मैं सर्वत एम जमाल अपने  निजी व्यवसाय [कृषि] से जुडा हूँ . ग़ज़ल कहना और ग़ज़ल की बारीकियों से सभी को अवगत कराना मुझे अच्छा लगता है ,इसके अलावा एक्यूप्रेशर चिकित्सा और शतरंज मेरा शौक है . मैं अपने आपको साहित्य का विद्यार्थी मानता हूँ और सिखाने की ललक मुझे दीवानगी की हद तक साहित्य के भीतर की यात्रा कराती रहती है . साहित्य की तह में जाकर जो भी मोती मैं ढूँढता हूँ उसे अपने ब्लॉग सर्बत इंडिया के माध्यम से व्यक्त कर देता हूँ .....प्रस्तुत है आज ब्लोगोत्सव में मेरी कुछ गज़लें-

(एक)
दूसरों पर ख़ुद को भारी करके देख
एक फतवा तू भी जारी करके देख

कैसे आवाजें दबाई जाती हैं
हक की खातिर मारामारी करके देख

अब गये वक्तों के किस्से मत सुना
आजकल ईमानदारी करके देख

एकता से प्यार नामुमकिन है अब
आपकी, उनकी, हमारी करके देख

खौफ तू भी जान जाएगा, जरा
शेर के ऊपर सवारी करके देख

यह शराफत कुछ नहीं दे पाएगी
एक दिन लहजा दुधारी करके देख
(दो)

ये हवा, कैसी भी हो, चलती तो है
रात काली ही सही ढलती तो है

है गुलामों में भी आजादी की ज्योति
आग मद्धम है मगर जलती तो है

हम बहुत खुश हैं, यही कुछ कम है क्या
आप को भी बेबसी खलती तो है

ख़ुद फरेबी ऐसी शय है, जो सदा
लाख बचिए, आप को छलती तो है

तुम उगा लो रोशनी के लाख पेड़
 तीरगी माहौल में पलती तो है

ख्वाब वालो आओ, लेकिन सोच लो
नींद आंखों से कभी टलती तो है

(तीन)

लोग कहते बदन से खाल तक
जबकि बिकते हैं यहाँ कंकाल तक

अब शिकारी की खुशी मत पूछिए
कुछ परिंदे आ गए हैं जाल तक

है सभी कुछ आदमी के हाथ में
बाढ़, सूखा, आंधियां,भूचाल तक

गांव में वर्दी का मतलब और है
जंगलों का राज है चौपाल तक

हमने देखे हैं हजारों अक्लमंद
हर किसी की सोच रोटी दाल तक

एक थोड़ी सी तरावट जब मिली
तुम बदल देते हो अपनी चाल तक

जान दे देता है सर्वत आदमी
आन की खातिर यहाँ कंगाल तक
(चार)

हर तरफ़ एक ही समां क्यों है
चेहरा चेहरा धुआं धुआं क्यों है

पांव से जब सरक चुकी है ज़मीन
सर पे यह नीला आसमां क्यों है

उन दिनों और बात थी, लेकिन
आज हर शख्स बेज़ुबां क्यों है

कोई परछाईं ही नहीं बनती
धुप सूरज से बदगुमां क्यों है

सोच में पड़ गए हैं सारे खेत
अब्र फसलों पे मेहरबां क्यों है

अब तो घर घर चिराग जलते हैं
रोशनी फिर यहाँ वहां क्यों है

कोई बतलाये एक बेचारी जुबान
इतने दांतों के दरम्यां क्यों है

(पांच)

शोर तो यही था ना ! बदगुमान हैं चेहरे
जबकि आप लोगों पर मेहरबान हैं चेहरे

आँख आँख शोले हैं दुश्मनों की सेना में
और तुम समझते हो खानदान हैं चेहरे

सौ जतन करो फिर भी मेल हो नहीं सकता
क्योंकि तुम तो धरती हो, आसमान हैं चेहरे

बस्ती बस्ती में सुनिए जिंदाबाद के नारे
पहले मुल्क होता था, अब महान हैं चेहरे

उन दिनों यही चेहरे सरफ़रोश होते थे
अब वतन फरोशों के मेज़बान हैं चेहरे

इस तरफ़ तिरंगा है, उस तरफ़ हरा परचम
लाख कीजिये कोशिश, दरम्यान हैं चेहरे

यार पिछले मौसम में शोर भी था, मातम भी
आज क्या हुआ सर्वत, बेज़बान हैं चेहरे
() () ()
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7 comments:

mala ने कहा… 19 मई 2010 को 1:37 pm

सार्थक रचना। हार्दिक बधाई।

पूर्णिमा ने कहा… 19 मई 2010 को 1:39 pm

बहुत सुन्दर रचना

गीतकार /geetkaar ने कहा… 19 मई 2010 को 1:54 pm

पढ़कर मन रोमांचित हो उठा..

वन्दना ने कहा… 19 मई 2010 को 2:21 pm

sabhi ek se badhkar ek....bahut khoob.

अल्पना वर्मा ने कहा… 19 मई 2010 को 4:39 pm

सभी गज़लें उम्दा हैं.
'तुम उगा लो रोशनी के लाख पेड़
तीरगी माहौल में पलती तो है '
--
ये हवा, कैसी भी हो, चलती तो है
रात काली ही सही ढलती तो है
-----
कोई परछाईं ही नहीं बनती
धुप सूरज से बदगुमां क्यों है
----------
तीसरी गज़ल तो बेहद बेहद उम्दा लगी...बहुत तीखे तेवर लिए है.

बस्ती बस्ती में सुनिए जिंदाबाद के नारे
पहले मुल्क होता था, अब महान हैं चेहरे
क्या कहने!बहुत खूब!

--
उन दिनों यही चेहरे सरफ़रोश होते थे
अब वतन फरोशों के मेज़बान हैं चेहरे

वाह! वाह!!वाह!!!

M VERMA ने कहा… 19 मई 2010 को 4:56 pm

सभी गज़ल लाजवाब, बेहतरीन और --
खौफ तू भी जान जाएगा, जरा
शेर के ऊपर सवारी करके देख
वाह क्या कहने
उन दिनों यही चेहरे सरफ़रोश होते थे
अब वतन फरोशों के मेज़बान हैं चेहरे
छू लिया मर्म को

kshama ने कहा… 19 मई 2010 को 8:09 pm

Baap re baap! In rachnaon pe kya comment kiya jay? Aapne khaamosh kar diya!

 
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