श्री गौहर रजा साहब अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर, शिक्षाविद, वैज्ञानिक, जहांगीराबाद मीडिया इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर भी हैं तथा डाक्युमेन्टी फिल्मो के निर्माता हैं इनकी कुछ प्रमुख डाक्युमेन्टी फिल्में The urjency to resist fasist forces/ Media: an arena for struggle/ legacy of the freedom movement /secularism as a constitutional right/cultural roots of communalism/facts and myths /communalisation of education and history /history of rashtriy svayam sevak sangh /junoon k badhte kadam/us subaah ki khatir /india pakistan hostility आदि लोकप्रिय हैं . लोकसंघर्ष ब्लॉग के रणधीर सिंह सुमन ने परिकल्पना ब्लॉग उत्सव 2010 के लिए श्री गौहर रजा का साक्षात्कार विशेष रूप से लिया है .....प्रस्तुत है हिंदी ब्लोगिंग की दिशा-दशा पर उनकी सशक्त टिपण्णी -

प्र1 ॥ अंतरजाल पर ब्लॉग लेखन के सम्बन्ध में आप के क्या विचार हैं ?

 बीस वर्षों से वर्चुअल दुनिया का इस्तेमाल बढ़ा है। रुढ़िवादी दुनिया इसका इस्तेमाल पहले से कर रही है। वर्चुअल टेक्नोलोज़ी में जबरदस्त सामर्थ्य है। उस नारे को साकार करने के लिए जिसे पिछली शताब्दी में मार्क्स ने वह सामान्य सा नारा दिया था कि ' दुनिया के मजदूरों एक हो ' । अब से पहले दुनिया के मजदूर एक नहीं हो पाते थे क्योंकि जापान में कोई हड़ताल होती थी तो उसकी सूचना देर से दूसरे मुल्कों के मजदूरों को होती थी। अंतरजाल और ब्लॉग लेखन से सारी दुनिया के मजदूर एक ही दिन एक ही वक्त एक हो सकते हैं। अब जो राहें खुली है दुनिया के आवाम साम्राज्यवादियो को अपना लोहा मनवा सकता है। आज यह संभव है कि एक मुल्क में हड़ताल कि जाए तो उसी समय दुसरे मुल्क चाहे जापान, अफ्रीका, अमेरिका के मजदूर एक वक्त एक ही दिन में हड़ताल कर सकते हैं। अब से पहले संघर्ष में पूंजीपति का हाथ ऊपर होता था। जैसे हिन्दुस्तान में पूंजीपति ने अपनी कंपनी बंद कर दी दूसरे मुल्कों में उसकी अन्य कंपनिया चलती रहती थी। यह पहली बार संभव हुआ है कि दुनिया भर के मजदूर एक ही वक्त एक ही दिन अपनी मांग कर सकते हैं।

आज अन्तराष्ट्रीय कम्युनिस्ट मूवमेंट कि सम्भावना अधिक है। उसका उदाहरण हमें ईराक युद्ध के समय देखने को मिलता है। मैं यह समझता हूँ कि इतिहास में नहीं लिखा गया कि संघर्ष का वह काल जो कुछ युद्ध विरोधी आह्वाहन के समय दुनिया के हर कोने में एक ही समय एक ही दिन युद्ध विरोधी प्रदर्शन हुए। दुनिया में इंसानियत के लिए वह प्रदर्शन सबसे बड़ा प्रदर्शन था।

प्र२॥ ब्लॉग पर लिखे जा रहे साहित्य के सम्बन्ध में आपके क्या विचार हैं ?

 साहित्य का जहाँ तक ताल्लुक है वह रिफाइंड फॉर्म होता है। रिफाइंड फार्म हर ब्लॉग व ब्लॉगर के लेखन को साहित्य नहीं कहा जा सकता है। वर्चुअल दुनिया कि सम्पूर्ण विषय वस्तु साहित्य नहीं है।

ब्लॉग लेखन से नए साहित्य का उदय हो रहा है, यह अद्भुत घटना है। साहित्य का लोकतान्त्रिक स्वरूप विकसित हो रहा है। ब्लॉग लेखन से उत्पन्न साहित्य प्रकाशक, वितरक, विज्ञापन दाताओं के दबाव से मुक्त है। यह साहित्य लोकतान्त्रिक  है।

प्र३॥ अंतरजाल पर परिकल्पना ब्लॉग उत्सव 2010 चल रहा है इस सम्बन्ध में आप क्या कहेंगे ?

