मुंबई, महाराष्टृ निवासी अमिताभ श्रीवास्तव लंबा सक्रिय जीवन पञकारिता को समर्पित रहा है . इनका कहना है कि चूंकि ये बगैर मिलावट के शुद्ध देशी घी हैं तो जल्दी हजम नहीं हो पाते हैं .साथ ही कुछ कमजोरियां भी हैं,जैसे- ईमानदार होना, स्पष्टवादी होना, मेहनती होना, सबका सम्मान करना, खूब पढना,खूब लिखना, और हां, जी हजूरी कभी कर पाना। लिहाजा यह घी पचता भी नहीं है। खैर फिक्र नहीं। व्यस्त रहने को सबसे बडा सुख मानते हैं ये .....इनका प्रमुख ब्लॉग है-अमिताभ कुछ ख़ास है प्रस्तुत है अमिताभ के रचना संसार से एक कविता --











!! पिता !!


पिता की कराहती आवाज़

हवा संग, ऊंचे पर्वतो

उबड़- खाबड़ रास्तो

खेत-खलिहानों, नदी -तालो

वृक्षों, उनके झुरमुटों के

बीच से होकर

इस महानगर की

भागती- दौड़ती

जिंदगी को चीरती

समय की

आपाधापी को फाडती

थकी -हारी

सीधे मेरे हृदय में

जा धंसती है औऱ

मैं लगभग बेसुध सा

तत्क्षण उनके पास

पहुंचने के लिए

अधीर हो उठता हूं

कि तभी

महानगरीय मकडी

अपने पूरे तामझाम के साथ

दायित्वों, कर्मो,

नौकरी - चाकरी

का तामसी, स्वार्थी

राक्षसी जाल बुनने

लगती है,

जिसमे फंस कर में

छुट्टिया लेने

छुट्टिया मिल जाने की

याचनामयी सोच

के संग तडपने लगता हूँ।

जाल और सोच के

इस युद्ध के मध्य

मस्तिष्क सुन्न हो जाता है।

गीता का सार

कुरान की आयते

या बाइबिल, गुरुवाणी की शिक्षाये

सब निष्फल हो कर

मेरी इस जंग में

हाथ मलते दिखती है।

समय जाता रहता है,

मेरी जरूरत,

मेरे होने का भाव

सब कुछ शून्य में कहीं

खो जाता है।

राक्षसी मकड जाल

कस जाता है,

महानगरी मकडी

मुझे लानत भेजती है

और अपने पुत्र होने पर

मुझे कोफ्त होती है।

ह्रदय में धंसी वो

आवाज़ भी कही

विलीन हो जाती है,

कि फोन आता है,

मैं ठीक हूँ

तुम परेशान मत होना

मेरे बेटे।

............................

काश

हर पिता के

साथ उसका बेटा

आजीवन रह सके,

ऐसा कोई

ईश्वरीय वरदान

प्राप्त हो सकता है क्या?

() अमिताभ श्रीवास्तव

परिकल्पना पर वापस जाएँ 

14 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा… 3 मई 2010 को 2:51 pm

काश कि इस वेदना में कोई आपका सहभागी हो सके...

पूर्णिमा ने कहा… 3 मई 2010 को 3:00 pm

आपकी रचना आकर्षित करती है .....आपको कोटिश: साधुवाद !

mala ने कहा… 3 मई 2010 को 3:11 pm

सुन्दर और सारगर्भित रचना, बधाई !

गीतकार /geetkaar ने कहा… 3 मई 2010 को 3:29 pm

मेरी ढेर सारी शुभकामनाएं !

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 3 मई 2010 को 5:19 pm

मन को आवाज देकर

तन्‍मय कर देने वाली

सु-कविता।

रश्मि प्रभा... ने कहा… 3 मई 2010 को 5:56 pm

जहाँ यह चाह है, वहाँ वरदान होता है, दूरी रहती कहाँ है!
बहुत ही अच्छी रचना

Udan Tashtari ने कहा… 3 मई 2010 को 6:30 pm

बहुत बढ़िया लगी रचना, बधाई.

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा… 3 मई 2010 को 7:32 pm

Amitaabh Ji,

Waakai Kuchh Khas hai.....


Mukesh K. Tiwari

अमिताभ मीत ने कहा… 3 मई 2010 को 8:21 pm

बेहतरीन !!

veerubhai ने कहा… 3 मई 2010 को 8:28 pm

makdi mahaanagariya ho yaa ghareloo ,jaal bunegi .jaal saaf kharidiye hoozoor .
jan jan ki har bete ki abhivyakti hai aapki kahi .
veerubhaai 1947.blogspot.com

सुरेश यादव ने कहा… 3 मई 2010 को 9:29 pm

अमिताभ श्रीवास्तव ,आप कि पिता के प्रति जो काव्य संवेदना है उसके लिए बधाई.

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा… 4 मई 2010 को 6:48 pm

आत्मिक भाव से लिखी एक प्यारी सुन्दर रचना। अद्भुत। मैं निजी तौर पर भी जानता हूँ उनके इस प्यार को। और आज जब उनकी लेखनी से इस प्यार की झलक देखी...... और शहरी जीवन की आपा धापी का भी जो वर्णन किया सच....... आज गुजरते इस दिन में इस रचना को पढकर ऐसा लगा जैसे कुछ सार्थक हुआ है।

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 27 मई 2010 को 7:08 am

अद्बुत संवेदना.. आत्मीय कविता के लिये आभार ।

 
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