श्यामल सुमन यानी संघर्ष संघर्ष और लगातार संघर्षों से निकला एक साधारण इंसान जो अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और जीवन-कर्म के बीच की दूरी को निरंतर कम करने की कोशिश में आज भी संघर्षरत है. शिक्षा - स्नातक /तकनीकी शिक्षा - विद्युत अभियंत्रण में डिप्लोमा /सम्प्रति - प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर/ रुचि के विषय : नैतिक-मानवीय मूल्य एवं सम्वेदना.....छात्र जीवन से ही लिखने की ललक, स्थानीय समाचार पत्रों सहित देश के कई पत्रिकाओं में अनेक समसामयिक आलेख समेत कविताएँ, गीत, ग़ज़ल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित...स्थानीय टी.वी. चैनल एवं रेडियो स्टेशन में गीत, ग़ज़ल का प्रसारण, कई कवि-सम्मेलनों में शिरकत और मंच संचालन। अंतरजाल पत्रिका "अनुभूति, हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुञ्ज, आदि में अनेक रचनाएँ प्रकाशित। गीत ग़ज़ल संकलन प्रेस में प्रकाशनार्थ....प्रस्तुत है इनकी दो रचनाएँ -












!! अच्छा लगा !!


हाल पूछा आपने तो पूछना अच्छा लगा
बह रही उल्टी हवा से जूझना अच्छा लगा

दुख ही दुख जीवन का सच है लोग कहते हैं यही
दुख में भी सुख की झलक को ढ़ूँढ़ना अच्छा लगा

हैं अधिक तन चूर थककर खुशबू से तर कुछ बदन
इत्र से बेहतर पसीना सूँघना अच्छा लगा

रिश्ते टूटेंगे बनेंगे जिन्दगी की राह में
साथ अपनों का मिला तो घूमना अच्छा लगा

कब हमारे चाँदनी के बीच बदली आ गयी
कुछ पलों तक चाँद का भी रूठना अच्छा लगा

घर की रौनक जो थी अबतक घर बसाने को चली
जाते जाते उसके सर को चूमना अच्छा लगा

दे गया संकेत पतझड़ आगमन ऋतुराज का
तब भ्रमर के संग सुमन को झूमना अच्छा लगा

!! प्रेमगीत !!

मिलन में नैन सजल होते हैं, विरह में जलती आग।
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग।।

आए पतंगा बिना बुलाए कैसे दीप के पास।
चिंता क्या परिणाम की उसको पिया मिलन की आस।
जिद है मिलकर मिट जाने की यह कैसा अनुराग।
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग।।

मीठे स्वर का मोल तभी तक संग बजते हों साज।
वीणा की वाणी होती क्या तबले में आवाज।
सुर सजते जब चोट हो तन पे और ह्रदय पर दाग।
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग।।

चाँद को देखे रोज चकोरी क्या बुझती है प्यास।
कमल खिले निकले जब सूरज होते अस्त उदास।
हँसे कुमुदिनी चंदा के संग रोये सुमन का बाग़।
प्रियतम! प्रेम है दीपक राग।।
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4 comments:

अर्चना तिवारी ने कहा… 17 मई 2010 को 3:45 pm

बहुत सुंदर दोनों रचनाएँ

M VERMA ने कहा… 17 मई 2010 को 5:08 pm

श्यामल जी की गज़लो के क्या कहने .. शानदार
गीत भी बेमिसाल

रंजना ने कहा… 18 मई 2010 को 12:03 am

Shyamal jee ka vyaktitva aur unke krititva dono hi aise hain jo kisi ko bhi natmastak aur apna prashanshak bana le...

Unki rachnaon ka rasaswadan karwane hetu aabhar...

वन्दना ने कहा… 19 मई 2010 को 12:12 pm

दोनों ही कृतियाँ बेमिसाल हैं।

 
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