आगामी 15 अगस्त को भारत को स्वतन्त्र हुये 63 वर्ष पूरे हो जायेंगे, इस दौरान स्वतन्त्र भारत की एक पीढ़ी अपने शैशव, युवावस्था को पूर्ण कर अपनी वृद्धावस्था में प्रवेश कर गयी। स्वातन्त्रय के इन वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया, का विश्लेषण करना आज अपरिहार्य हो गया है। आजादी के लिये लड़ने वाले दीवानों ने क्या इसी स्वतन्त्र भारत की कल्पना की थी? हमारा देश एक ऐसे देश में बदल चुका है जहाँ हजारों नियम-कानून हैं, लेकिन एक भी कानून पूरी ईमानदारी से लागू नहीं होता। आजादी के बाद से सैकड़ों घोटाले हो चुके हैं, लेकिन इनमें शामिल एक भी बड़े आदमी को सजा नहीं हुई, यह अलग बात है कि जाने-अनजाने में, मजबूरी वश इनके मोहरे बने छोटे कर्मचारी अवश्य सजा पा गये। जीप घोटाला, बैंक घोटाला, चीनी घोटाला, जमीन घोटाला, चारा घोटाला, शेयर घोटाला, तोप घोटाला, चारा घोटाला, दवा घोटाला, दवा घोटाला, खाद्यान्न घोटाला, डेयरी घोटाला, न जाने कितने घोटाले हो चुके हैं, कर देने वाली गरीब जनता के पैसे को तमाम घोटालेबाज बिना डकार लिये हजम कर चुके हैं। जाँचे बैठती हैं, जाँच आयोग नियुक्त किये जाते हैं, लेकिन या तो उनकी अवधि बढ़ती जाती है और बाद में जब कभी इनकी रिपोर्ट आती भी है तो वह इस देश की जनता के सामने नहीं रखी जाती। पैसा जनता का लुटा, जाँच में लगा पैसा भी उसी गरीब जनता का है, लेकिन रिपोर्ट जनता नहीं देख सकती। निरीह जनता बस नेताओं का मुँह ताकती रह जाती है।

उसके पास यह जानने का कोई साधन नहीं है कि उसने जिस खरीद पर टैक्स दिया है वह सरकार तक पहुँचा भी या बीच में ही कोई व्यापारी उसे खा गया। वैट इस लिये लागू नहीं होता कि व्यापारियों को पूरा टैक्स देना पड़ेगा, अन्यथा क्या कारण है कि व्यापारी इसका इतना विरोध कर रहे हैं, आखिर वैट भी तो ग्राहक की ही जेब से जायेगा न कि व्यापारी की जेब से। यहाँ की पुलिस और दाऊद भाई में कोई ज्यादा अन्तर नहीं है, अन्तर है तो बस इतना ही कि दाऊद भाई ने पुलिस में भर्ती के लिये कोई परीक्षा नहीं दी या सिफारिश नहीं करवाई, अन्यथा दोनों की कार्यशैली में कोई अन्तर नहीं है। कोई भी शरीफ व्यक्ति दोनों के ही पास जाने में डरता है, दोनों ही प्रोटेक्ट करने के लिये दक्षिणा चाहते हैं, दोनों ही समझौता कराने में विश्वास करते हैं, दोनों ही स्वत: न्याय कर देते हैं। यहाँ तक कि दोनों सुपारी भी ले सकते हैं। हमारे देश में ही यह संभव है कि एस0ई0ज़ेड0 का विरोध करने पर ग्रामीणों पर फायरिंग कर दी जाती है और दुर्भाग्य यह कि कोई भी इसके लिये दोषी नहीं पाया जाता, किसी के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। यहीं पुलिस श्रमिकों पर जानवरों की तरह लाठियाँ भाँजती है और स्वतन्त्र भारत में एक बार फि जलियाँवाला बाग के जनरल डायर की यादें ताजा कर देती है। पुलिस किसी से भी भेदभाव नहीं बरतती, चाहे फिर शिक्षक हों, छात्र-छात्राएँ, पत्रकार हों या फिर महिलायें, उसकी लाठी सब पर एक जैसी ही बरसती है। जहाँ दाऊद जैसे अपराधियों को पुलिस की ही रिपोर्ट पर फर्जी पासपोर्ट बनवाने में कामयाबी मिल जाती है। पुलिस चौकी में सिपाही बलात्कार कर सकता है और पुलिस अपने दोषी कर्मियों को बचाने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है। हमारे यहाँ ही ऐसा संभव है कि आप लोगों पर अपनी बी0एम0डब्ल्यू0 चढ़ा सकते हैं और जो कि बाद में ट्रक में बदल जाती है, जहाँ खुद बड़ा (?) होने पर या बड़े बाप की औलाद होने पर आप अपनी गाड़ी से 5-6 लोगों को कुचल सकते हैं, काले हिरन का शिकार कर सकते हैं, जहाँ सी0बी0आई0 को एक चार्जशीट का अनुवाद कराने में कई वर्ष लग जाते हैं। जहाँ क्वात्रोची की गिरफ्तारी की सूचना छिपाई जाती है व उसे बचाने के लिये हर संभव प्रयास किया जाता है।