 परिकल्पना ब्लॉग उत्सव 2010 के आयोजक श्री रवीन्द्र  प्रभात के प्रयास की सराहना करता हूँ । मैं आज हिंदी में ब्लॉग लेखन की शख्त आवश्यकता महसूस करता हूँ दुनिया की सबसे बड़ी जबान हिंदी है। हमारे देश में 35 % नवजवान जिनकी शिक्षा हिंदी जबान में होती है। 35% का अर्थ है कि करोडो-करोड़ लोग हिंदी दुनिया वर्चुअल दुनिया का हिस्सा अगर नहीं बनती है तो हम पिछ्ड जायेंगे।

आपका प्रयास महत्वपूर्ण है आप अगुवा दस्ते का कार्य कर रहे हैं। यह प्रयास इस वजह से महत्वपूर्ण है कि आने वाले कल का नवजवान वर्चुअल वर्ल्ड से दूर नहीं रह सकता है या यूं कहे कि वह रह ही नहीं पायेगा। यह जिम्मेदारी पूर्ण कार्य है।

मैं परिकल्पना ब्लॉग उत्सव 2010 की सफलता की कामना करता हूँ।




उपरोक्त विडिओ  श्री गौहर रजा साहब के  नज्म का है , इसे यहाँ इसलिए प्रदर्शित किया जा रहा है, ताकि आप उनके नज्मों से रूबरू हो सकें .

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5 comments:

alka sarwat ने कहा… 7 मई 2010 को 11:18 am

ब्लॉग लेखन से उत्पन्न साहित्य प्रकाशक, वितरक, विज्ञापन दाताओं के दबाव से मुक्त है। यह साहित्य लोकतान्त्रिक है।

गौहर रजा की ये बात हमारी [ब्लॉगर समाज की ] शक्तियों को प्रदर्शित करती है .हमें अपनी शक्तियों पर अब तो विश्वास हो ही जाना चाहिए ,हम बिलकुल निष्पक्ष और वास्तविकता के पक्षधर हैं
गौहर साहब की नज्म की तारीफ़ करूं तो ये छोटे मुंह बड़ी बात होगी
आश्चर्य .............

रेखा श्रीवास्तव ने कहा… 7 मई 2010 को 11:51 am

ब्लॉग लेखन से उत्पन्न साहित्य प्रकाशक, वितरक, विज्ञापन दाताओं के दबाव से मुक्त है। यह साहित्य लोकतान्त्रिक है।
ये सच है , इसमें koi जरूरत नहीं की संपादक की सहमति चाहिए हो , हम किसी भी स्तर का लिखते हों, अपनी बात कहने की स्वतंत्रता रखते हैं. संविधान के अभिव्यक्ति के अधिकार का सही उपयोग अब ही शुरू हुआ है.

mala ने कहा… 7 मई 2010 को 5:32 pm

संविधान के अभिव्यक्ति के अधिकार का सही उपयोग अब ही शुरू हुआ है.
....बेहतर प्रस्तुति , बधाईयाँ !

Arvind Mishra ने कहा… 7 मई 2010 को 7:31 pm

लिखो वो नज्म हो पहले कभी लिखी न गयी -गौहर साहब यारों के यार हैं -बहुत दिलकश है उनका अंदाजे बयां वो चाहे विज्ञान का कोई सन्देश हो या हो जीवन का कोयी फलसफा !

रश्मि प्रभा... ने कहा… 8 मई 2010 को 8:38 am

ब्लॉग लेखन से नए साहित्य का उदय हो रहा है, यह अद्भुत घटना है। साहित्य का लोकतान्त्रिक स्वरूप विकसित हो रहा है। ब्लॉग लेखन से उत्पन्न साहित्य प्रकाशक, वितरक, विज्ञापन दाताओं के दबाव से मुक्त है। यह साहित्य लोकतान्त्रिक है।
बिल्कुल सही विचारों से मिलवाया

 
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