सुनील गज्जाणी हिंदी के वेहद सक्रिय चिट्ठाकार के साथ-साथ एक संवेदनशील रचानाका भी हैं .इन्होने हिंदी विषय से एम. ए. किया है .ये गद्य और पद्य दोनों में सामान रूप से लिखते हैं . इनकी प्रकाशित कृतियाँ है-  ओस री बूँदा (राजस्थानी काव्य संग्रह ) दो संयुक्त नाट्य संग्रह इनके अन्य अप्रकाशित नाटक संग्रह है- डायरी, संवेदना की संतान, फ्रीडम फाईटर आदि . प्रस्तुत है इनकी कुछ कविताएँ- 



कविता -
!! आता है नजर !!

सपेरा, मदारी खेल नट-नटनी का,
बतलाओ जरा कहां आता है नजर ?
खेल बच्चो का सिमटा कमरो में अब,
बलपण को लगी कैसी ये नजर ।

वैदिक ज्ञान, पाटी तख्ती, गुरू शिष्य  अब,
किस्सो में जाने सिमट गए इस कदर,
नैतिकता, सदाचार अब बसते धोरो मे,
फ्रेम  में टंगा बस आदमी आता है नजर।

चाह कंगुरे की पहले होती अब क्यूं,
धैर्य, नींव का कद बढ़ने तक हो जरा,
बच्चा नाबालिग नही रहा इस युग में,
बाल कथाएं अब कही सुनता आया है नजर।

अपने ही विरूद्ध खडे किए जा रहा,
प्रश्न  पे प्रश्न निस्त्तर जाने मै क्यूं,
सोच कर मुस्कुरा देती उसकी ओरख्
सच्च, मेरे लिए प्यार उसमें आता है नजर।


दिन बहुत गुजरे शहर सूना सा लगे
चलो फिर कोई दफन मुद~दा उठाया जाए,
तरसते दो वक्त रोटी को वे अक्सर
सेकते रोटियां उन पे कुर्सिया रोज आती है नजर।

दो छोटी कविताएं

(१)
कचरे की ढ़ेरी पे,
मानो सिंहासन पे हो बैठा,
जाने किस उधेड-बुन में,
अपने गालो पे हाथ धरे,
कचरे में पडे एक आइने में,
अक्स देखता अपना,
निहारता अपने को,
एक भिखारी।
(२)
सभ्य कॉलोनी  के घरो का,
नाकारा सामान,
कूडा करकट
कचरा पात्र में
कॉलोनी  के बीचो बीच भरा पड़ा
बीनता ढूंढता,
जाने क्या
उस ढेर में
वो भिखारी।
कुछ क्षणिकाएँ
(१)
दो बून्द,
चरणो में तेरे,
चढ़ा दी तो,
क्या हुआ,
आँखों  का पानी
ही तो है।
(२)
औरत
एक पुल
दो खानदानो के बीच।
(३)
मन,
मानो
कस्तूरी मृग हो।
(४)
मार्ग,
जीवन के भीतर,
मार्ग,
जीवन के बाहर भी।
(५)
रिश्ते ,
सागर के भांति भी,
रिश्ते,
खड़े  के पानी ज्यूं भी।
(६)
रेखाएं,
जीवन और जीवन,
के बाहर का,
खास व्याकरण।
() () ()
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10 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 17 मई 2010 को 10:39 pm

परिकल्पना के पायदान पर कुछ और बेहतरीन रचनाएँ

Rajendra Swarnkar ने कहा… 25 मई 2010 को 5:02 pm

क्षणिकाओं और कविता "आता है नजर" के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया सुनील जी ने ।

लेकिन लघु कविता

"कचरे की ढ़ेरी पे,
मानो सिंहासन पे हो बैठा,
जाने किस उधेड-बुन में,
अपने गालो पे हाथ धरे,
कचरे में पडे एक आइने में,
अक्स देखता अपना,
निहारता अपने को,
एक भिखारी।"
…इस शब्दचित्र में कमाल कर दिया !
मुक्तछंद की एक उत्कृष्ट रचना के लिए बधाइयां !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

Pankaj Trivedi ने कहा… 25 मई 2010 को 5:09 pm

सुनीलजी,
आपने कल और आज के बीच का परिवर्तन बखूबी बताया है | अपने विचारों की गहरी सोच और सूक्ष्म अवलोकन से कविताओं को "सब के मन की बात" के रूप में उत्तम रचनाएं दी है |

दीपक 'मशाल' ने कहा… 25 मई 2010 को 5:59 pm

बेहतरीन.. बधाई सुनील जी..

kavi kulwant ने कहा… 25 मई 2010 को 6:31 pm

wah sunil ji aap ko padh kar to maza aa gaya.. ati sundar

Sharma ,Amit ने कहा… 25 मई 2010 को 10:51 pm

बहुत कुछ बोलती हुई कविताये है ...

बेनामी ने कहा… 26 मई 2010 को 1:47 am

छॊटी कविताएँ और क्षणिकाएँ ज्यादा प्रभावशाली लगीं।
इला

संजय भास्कर ने कहा… 26 मई 2010 को 5:02 pm

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर ने कहा… 26 मई 2010 को 5:02 pm

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

arun c roy ने कहा… 26 मई 2010 को 7:03 pm

दो बून्द,
चरणो में तेरे,
चढ़ा दी तो,
क्या हुआ,
आँखों का पानी
ही तो है।

waise to sunil ji saari kavitaayen achhi hain lekin upar wali kshinika sabse bhavprad... sunder prastuti!

 
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