जहाँ आतंकवादियों की पैरवी यह कह कर की जाती है कि फलां जगह के युवक बेरोजगारी से त्रस्त होने के कारण ऐसा कर रहे हैं, हजारों-लाखों लोगों की जान लेने वालों को अबोध-मासूम बताया जाता है, उनसे हाथ जोड़कर हथियार डालने की प्रार्थना की जाती है और उनके लिये रोजगार सृजित किये जाते हैं, लेकिन यह नहीं सोचा जाता कि यदि सम्पूर्ण देश के नौजवानों ने रोजगार की प्राप्ति हेतु ऐसा रवैया अपनाया तो देश का क्या होगा। जहाँ जेब में पैसा होने पर आप कानून को तोड़ सकते है, मरोड़ सकते हैं। जहाँ आप की जेब कटने की रिपोर्ट इस लिये दर्ज नहीं होती कि अपराध की संख्या में वृद्धि हो जायेगी, जहाँ पुलिस का काम रिपोर्ट दर्ज कर जाँच करना नहीं, बल्कि मामले को दबाना, रफा-दफा करना, समझौता कराना और न्यायाधीश की भूमिका निभाना है। जहाँ यह हमारे देश में ही संभव है कि यदि एक नवयुवक के विरुद्ध मामूली मार-पीट का एक भी मामला दर्ज है तो उसे सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, लेकिन हत्या-बलात्कार-डकैती के अभियुक्त चुनाव लड़कर सांसद-विधायक बन सकते हैं। आजादी के 60 वर्ष बाद भी यह लिखते हुये शर्म आती है कि आज भी सभी निवासियों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं है, करोडों लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, उन्हें शौच के लिये स्थान उपलब्ध नहीं है, मानवता के लिये इससे बड़ी बिडम्बना की बात क्या हो सकती है कि नित्य कर्म करने के लिये लोगों को रेल-लाइन के किनारे का प्रयोग करना पड़े।

जहाँ आज भी लोग भूख से मरते हैं और प्रशासन बेशर्मी के साथ उन्हें बीमारी का शिकार बता देता है। हजारों किसान कर्ज के बोझ के तले दबकर आत्महत्या करते हैं और शासन अपनी नीतियों की महिमा-मंडन में मशगूल रहता है, खेती पर आयकर लगाने का विरोध सिर्फ इसलिये किया जाता है कि इसके लगने पर कालेधन को सफेद बनाने पर अंकुश लग जायेगा। गरीब किसान की भूमि अधिग्रहीत कर उद्योगपतियों को दे दी जाती है, वह भी औने-पौने दामों पर। यह सिर्फ भारतीय लोकतन्त्र में ही संभव है कि एक कंगाल व्यक्ति सांसद-विधायक-पार्षद बनने पर अथवा किसी निगम आदि में कोई पद पाने पर करोड़पति बन जाता है, जहाँ एक शिक्षक जिसकी सम्पत्ति 30 वर्ष पहले मात्र 3 बीघा थी, 30 वर्ष में सैकड़ों करोड़ रुपये में बदल जाती है, अच्छा हो यह फार्मूला भारत की गरीब जनता को सार्वजनिक कर दिया जाये जिससे कि यहाँ की गरीबी दूर हो जाये। कानून-व्यवस्था का आलम यह है कि अपराधी जेल से अपना राज चलाते हैं, जेल में बैठ कर अपहरण कराते हैं, फिरौतियां वसूलते हैं, जेल उनके लिये जेल न होकर एक सुरक्षित आरामगाह बन जाती है।

