गुज़ारा

शब् तक झगड़ पड़ी उससे
तुम्हारी बुराई में ....
मुझसे ज्यादा पार्टीसिपेट किया उसने
कोई तुम्हे बुरा कहे .....
ये बर्दाश्त नहीं मुझे
भले ही तुमने ना दिया हो
भले ही मैंने ना लिया हो
" हक"
कुछ कहने- सुनने का
अब कोई खुशफहमी मत पलना
यहीं
कि तुम मुझे याद आते हो
इतना तो याद ही होगा
कि एक्सपायरी डेट की दवा
नहीं रखती मैं मेडिकल बॉक्स में
जैसे मुझे याद हैं -
टेलकम पावडर
डाल -डाल कर तुम्हारा
जुराबे पहनना
सुधरे तो होंगे नहीं तुम
याद बिल्कुल नहीं आते मुझे तुम

!!प्रकृति, पुरुष और एक प्रयोग !!

सोचती हूँ
आज डूबने न दू सूरज को
साँझ साथ न काटूँगी
आज की रात
मैं तेरे खातिर
अपना घर , परिवार
सहेलियां, बचपन सब
त्यागने वाली हूँ
तू मेरे खातिर
एक रात नहीं ठहर सकता
ज्यादा से ज्यादा क्या होगा ?
लोग कहेंगे
एक बार सूरज ही नहीं डूबा
चाँद ही नही निकला
सितारे नही चमके आसमा पर
कुछ अध्यात्म से जोड़ेंगे
कुछ वैज्ञानिक रहस्य टटोलेंगे
फिर चर्चाओ का बाज़ार गर्म होगा
तुझ पर नया शोध होगा
ज्योतिषो की दुकान चल निकलेगी
बस ग्रहो के चाल बदलेगी
नाम तो है ही तुम्हारा
और प्रसिद्धी मिल जायेगी
मेरी बात जो मानोगे
तो चंनेल्स  को भी TRP मिल जाएगी
मैं जो कल थी
वही रह जाऊंगी
जननी तो स्रष्टी ने ही बनाया
तुम गर चाह लो तो .........
नियंत्रिका भी कहलाऊंगी
एक बार नैसर्गिक नियम तोड़ कर देखो ना
थोडा सा जोखिम लेकर देखो ना
तुम पुरुष हो और मैं प्रकृति
हम दोनो एक दूजे से ही है
तो फिर
मेरी बात मानने से इनकार क्यों ?
सुनो ना!
रुक जाओ
हमेशा तो सोचते हो
ब्रहमांड के बारे में
आज मेरे और अपने खातिर
अंधेरे को रोशन कर दो
24 घंटो का उजाला कर दो
वो भेड़ चाल कब तक चलोगे
कुछ नया प्रयोग करके देखो ना
ना डूबो आज पश्चिम में
एक रात तो धूप खिलाकर देखो ना
--------प्रिया
() () ()
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3 comments:

अल्पना वर्मा ने कहा… 19 मई 2010 को 4:33 pm

तुम पुरुष हो और मैं प्रकृति
हम दोनो एक दूजे से ही है
तो फिर
मेरी बात मानने से इनकार क्यों ?

एक प्रश्न जो अनुत्तरित रह जायेगा.
सभी कवितायेँ अच्छी लगीं.

M VERMA ने कहा… 19 मई 2010 को 5:01 pm

कल एक कॉमन फ्रेंड
से मुलाकात हुई
उसके साथ मिल
तुम्हारी बुराई में
पूरा दिन गुज़ारा
चलो इस बहाने याद किया उनको
फिर भी याद आते नहीं
सभी कविताएँ भावपूर्ण और सार्थक सन्दर्भों से युक्त

Mukesh Kumar Sinha ने कहा… 20 मई 2010 को 12:59 pm

damdaar kavita..........:)

 
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