राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर रश्मि रवीजा जी वेहद संवेदनशील कथाकार के साथ-साथ हिन्दी की समर्पित चिट्ठाकार भी हैं . विगत दिनों इनकी श्रेष्ठ कथा यात्रा के लिए संवाद सम्मान से सम्मानित हैं . अपने बारे में रश्मि जी कहती हैं कि "पढने का शौक तो बचपन से ही था। कॉलेज तक का सफ़र तय करते करते लिखने का शौक भी हो गया. 'धर्मयुग',' साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'मनोरमा ' वगैरह में रचनाएँ छपने भी लगीं .पर जल्द ही घर गृहस्थी में उलझ गयी और लिखना,पेंटिंग करना सब 'स्वान्तः सुखाय' ही रह गया . जिम्मेवारियों से थोडी राहत मिली तो फिर से लेखन की दुनिया में लौटने की ख्वाहिश जगी.मुंबई आकाशवाणी से कहानियां और वार्ताएं प्रसारित होती हैं..यही कहूँगी "मंजिल मिले ना मिले , ये ग़म नहीं मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है" प्रस्तुत है इनकी एक ग़ज़ल और एक कविता   -

ग़ज़ल

लावारिस पड़ी उस लाश और रोती बच्ची का क्या हुआ,
मत पूछ यार इस देश में क्या क्या न हुआ

जल गयीं दहेज़ के दावानल में, कई मासूम बहनें
उन विवश भाइयों की सूनी कलाइयों का क्या हुआ

खाकी वर्दी देख क्यूँ भर आयीं, आँखें माँ की
कॉलेज गए बेटे और इसमें भला क्या ताल्लुक हुआ

तूफ़ान तो आया बड़े जोरों का लगा बदलेगा ढांचा
मगर चाँद पोस्टर,जुलूस और नारों के सिवा क्या हुआ

हर मुहँ को रोटी,हर तन को कपडे,वादा तो यही था
दिल्ली जाकर जाने उनकी याददाश्त को क्या हुआ

जब जब झलका आँखों में व्यर्थ सा पानी 'रविजा'
कलम की राह बस एक किस्सा बयाँ हुआ


कविता

 
!! ऊसर भारतीय आत्माएं !!

रात्रि की इस नीरवता में
क्यूँ चीख रही कोयल तुम
क्यूँ भंग कर रही,निस्तब्ध निशा को
अपने अंतर्मन की सुन
सुनी थी,तेरी यही आवाज़
बहुत पहले
'एक भारतीय आत्मा' ने
और पहुंचा दिया था,तेरा सन्देश
जन जन तक
भरने को उनमे नयी उमंग,नया जोश.
पर आज किसे होश???
क्या भर सकेगी,कोई उत्साह तेरी वाणी?
खोखले ठहाके लगाते, मदालस कापुरुषों में
शतरंज की गोट बिठाते,स्वार्थलिप्त,राजनीतिज्ञ में
भूखे बच्चों को थपकी दे,सुलाती माँ में
माँ को दम तोड़ती देख विवश बेटे में
दहेज़ देने की चिंता से पीड़ित पिता
अथवा ना लाने की सजा भोगती पुत्री में
मौन हो जा कोकिल
मत कर व्यर्थ अपनी शक्ति,नष्ट
नहीं बो सकती, तू क्रांति का कोई बीज
ऊसर हो गयी है,'सारी भारतीय आत्मा' आज. 
() () ()
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7 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 19 मई 2010 को 2:16 pm

भावनाओं का अविरल प्रवाह है इनकी लेखनी में

kunwarji's ने कहा… 19 मई 2010 को 2:16 pm

बेहतरीन है जी.....

हर पंक्ति लाजवाब है,



कुंवर जी,

वन्दना ने कहा… 19 मई 2010 को 2:18 pm

dono hi rachnayein lajawaab hain.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा… 19 मई 2010 को 3:23 pm

kya kahin tumhe, isamen bhi baaji maar gayi, are poore shayara ho gayin 'ravija' jod kar.
bahut sundar likha.

M VERMA ने कहा… 19 मई 2010 को 5:02 pm

नहीं बो सकती, तू क्रांति का कोई बीज
ऊसर हो गयी है,'सारी भारतीय आत्मा' आज.
सुन्दर प्रवाहमयी रचनाएँ बहुत सुन्दर

Mukesh Kumar Sinha ने कहा… 20 मई 2010 को 12:42 pm

हर मुहँ को रोटी,हर तन को कपडे,वादा तो यही था
दिल्ली जाकर जाने उनकी याददाश्त को क्या हुआ

ye roti kapra aur makan ka vada karne wale jo bhi hote hain, unke yaad-dasht aise hi kamjor hote hain......aur agar na hon to inki ahmiyat kaise bani rahegi........:(

kubhsurat rachna........!! ojaswi....:)

yahan bhi najar daurayen
http://utsav.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_7945.html

rashmi ravija ने कहा… 20 मई 2010 को 4:49 pm

बहुत बहुत शुक्रिया,सभी लोगों का

 
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