जहाँ राजनेता सत्ता प्राप्ति के लिये बेशर्मी के साथ झूठे वादे करते जाते हैं, फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हैं, वोटों के लिये समाज को इतना छिन्न भिन्न कर देते हैं कि उसका एक होना असम्भव हो जाये। आरक्षण की कुटिल राजनीति इस लिये अपनायी जाती है कि समाज एक न हो पाये, आपस में ही उलझा रहे, उसका ध्यान विकास, राष्ट्र हित की ओर न जाये, अन्यथा क्या कारण है कि पिछड़े वर्ग की जगह जाति कर दी गयी, क्या कुछ जाति विशेष के ही लोग पिछड़े हैं और इनके अतिरिक्त सभी जातियों के लोग समृद्ध हैं, सही बात तो यह है कि गरीब की कोई जाति नहीं होती, गरीब की एक ही जाति और एक ही धर्म होता है, वह है गरीबी। रही बात आरक्षण की, तो उसका लाभ सिर्फ और सिर्फ सवर्णों को ही मिल पाता है और सवर्ण वह है जो आर्थिक रूप से सक्षम है, बाकी सब पिछड़े हैं। सामाजिक स्थिति के कारण दलित जातियों को वास्तव में एक पुनरुत्थान की आवश्यकता थी जो आज तक नहीं हो पाया है। आरक्षण का प्रतिशत 80, 90 या 100 भी कर देने से उस दलित व्यक्ति को, जिसे अपने परिवार के जीवन-यापन हेतु स्वयं व परिवार के सभी व्यस्क-अव्यस्क सदस्यों को दिन भर काम पर लगना पड़ता है, जो अपने बच्चों को स्कूल इसलिये नहीं भेज सकता कि अगर वे स्कूल जायेंगे तो परिवार का जीवन-यापन कैसे होगा, कोई लाभ न तो मिला है और न ही मिल पायेगा। और इन्हीं सब नीतियों का कारण है कि लोगों में आगे बढ़ने के स्थान पर पिछड़ा बनने की होड़ लगी है, जिससे कि जिसे वास्तव में आरक्षण की आवश्यकता है, उसे इसका लाभ नहीं मिल पाता। सोचने की बात है कि एक बार सरकारी नौकरी में आये व्यक्तियों के लिये आगे की पीढ़ियों के लिये आरक्षण की क्या आवश्यकता है, फिर यदि एक बार लाभ पाकर वह व्यक्ति अपने लिये मुख्य धारा के लायक नहीं बना पाया तो यह भी निश्चित है कि वह कभी भी मुख्य धारा में नहीं आ पायेगा।

