भौतिक विज्ञान विषय से परास्नातक; शिक्षा, संगीत और जन-संचार विषयों से स्नातक; आकाशवाणी में ‘कार्यक्रम अधिशासी’पद पर कार्यरत सुश्री मीनू खरे ‘जन प्रसारण’के क्षेत्र में एक जाना-माना हस्ताक्षर हैं रेडियो के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दस से अधिक राष्ट्रीय एवँ अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित, जिसमे भारत सरकार द्वारा ‘आउटस्टैंडिंग साइंस रिपोर्टिंग इन कम्युनिकेशन इन इलेक्ट्रानिक मीडिया’का राष्ट्रीय पुरस्कार,अंतर्राष्ट्रीय रेडियो फेस्टिवल, ईरान में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित, ‘एशिया पेसेफिक इंस्टीच्यूट फॉर ब्राडकास्टिंग डेवलपमेंट’द्वारा पुरस्कृत, राष्ट्रीय एकता का ‘लासा कौल पुरस्कार’उल्लेखनीय; राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न सम्मानित पत्र-पत्रिकाओं में ‘रेग्युलर कॉलम’लेखन, कविता, कहानियाँ, लेख आदि प्रकाशित ‘साइंस इज़ इंट्रेस्टिंग’और ‘मीनू खरे का ब्लॉग’में नियमित लेखन . प्रस्तुत है उनकी एक कविता- 

पूरी तरह से बनावटी


'सिंथेटिक'
अंग्रेज़ी का एक शब्द
जिसका अर्थ है
कृत्रिम, मिश्रित, बनावटी या मिलावटी.
आज उन्हें देख
जब मैं मुस्कुराई
उन्हें अच्छा नहीं लगा
मेरा मुस्कुराना....

संतुष्ट नहीं हो पाए वे
मेरी मुस्कान से
कहने लगे
कैसे मुस्कुरा रही हो तुम?

मैं एक बार फिर मुस्कुरा दी
उनकी इस बात पर
इस गरज से
कि शायद इस बार अच्छा लगे
उन्हें मेरा मुस्कुराना
पर थे वे हैरान
देखकर मेरी मुस्कान
कहने लगे –
“कैसे अजीब ढंग से मुस्कुराती हो तुम?”
मैंने कहा-
“मुस्कान की भी क्या कोई परिभाषा है?”
वे बोले अजब तमाशा है!
गुस्से में हिन्दी से अंग्रेज़ी पर उतर आये वे
कहने लगे
“योर स्माइल इज़ प्योरली सिंथेटिक”
मैं सकपकाई
अब ‘प्योरली सिंथेटिक’ होने का मतलब है क्या
जो सिंथेटिक है
वो प्योर कैसे हो सकता है भला?

पर कह तो वो भी ठीक ही रहे हैं
बाज़ार में मिलता है सिंथेटिक सिरका
जो रंगहीन होता है
पर जिसके एकदम प्योर होने का प्रमाण-पत्र
शीशी पर लगे लेबल के साथ लगा रहता है
क्या प्रकृतिक सिरका भी
रंगहीन होने की जुर्रत कर सकता है भला?

कभी नहीं, नहीं न !

बाज़ार में सिंथेटिक कपड़ा भी मिलता है
जिसे पहन कर
‘प्योर हर्ट’ से हम भगवान की पूजा किया करते हैं
और सेंथेटिक वूल--
ठंढ से बचाता है आज के मनुष्य को
वही मनुष्य
जिसे सिंथेटिक तरीके से टेस्ट-ट्यूब में तैयार किया गया है
और जिसे
बायोटेक्नोलाजी की नवीनतम विधियों द्वारा
बनाया गया सिंथेटिक अनाज
खाने को दिया गया है!

मैं समझ गई हूँ
जो सिंथेटिक है वही आधुनिक है
और इसलिए आधुनिक होने के लिए
आवश्यक है सिंथेटिक होना...

आधुनिकता की इस दौड़ में
पीछे न रह जाऊँ कहीं
इस बात का मुझे एहसास है
और इस दिशा में
यह मेरा पहला प्रयास है...

इसी प्रयास के तहत
खुद को बदल रही हूँ मैं
पूरी ताकत से
अपने आप को सिंथेटिक कर रही हूँ मैं...
जानती हूँ इस बात का आपको भी हो गया है भान
सही फरमा रहे हैं आप
बिलकुल सही है आपकी पहचान
मैं वही बन गई हूँ
जो था उनका अनुमान
आंशिक नहीं
जी हाँ, आंशिक नहीं
पूर्ण रूप से सिंथेटिक है मेरी मुस्कान
() () ()
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7 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा… 7 मई 2010 को 2:33 pm

पर मुझे तो आपकी कविता भी आपकी मुस्कान की तरह मौलिक ही लगी। हार्दिक बधाई।

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 7 मई 2010 को 2:51 pm

सिंथेटिक का खरा प्रयोग।

mala ने कहा… 7 मई 2010 को 5:33 pm

....बेहतर प्रस्तुति , बधाईयाँ !

M VERMA ने कहा… 7 मई 2010 को 6:55 pm

आप का प्रोफाईल फोटो सदा मुस्कराता नज़र आता है, प्लीज यह मत कहियेगा यह सिंथेटिक है

Meenu Khare ने कहा… 8 मई 2010 को 1:03 am

अरे नहीं वर्मा जी ब्लॉग जगत में सब कुछ निखालिस है, नो सिंथेटिक मैटीरियल.

रवीन्द्र जी धन्यवाद, मेरी कविता को ब्लॉगोत्सव में जगह देने के लिए. आपका प्रयास सार्थक एवं मौलिक है.

रश्मि प्रभा... ने कहा… 8 मई 2010 को 8:34 am

पूर्ण रूप से सिंथेटिक है मेरी मुस्कान
...
जो आज की आधुनिकता में बनी है पूर्ण पहचान,
वाह

Om ने कहा… 9 मई 2010 को 12:13 am

आपकी हर कविता की तरह 'गागर में सागर' "परोसती" यह प्रस्तुति, आपकी अन्य कविताओं की तरह ही अनुपम !

 
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