दीपक मशाल की पहचान एक ऐसे चिट्ठाकार की है , जिसके अंदाजे वयां कुछ अलग सा है . ये अपनी कविताओं में भोगे हुए यथार्थ को इस प्रकार चित्रित करते हैं कि वह पढ़ने वालों को लगता है कि उसकी बातें व्यान हो रही है शब्द-दर-शब्द . प्यार के अविस्मरणीय पलों की चाशनी में पगे साहित्य की मिठास, एक नवीन आरंभ के साथ इन्होने मसि कागद के माध्यम से किया और अनायास ही सबके दिलो दिमाग में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गए .आज इस अवसर पर प्रस्तुत है इनकी एक कविता .इस कविता के माध्यम से इन्होने छोटे कस्बों और महानगरों में एक लड़की के डरों को दिखाने की कोशिश की है ... और बताने की कि वो किस तरह से किन हालातों में डरते हुए जीती है और कैसे आतंकवाद समझती है..








वो आतंकवाद समझती है... 

वो आतंकवाद समझती है...
वो जब घर से निकलती है,
खुद ही
खुद के लिए दुआ करती है,
चाय की दुकान से उठे कटाक्षों के शोलों में,
पान के ढाबे से निकली सीटियों की लपटों में,
रोज़ ही झुलसती है.
चौराहों की घूरती नज़रों की गोलियाँ,
उसे हर घड़ी छलनी करती हैं.

आतंकवाद!!!!
अरे इससे तो तुम
आज खौफ खाने लगे हो,
वो कब से
इसी खुराक पे जीती-मरती है.
तुम तो आतंक को
आज समझने लगे हो
आज डरने लगे हो,
वो तो सदियों से डरती है,
ज़मीं पे आने की जद्दोज़हद में,
किस-किस से निपटती है.
तुम जान देने से डरते हो
पर वो
आबरू छुपाये फिरती है,
क्योंकि वो जान से कम और
इससे ज्यादा प्यार करती है.
तुम तो ढंके चेहरों और
असलहे वाले हाथों से सहमते हो,
वो तुम्हारे खुले चेहरे,
खाली हाथों से सिहरती है.
तुम मौत से बचने को बिलखते हो,
वो जिंदगी पे सिसकती है.
तुम्हे लगता है...
औरत अख़बार नहीं पढ़ती तो..
कुछ नहीं समझती,
अरे चाहे पिछडी रहे
शिक्षा में मगर,
सभ्यता में
आदमी से कई कदम आगे रहती है.
इसलिए
हाँ इसलिए,
हमसे कई गुना ज्यादा,
वो आतंकवाद समझती है
वो आतंकवाद समझती है....

() दीपक 'मशाल'
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13 comments:

ललित शर्मा ने कहा… 14 मई 2010 को 1:30 pm

सारगर्भित रचना,

आभार

रश्मि प्रभा... ने कहा… 14 मई 2010 को 1:30 pm

आतंकवाद का भय .... कितने दुःख की बात है...
बहुत सही रेखा चित्रित की है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा… 14 मई 2010 को 2:47 pm

बहुत खूबसूरत रचना है, पुरुषों की दुनिया ने महिलाओं को हमेशा कम आँका है।

सुनील दत्त ने कहा… 14 मई 2010 को 9:55 pm

सुन्दर रचना

दीपक 'मशाल' ने कहा… 15 मई 2010 को 3:17 am

कविता को सराहने और प्रकाशित करने के लिए आभार ब्लोगोत्सव टीम का..

'अदा' ने कहा… 15 मई 2010 को 3:30 am

ismein kya shaq..har kadam par aatanwaadi dikhein hain...baahar to bahaar ghar mein bhi ye chupe hain...
bahut hi sundar kavita...
naari hriday ke bhay ko uker gayi hai yah kavita...
hamesha ki karat lajwaab...
...didi

mala ने कहा… 15 मई 2010 को 10:24 am

उम्दा प्रस्तुती ,आपको अनेक शुभकामनायें /

पूर्णिमा ने कहा… 15 मई 2010 को 10:25 am

सुन्दर रचना

rashmi ravija ने कहा… 15 मई 2010 को 12:01 pm

बहुत खूब...औरतों के दर्द और सहनशक्ति को बड़ी अच्छी तरह बयाँ किया है...बिलकुल सत्य वचन...यथार्थ से परिचित कराती,एक संवेदनशील रचना

Sonal Rastogi ने कहा… 15 मई 2010 को 12:40 pm

नारी प्रजाति ...द्वारा रोज़ रोज़ झेले जाने वाली पीड़ा ... कितनी अच्छी तरह व्यक्त किया है आपने ...
धन्यवाद

वन्दना ने कहा… 19 मई 2010 को 12:06 pm

नारी ह्र्दय पर आतंकवाद की कितनी गहन छाया होती है उसका बहुत ही सटीक और सजीव चित्रण किया है।

kshama ने कहा… 19 मई 2010 को 8:14 pm

इसलिए
हाँ इसलिए,
हमसे कई गुना ज्यादा,
वो आतंकवाद समझती है
वो आतंकवाद समझती है....
Kya gazab likhte ho! Harek akshar ek kadvi sachhayi bayan karta hai..

kshama ने कहा… 11 जून 2010 को 2:14 pm

Is rachana ko phir ekbaar padha aur dil dard se bhar gaya..

 
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