स्वतन्त्रता के 60 वर्ष बाद भी सबको रोजगार नहीं मिल पाया और तीव्रता से बढ़ते हुये इस अपार जनसमूह को रोजगार देना किसी भी दल के बस की बात नहीं है, इस तरफ किसी भी दल ने ध्यान देना उचित नहीं समझा, क्योंकि यदि लोगों को रोजगार मिलेगा तो फिर वह शिक्षित भी बनने लगेंगे और जब शिक्षित होंगे तो उनमें अपना, अपने समाज का, अपने राष्ट्र का व्यापक हित-अनहित समझने की क्षमता उत्पन्न होगी और ऐसे में कुटिल राजनीतिज्ञों की पोल खुल जायेगी। इस लिये न तो जनसंख्या पर रोक लगाने के लिये कोई प्रभावी कदम उठाये गये, न ही शिक्षित करने के लिये शिक्षा को सुलभ बनाया गया। शिक्षा की दशा और दिशा सभी को विदित है, सरकारी स्कूलों में न तो शिक्षक पढ़ाना ही चाहता है और न ही अभिभावक पढ़ाना। जो शिक्षक पढ़ाना चाहते भी हैं उन्हें शासन वर्ष भर जनगणना, आर्थिक सर्वेक्षण, मतदाता सूची में ही उलझाये ही रखती है, उन्हें ही पुरुस्कार मिलते हैं, जो जोड़-तोड़ करते रहते हैं, पढ़ाने के स्थान पर राजनीति की गोटें बिछाते रहते हैं। प्राथमिक विद्यालयों में न तो ठीक-ठाक भवन ही हैं न ही अन्य सुविधाएँ, निजी क्षेत्र के विद्यालयों की तुलना में उनका पाठ्यक्रम काफी पीछे है। और निजी क्षेत्र के विद्यालयों में कितने लोग पढ़ा सकते हैं, जिसमें प्री-नर्सरी के बच्चे पर कम से कम एक हजार रुपये प्रति माह खर्च आता है और ख्यातिलब्ध विद्यालयों में यह राशि छ:-सात हजार रुपये तक पहुँच जाती है। क्या यह उस देश की जनता के साथ क्रूर मजाक नहीं है, जहाँ एक मजदूर की दैनिक मजदूरी 80-90 रुपये प्रतिदिन होती है। उच्च शिक्षा की बात की जाये तो सरकारी डिग्री कालेजों में शिक्षा की दुर्दशा जग जाहिर है, अध्ययन-अध्यापन के अतिरिक्त हर कार्य होता है, यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये। यहाँ के छात्र और अध्यापक दोनों ही चुनाव लड़ने में अधिक रुचि लेते हैं, छात्र संघ के चुनावों में हिंसा का नंगा नाच बताता है कि हमारे देश के छात्र और जेल में बन्द अपराधी तत्वों में कितना साम्य आ चुका है, और ऐसे छात्र नेता सामान्य छात्रों तथा उनके हितों का कितना खयाल रखेंगे। उच्च व तकनीकी शिक्षण संस्थानों की बात की जाये तो स्पष्ट होता है कि शिक्षण संस्थान अब शिक्षा के मंदिर न रह कर शिक्षा की दुकानों में तबदील हो चुके हैं। आई0आई0एम0 जैसे संस्थानों की सालाना फीस लगभग ढ़ाई लाख रुपया सालाना पहुँच चुकी है, जो दिखाता है कि सामान्य जनता इन संस्थानों में अपने बच्चों के दाखिले का सपना भी नहीं देख सकती, चाहे फिर उनका बच्चा कितना भी मेधावी क्यों न हो।
भ्रष्टाचार हटाने के नारे देने वाले ही सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं, समता और समाजवाद का नारा देने वालों ने ही सबसे ज्यादा संपत्ति अर्जित की है वह भी अनैतिक तरीकों से। उनके लिये कोई कानून नहीं है, पहले तो उनके विरुद्ध कोई मामला ही दर्ज नहीं पाता, यदि हो भी जाता है तो सालों लग जाते हैं चार्जशीट आने में, फिर कई वर्षों तक मामला लम्बी न्यायिक प्रक्रिया में रह जाता है और तब तक जनता को न्याय मिलना न मिलना एक बराबर हो जाता है। हम लोग अपनी संस्कृति, अपनी परम्पराओं पर इतराते रहते हैं, और पश्चिम का मजाक उड़ाते रहते हैं, लेकिन हम लोग दोहरे मापदंडों वाले लोग हैं, दिखावे से ग्रस्त। अमेरिकी राष्ट्रपति की लड़कियाँ शराब पीकर गाड़ी चलाती हुई पकड़ी जाती हैं, पुलिस का एक सार्जेन्ट उन पर जुर्माना डाल देता है, अमेरिकी राष्ट्रपति उसे भरता है, टोनी ब्लेयर की पत्नी को विदेश दौरे से मोतियों का हार लाने पर उस पर ड्यूटी लगाई जाती है, टोनी ब्लेयर के पुत्र के बिना लाइसेंस मोटर साइकिल चलाने पर टोनी ब्लेयर को जुर्माना भरना पड़ता है, यौनाचार संबंधी शिकायत पर इस्रायल के राष्ट्रपति के यहाँ पुलिस छापा मारती है, क्या हमारे देश में ऐसा संभव है? इस स्तर के लोगों पर कार्रवाई करना तो दूर की बात रही, पार्षदों, बड़े अधिकारियों और खुद पुलिस वालों के रिश्तेदारों पर भी कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं होती। और तो और लोग स्वयं भी कानून का मखौल उड़ाने में अपना गौरव महसूस करते हैं।

