विनय प्रजापति 'नज़र' मूलत: कवि हैं और 'कविता कोश' के सम्मानित रचनाकार हैं। उनकी कविता की बानगी 'गुलाबी कोंपलें' तथा 'चाँद, बादल और शाम' पर देखी जा सकती है। रिवर्स कोड इंजीनियरिंग में महारात रखने के साथ विनय प्रजापति ब्लॉगिंग की तकनीक के महारथी हैं। उनकी इस प्रतिभा को 'तकनीक दृष्टा' ब्लॉग और वेबसाईट पर देखा जा सकता है। चाहे वेबसाइट डिजाइनिंग हो और चाहे ब्लॉगिंग की एलेक्सा रैंक की बात, यकीनन हिन्दी ब्लॉग जगत में उनका कोई सानी नहीं है। यही कारण है कि जून 2009 में जब एलेक्स द्वारा गूगल के टॉप टेन ब्लॉग खोजे जा रहे थे, तो उस वक्त के टॉप 10 ब्लॉग में से 3 ब्लॉग उनके ही थे। और यदि साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन और तस्लीम  में उनके तकनीकी सहयोग को भी शामिल कर लिया जाए, तो यह संख्या 05 पहुंच जाती है, जो उनकी योग्यता की कहानी स्वयं कहती है। इसके अतिरिक्त उनका 'चर्चा मंच' और 'आनंद बक्षी' सम्बंधी योगदान भी सराहनीय है। इन्हें अभी हाल में ही संवाद सम्मान से नवाज़ा गया है , ये आजकल ब्लोगोत्सव-२०१० के तकनीकी सलाहकार हैं ...प्रस्तुत है उनकी कुछ नज्में- 

कृति 1: कोई दिलसिताँ नहीं आता

कोई दिलसिताँ नहीं आता इन पर,
तन्हा पड़ी हैं यह सड़कें
लाखों पाँव के निशाँ के बीच

बस अजनबी से चेहरे गुज़रते हैं रोज़
और मैं चेहरों में
एक ही शक़्ल ढूँढ़ता हूँ, तुम्हारी शक़्ल

कभी तेरे पाँव के निशाँ मिलें
तो मैं अपने घर तुमको बुलाऊँ,
‘एक बार दरवाज़े तक तो आये थे तुम’

यह सड़कें कब तक भीगेगीं, सूखेगीं
आँखों की तरह,
बस टूट-टूटकर कोसों तक…
वीरान धरातल में समाविष्ट हो जायेंगी
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कृति 2: वह दिवाली की शाम थी


वह दिवाली की शाम थी
तुम अपने घर की चौखट पे
पूजा के दिये रख रही थी
लिबास शामीन था तुम्हारा
सितारों वाली गहरी शफ़क़ की तरह
बिल्कुल यूँ लग रहा था मानो
गहरी शफ़क़ आस्माँ पर चाँद खिला हो

अगर उस रोज़ उस शाम
तुम्हें बद्र देख लेता तो
वह भी तुम्हें देखता ही रहता

तुम्हारा वह हुस्न
आज भी मेरी आँखों में वैसे का वैसा है
अब तो हर रोज़ हर शाम
हर चाँद धुँधला ही लगता है मुझे!

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कृति 3: आज टूटते बरसते रहे बादल

आज टूटते बरसते रहे बादल,
मेरे आगँन के नीम की पत्तियाँ
बारिश के बाद भी बूँदें छिटकाती रहीं

मन, गीला मन भर आया
दिल में हर आह चिटकती रही
शाम फिर गुलाबी थी आज…
आस्माँ में वह चाँद नहीं था
एक नया सतरंगी धनुष था
उदास मन तेरी यादों से ख़ुश था…

मैं कहता किससे? कौन सुनता मेरी?
समेट के पाँव के निशाँ सारे
मैं अपने कमरे में लौट आया

मगर एक सदा तुम तक ज़रूर पहुँची होगी
धड़कनों में अजनबी एक हूक उठी होगी
शायद मेरा नाम याद आया हो तुम्हें
शायद कोई मंज़र हरा पाया हो, शायद…
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कृति 4: जहाँ उस रोज़ देखा था तुम्हें [संस्करण 2.0]

