राजेश उत्साही हिंदी चिट्ठाकारी में एक गंभीर सृजनकर्मी के रूप में अपनी अलग पहचान रखते हैं , उनके बारे में उन्हीं की जुबान में सुने- "जीवन की सार्थकता की तलाश जारी है। 26 साल तक एकलव्‍य संस्‍था में होशंगाबाद, भोपाल में काम। बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का सत्रह साल तक संपादन। स्रोत,,संदर्भ,गुल्‍लक,पलाश,प्रारम्‍भ के संपादन से जुड़ा रहा। एकलव्‍य के प्रकाश्‍ान कार्यक्रम में योगदान। बच्‍चों के लिए साहित्‍य तैयार करने की कई कार्यशालाओं में स्रोतव्‍यक्ति की भूमिका। हाल-फिलहाल बंगलौर में हूं। तीन ब्‍लागों- गुल्‍लक, यायावरी और गुलमोहर- के माध्‍यम से दुनिया से मुखातिब हूं। शिक्षा से जुडे कुछ समसामयिक पहलुओं पर टिप्‍पणियां 'जनसंवाद'में देखी जा सकती हैं। अधिक जानने के लिए देखें जिंदगी के काले-सफेद हाशिए।" इस अवसर पर प्रस्तुत है उनकी एक कविता -



















दिन बचपन के

बचपन के दिन कुछ इस तरह याद आएं
कहीं से टूटे खिलौने जैसे बच्‍चे ढूंढ लाएं

रेल के खेल की कूकू, खेलना पहाड़-पानी
कभी गिल्‍ली-डंडा, कभी बेबात शर्त लगाएं

खेल वो आती-पाती, मिट्टी का घर-घूला
बरसती धूप में ,जब तब अंटियां चटकाएं

दादी की कहानी, सरासर गप्‍प नानी की
जब बाबूजी डांट दें,तो गा लोरी मां सुलाएं

सर्द हवा के मौसम को, बांधकर मफलर से
सूरज की तलाश में, दिन भर दांत बजाएं

गड़गड़ाहट बादलों की,कागज़ की कश्तियां
राह चलते पानी में बेमतलब पैर छपछपाएं

बेबात पेड़ों पर चढ़ना, वो कूदना डालियों पर
फूट जाएं कभी घुटने, तो कभी दांत तोड़ लाएं

नीम की मीठी निबोली,सावन के वो झूले
पेंग लें ऊंची गुईंयां, जम के हम झुलाएं

घुटना टेक ही सही, या खड़े रहें बेंच पर
पन्‍ने फाड़कर कापी से, हवाई जहाज बनाएं

वो छुप-छुप के देखना, निहारना उसको
रहना मोड़ पर,निकल के जब स्‍कूल जाएं

काश अगर हो कहीं बैंक अपने बचपन का
चलो उत्‍साही कुछ और लम्‍हे निकाल लाएं

*राजेश उत्‍साही

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5 comments:

KAVITA ने कहा… 7 मई 2010 को 3:56 pm

दादी की कहानी, सरासर गप्‍प नानी की
जब बाबूजी डांट दें,तो गा लोरी मां सुलाएं
.....Kavita padhkar bachpan ke din yaad aa gaye...
Haardik shubhkamnayne.....

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 7 मई 2010 को 8:07 pm

बचपन की सारी शैतानियां और नटखटपन कविता में पूरी शिद्दत से मौजूद है और मोहित करता है।

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 7 मई 2010 को 8:07 pm

बचपन की सारी शैतानियां और नटखटपन कविता में पूरी शिद्दत से मौजूद है और मोहित करता है।

रश्मि प्रभा... ने कहा… 8 मई 2010 को 8:29 am

बचपन के दिन कुछ इस तरह याद आएं
कहीं से टूटे खिलौने जैसे बच्‍चे ढूंढ लाएं


काश अगर हो कहीं बैंक अपने बचपन का
चलो उत्‍साही कुछ और लम्‍हे निकाल लाएं
.....
वह बैंक तो आँखों से दिल तक है
चलो उत्साही आज अपने मन की सैर कर लें

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 27 मई 2010 को 7:31 am

कहाँ ले गये आप ! मन झूल रहा है झूले में ।
बेहतरीन कविता !

 
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