यह वह देश है, जहाँ चुनाव के लिये टिकट बेचे जाते हैं, और जो लोग टिकट खरीदकर सांसद-विधायक बनेंगे वह अपने दिये गये पैसों की वसूली करेंगे या नहीं। हमारे देश में ही संसद-विधान सभा में सवाल उठाने के लिये पैसे लिये जाते हैं। हमारे यहाँ ही यह संभव है कि राजनेता अपने वंशजों को देश विरासत में देते हैं, एक शिक्षक का पुत्र शिक्षक बन सकता है और डाक्टर का डाक्टर, लेकिन उसके लिये उसे निर्धारित पाठ्यक्रम को उत्तीर्ण करना पड़ता है, किन्तु नेता के पुत्र को सीधे ही विरासत राजतिलक कर दे दी जाती है। हमारे देश में ही यह संभव है कि वैसे तो नेतागण न्यायालय के फैसले पर कायम रहने की बात करते हैं, किन्तु जहाँ वोट-बैंक पर असर पड़ने की संभावना दिखाई देती है, वहीं फैसले के विरुद्ध अध्यादेश लाने, कानून बनाने की बात करने लगते हैं और ऐसा करते भी हैं। यही पता नहीं चलता कि संविधान सर्वोच्च है या संसद। यहीं न्याय पाने में लोगों की जिन्दगियाँ लग जाती हैं, विदेशों में 2-3 वर्ष के अन्दर ही निचले से सर्वोच्च न्यायालय तक फैसला आ जाता है, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं होता। यह स्थिति तब है जब कि विदेशों में छोटी से छोटी घटना पर भी एफ0आई0आर0 दर्ज होती है और हमारे यहाँ पता नहीं हजारों मामलों में ऐसा नहीं होता, आम आदमी तो पुलिस के पास जाने में भी घबराता है। जब एक हत्या होती है तो हर हत्या के पीछे हत्यारा भी, यहाँ हजारों कत्ल अनसुलझे हैं, बहुत से मामलों में आरोपी दोषमुक्त हो जाते हैं, ऐसे में उन हत व्यक्तियों के लिये न्याय कहाँ मिला? यदि यहाँ न्यायाधीशों की कमी है तो उनकी पूर्ति कौन करेगा, यह जिम्मेदारी किसकी है, आम आदमी की या सत्ताधारी व्यक्तियों की। जब कभी वादों के निपटारे के लिये समय-सीमा बनाने की बात होती है तो वकील इसके विरोध में खड़े हो जाते हैं, उन्हें लगता है कि इसके हो जाने पर उनकी रोजी-रोटी खत्म हो जायेगी, उन्हें अपने मुवक्किलों की चिन्ता नहीं है कि उन्हें जल्दी न्याय मिले, उन्हें सिर्फ अपने हितों की चिन्ता सताती है।

