वीर भगत सिंह की देश भक्ति
(प्रथम सर्ग)

जल -धरा -हवा -आकाश - आग 
जीवन के ये सारे हैं महातत्व
चलता इनसे चेतना में प्राण
प्रभु !बुद्धि का भर दो भंडार ।

करो कृपा हम पर करतार
दे दो बल - विद्या - ज्ञान अपार
स्पर्श -रूप -रस - गंध -शब्द से
हो जीवन में नव विद्या निर्धार ।

प्रभु ! अर्ज हमारी हो स्वीकार
न हो जीवन में ज्ञान अभाव
करें जग हितकर में सब काम
अहितकर में बुद्धि करे विराम ।

(द्वितीय सर्ग)

जब भारत माता जकड़ी थी
पैरों में बेड़ियाँ पड़ी थीं
जहाँ सूरज अस्त न होता था
ब्रिटिश हुकूमत चलती थी ।

कहर गुलामी का बरसा था
१८५७ का विद्रोह कुचला था
कम्पनी सरकार थी हिल गई
गोरों का शासन चलता था ।

भेद भाव की नीति उनकी
फूट डालो की राजनीति थी
साम्राज्यवाद की चाल चली
भारत की आजादी छीनी ।

ऐसे गहन अंधकार में
भारत की पवित्र भूमि पर
ज्योति किरन थी चमकी
तब मिट्टी धरा की महकी ।

धुंधले भारत के आंगन में
नव खुशियों की हवा बही
तब शहनाई भी बजी थी
आया क्रान्ति दूत अवतारी ।

बंगा के जिले लायलपुर में
२८ सितम्बर १९०७ को
किशन -विद्यावती के गृह में
जन्मा था महावीर भगत सिंह ।

(तृतीय सर्ग)

खुशियाँ पुत्र रतन की छाई
आंगन ने रंगोली सजाई
स्वागत में वंदनवार लगाई
दी आशीर्वादों ने बधाई ।

सबकी आँखों का था तारा
लगता "गुरु नानक"- सा प्यारा
अलौकिक - सी थी बाल लीला
ईश का था पैगाम लाया ।

क्रान्ति का सुनहरा प्रभात था
निडरता का प्रतिरूप था
अपने दु: ख -दर्द को भूला था
देश के दर्द का बवंडर था ।

विलक्षणता का परिचायक था
देश भक्ति का मतवाला था
न्याय धर्म का उपासक था
अन्याय के लिए आग था ।


मंजू गुप्ता
http://manjushrree.blogspot.com/





पुन: परिकल्पना पर वापस जाएँ 

5 comments:

कविता ने कहा… 31 मई 2010 को 2:20 pm

इस ओजपूर्ण रचना हेतु बधाई।

Shekhar Kumawat ने कहा… 31 मई 2010 को 5:57 pm

bahut sundar kavita he

shahid ko naman

सुनील गज्जाणी ने कहा… 1 जून 2010 को 10:45 am

manju jee ,pranam
lay badh ,chand badh kavya , puri jeevni ek nayak ki samne rakh di aap ne badhai,
sadhuwad

alka sarwat ने कहा… 5 जून 2010 को 4:49 pm

इन्हीं के जीवन से हमें सीख लेनी है
हर भारतीय में ऐसा भगत सिंह जन्मे

 
Top