बीते दिनों की गलियों में जब पाँव पड़ते हैं तो
अपने आपको तुझमें ढूँढ़ने लगता हूँ मैं
दिल के ज़ख़्म बर्फ़ की तरह जमने लगते हैं
और उदासियों की नज़्म उन्हें गरमाती रहती है…

मैं जानता हूँ पिछला कुछ भी बदला नहीं जा सकता
फिर भी ‘काश!’ की परछाईं मेरा पीछा नहीं छोड़ती
काश यूँ न होता, काश वैसा न किया होता, काश!
बस यही आवाज़ें मन में गूँजती रहती हैं…

सन्नाटों में झींगुर जाने किसको सदा देते हैं
चाँदनी ज़मीन पर जाने क्या ढूँढ़ती रहती है
मैं बंद कमरे में बैठा, खिड़की से बाहर देखता हूँ
तेरी यादें गली में टहलती नज़र आती हैं मुझे…

मेरी राह वही है जहाँ उस रोज़ देखा था तुम्हें
जब गुज़रता हूँ आँखें वही लम्हें ढूँढ़ती हैं
और हक़ीक़त के हाथ वहम के परदे उठा देते हैं
रह जाता दिल में गूँजता हुआ एक सन्नाटा…

मेरी ज़िन्दगी के पिछले सात पन्ने तुमने लिखे थे
जिनको मैंने अपने ख़ाबो-ख़्याल से सजाया था
कच्ची स्याही से लिखे वह लम्हों में बुने हर्फ़
लाख कोशिशों के बावजूद भूल नहीं पाया हूँ…

न मेरा नाम याद रखना, न मेरी चीज़ें सँभालना
न मेरी शक़्ल याद रखना, न मेरी वो बातें
तुम मुझे भुला दो बस यही दुआ करूँगा
याद आऊँ तो नाम न लेना फ़लाँ कह देना मुझे…

मुझको भूल जाने वालों को मैं भूल जाता हूँ
भीड़ में उनके चेहरे तक याद नहीं रखता मैं
तुम मेरा एक ख़ाब हो जिसे भूलना चाहता हूँ
और ज़हन से रोज़ यही इक बात उतर जाती है…

ख़ुदा तुम्हें मुझसे हसीन मुझसे ज़हीन कोई भी दे
और न दे तुम्हें तो कोई मेरे जैसा दीवाना
गो कि यकता हूँ मैं सारे ज़माने में
और तुम मुझ जैसा दूसरा ढूँढ़ नहीं पाओगी…
() () ()
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6 comments:

शारदा अरोरा ने कहा… 12 मई 2010 को 1:53 pm

विनय जी की सारी की सारी नज्में बहुत अच्छी हैं , जैसे अतीत बोल उठा हो , ख़ामोशी को बोलना आ गया हो । धन्यवाद

रश्मि प्रभा... ने कहा… 12 मई 2010 को 2:47 pm

यूँ नज़्म सारी अच्छी लगीं .... यह पंक्ति प्रिय लगी
कभी तेरे पाँव के निशाँ मिलें
तो मैं अपने घर तुमको बुलाऊँ,
‘एक बार दरवाज़े तक तो आये थे तुम’

Udan Tashtari ने कहा… 12 मई 2010 को 10:19 pm

विनय प्रजापति जी को पढ़्ना हमेशा सुखद रहता है. आनन्द आया आज भी.


एक विनम्र अपील:

कृपया किसी के प्रति कोई गलत धारणा न बनायें. विवादकर्ता की कुछ मजबूरियाँ होंगी, उन्हें क्षमा करते हुए अपने आसपास उठ रहे विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

-समीर लाल ’समीर’

mahi ने कहा… 13 मई 2010 को 1:07 pm

vinay ji ki nazmein hamein bahut pasand hain

वन्दना ने कहा… 19 मई 2010 को 12:16 pm

हमेशा की तरह दिल को छू लेने वालीं।

 
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