भ्रष्टाचार के लिये हम सभी दोषी हैं, जिसे भी मौका मिलता है वह अपने पद, अपनी स्थिति का पूरा फायदा उठाता है, किन्तु इस स्थिति में समानता होते हुये भी वह ज्यादा बड़ा दोषी है, जिसके कन्धों पर ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी है, अर्थात सत्ता पर काबिज नेता और बड़े अधिकारी। और यह भी निश्चित है कि भ्रष्टाचार की गंगा ऊपर से नीचे की ओर बहती है। क्यों एक आई0ए0एस0 या आई0पी0एस0 अधिकारी के जिला प्रमुख से मुख्यालय स्थानान्तरण को सजा समझा जाता है? क्यों उच्च अधिकारी राजनेताओं के असंगत निर्देशों का पालन करने के लिये मजबूर होते हैं, एक आई0ए0एस0 या आई0पी0एस0 अधिकारी के स्थान पर किसी संग्रह अमीन या सिपाही की पोÏस्टग तो नहीं की जा सकती और इनके स्थानान्तरण पर वेतन-भत्तों में कटौती नहीं होती न ही इन्क्रीमेंट रुक जाता है तो क्या कारण है कि मुख्यालय स्थानान्तरण को सजा समझा जाता है और अधिकतर अधिकारी जिला स्तर की पोÏस्टग के इच्छुक होते हैं, अपवादों को छोड़कर। आखिर यह सब भी तो हमारा ही हिस्सा हैं। हम ही वह लोग हैं जो सड़क पर अतिक्रमण होने पर दूसरों को कोसते हैं, शासन को गालियाँ देते हैं, लेकिन मौका मिलने पर घरों के आगे ग्रिल लगाकर जगह घेरने से नहीं चूकते। स्वास्थ्य सेवाओं का यह आलम है कि सरकारी चिकित्सालयों में वही व्यक्ति जाता है जो निजी चिकित्सालयों में इलाज नहीं करवा सकता। न वहाँ चिकित्सक उपलब्ध हैं, न दवाइयाँ, रोगी की सेवा-सुश्रूषा की बात तो दूर रही। निजी चिकित्सकों की फीस एक सौ रुपये से पाँच सौ तक है, जिसकी कोई रसीद नहीं दी जाती, एक बेड का किराया तीन सौ रुपये से शुरू होता है और उसमें विजिट चार्जेस, नर्सिंग चार्जेस इत्यादि जुड़कर छ:-सात सौ रुपये प्रतिदिन तक पहुँच जाता है, आई0सी0यू0 का शुल्क तीन-चार हजार रुपये होना मामूली बात है, इसके अतिरिक्त विभिन्न जाँचों और दवाइयों का खर्च अलग। जरा बताइये कि अस्सी-नब्बे रुपये प्रतिदिन कमाने वाला बीमार होने की दशा में क्या इलाज करा पायेगा? उसके लिये तो मर जाना अधिक बेहतर है। इस क्षेत्र में भी आलम यह है कि किस प्रकार के आपरेशन के लिये कितनी फीस होनी चाहिये, आज तक निर्धारण नहीं हो पाया है, एक ही आपरेशन की फीस अलग-अलग अस्पताल में अलग-अलग हो सकती है, एक दवाई जो एक अलग ब्राण्ड के नाम से उपलब्ध है दस रुपये में मिलती है और अन्य ब्राण्ड की पचास रुपये में। किसी खास ब्राण्ड की दवाई लिखने के लिये उन्हें मंहगी गाड़ियाँ उपहार स्वरूप दी जाती हैं और यह पैसा कहाँ से आता है किसी मरीज की जेब से, क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है, प्रायोजित और सरकारी स्वीकृति प्राप्त भ्रष्टाचार। इसके विरुद्ध क्यों कोई अधिनियम नहीं बनाया जाता, विचारणीय है। छोटे शहरों में दो कमरे के मकान की कीमत सात-आठ लाख है, महानगरों में दो कमरों का फ्लैट पैंतीस-चालीस लाख का, महँगाई अपने चरम पर है, प्रत्येक व्यक्ति का एक ही लक्ष्य होता है कि उसके पास एक छोटा सा मकान हो, उसका जीवन-यापन अभावों से ग्रस्त न हो, उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले और बीमार होने की स्थिति में उसका इलाज अच्छी तरह से हो सके। और बिलकुल स्पष्ट है कि इसके लिये जिसे उसके अपने साधनों से पूर्ति नहीं होती वह इसकी पूर्ति के लिये जायज-नाजायज तरीके अपनाने लगता है। क्या यह समस्या सत्ता की नहीं है? सत्ताधारियों को, चाहे वह किसी भी दल के क्यों न हों यह सब दिखाई नहीं देता।

इस अबाध बढ़ते हुये जन समूह के लिये अनाज कहाँ से आयेगा, रहने के लिये जगह कहाँ से आयेगी, पहनने के लिये कपड़ा कहाँ से आयेगा और तो और पीने के लिये पानी कहाँ से मिलेगा, जिसका स्तर काफी नीचे जा चुका है, जहाँ प्रचुर मात्रा में पानी मिलता था, वहाँ पानी की कमी दिखाई देने लगी है। जहाँ लहलहाते हुये खेत और जंगल हुआ करते थे, वहाँ आज सीमेंट की इमारतें खड़ी हैं। पर्यावरण प्रदूषित हो चुका है, जंगलों के कटने से वातावरण में गर्मी बढ़ती चली जा रही है, बारिश की मात्रा में अत्यधिक कमी आ चुकी है। लेकिन यह देखने और दिखाने के लिये कोई तैयार नहीं है। गरीब और गरीब होता चला जा रहा है, किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं और किसानों की फसल के दलाल मौज कर रहे हैं, आज तक सभी गाँवों को सड़कों से नहीं जोड़ा जा सका, उन्हें बिजली नहीं दी जा सकी, उनकी फसल के भण्डारण के लिये सुविधा नहीं दी जा सकी, जिससे कि उनकी फसलों को सही समय पर खाद-पानी मिल सके, तैयार फसल को समय पर मण्डी पहुँचाया जा सके और आगे के लिये भण्डारण किया जा सके। आम जनता की गरीबी तो नहीं हट सकी, लेकिन जनता के प्रतिनिधियों की अवश्य हट गयी। नौजवान आपस में लड़ना सीख गये, नशे और अश्लीलता के जाल में फंसते चले गये, राष्ट्रवाद, देश के प्रति कर्तव्य निर्वहन, सामाजिक दायित्वों की पूर्ति, नैतिकता जैसी चीजों से वे विमुख हो चुके हैं, आत्म-सम्मान, राष्ट्र-गौरव, अपनी समृद्ध परंपरा से हम कोसों दूर पहुँच गये हैं, आखिर कहाँ आ गये हैं हम इन साठ वर्षों में।

आखिर किस प्रकार का लोकतन्त्र है हमारा, जहाँ सब कुछ है लेकिन लोक के लिये नहीं है, जहाँ गणतन्त्र की जगह गनतन्त्र है और फिर इस सब की आवश्यकता भी क्यों है? यहाँ की निरीह जनता का दुर्भाग्य यह है कि उसके सामने कोई विकल्प नहीं है, सभी कमीजें गन्दी हैं, बस सबसे कम गन्दी कमीज का चयन किया जा सकता है और फिर उसका भी कोई भरोसा नहीं, गर्द भरे इस वातावरण में उसके और भी गन्दी हो जाने की सम्भावना बनी रहती है। क्या आप आत्म-चिंतन और आत्मावलोकन करना पसंद करेंगे और फिर कुछ ठोस कदम उठाना चाहेंगे भारत को एक नई दिशा प्रदान करने के लिये?
 
() भारतीय नागरिक - Indian Citizen की प्रस्तुति  
जैसा मैंने महसूस किया, लिख दिया, गलतियाँ स्वाभाविक हैं, मैं sympathy की बात नहीं करता, बात करता हूँ empathy की. दिक्कत मुझे तब होती है, जब बराबरी का पैमाना सब के लिए अलग- अलग होता है.

8 comments:

परमजीत सिँह बाली ने कहा… 26 मई 2010 को 12:56 pm

आप का पूरा आलेख बहुत सही व सटीक लगा..बहुत बढिया मंथन कर डाला है आपने।


.वास्तव मे इस देश की बुनियाद मे ही गलती हो गई है......यहाँ पर कुर्सी से प्रेम करने वालो की नही सुभाष चन्द्र बोस जैसे देश भगतों की जरूरत थी..लेकिन हमारे देश का दुर्भाग्य है कि ऐसा नही हुआ.....किस कारण नही हो सका....यह बात समझने की है.....। देश की जनता भी इस मे दोषी है....नही तो आज देश में ऐसे लोग अधिक होते जो सिर्फ देश का हित सब से पहले दे्खते...

कविता ने कहा… 26 मई 2010 को 1:03 pm

आजादी के दीवानों की इच्छाओं के बहाने आजके भारत की जीवंत तस्वीर खींच दी आपने। बधाई।

पूर्णिमा ने कहा… 26 मई 2010 को 8:09 pm

कमाल की अभिव्यक्ति दी है बधाई..

mala ने कहा… 26 मई 2010 को 8:10 pm

सही व सटीक लगा..बहुत बढिया

गीतकार /geetkaar ने कहा… 26 मई 2010 को 8:15 pm

जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती रचना हेतु शुभकामनाएं।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा… 27 मई 2010 को 9:16 am

badhiya, ..............subhkamnayen!!

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 27 मई 2010 को 10:47 pm

महत्वपूर्ण आलेख ! अभार ।

kshama ने कहा… 11 जून 2010 को 12:51 pm

Is avashta ke liye ham sabhi zimmedaar hain....hame 'swarajy' saunpa gaya tha...'suraj'hamne banana tha...boond boond se sagar banta,lekin agali peedhiyon ne yah zimmedaari nibhayi nahi, isme mai khud bhi shamil hun.

 
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