०६ दिसंबर १९५२ को आगरा में जन्मी शील निगम बी.ए. बी एड की डिग्रियां हासिल की.पच्चीस वर्ष शिक्षण कार्य किया, जिसमें पंद्रह सालों तक मुम्बई में प्रिंसिपल रही .अनेक लोक निरित्यों व नाटकों का लेखन एवं निर्देशन किया . देश विदेश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां एवं कविताएँ प्रकाशित .मुम्बई दूरदर्शन पर काव्य गोष्ठियों का संचालन.जी टी वी के लिए कहानियों  का लेखन.ऑस्ट्रेलिया में एक फिल्म स्क्रिप्ट पर अंग्रेजी में फिल्म निर्माणाधीन है .इन्होने सिंगापुर,ऑस्ट्रेलिया, मालदीव्स तथा यूनाटेड किंगडम की अनेको बार यात्रा की हैं . प्रस्तुत है आज इनकी एक कविता -


एक साया वक़्त का ..........

न तुम बेवफा थे न हम बेवफा थे ,
वो वक़्त बेवफा था जो हमें जुदा कर गया .
न तुम बेवफा थे न हम बेवफा थे ,
वो वक़्त का साया था जो तुम्हें चुरा ले गया .

पत्थरों के अनजान शहर में दो कदम साथ चले थे हम,
काँटों के बीच अनजानी सी राह पर साथ चले थे हम,
न जाने कब चुपचाप वक़्त का साया भी वहाँ से गुज़र गया .
मंजिल पर पहुँचने से पहले ही मुझे तुमसे जुदा कर गया.

याद आती हैं अनजान शहर की जानी-पहचानी सी बातें,
पत्थरों के शहर में बीती , काली पथरीली सी रातें,
वक़्त के कहर ढाने से पहले की मीठी सी मुलाकातें,
अब रह गयीं है बस उन यादों की ठंडी ठंडी सी आँहें.
बुरा वक़्त आया था, तो अच्छा वक़्त भी कभी आएगा .
जो कभी खुद ही तुम्हें मेरे दरवाज़े तक पहुँचा जायेगा.
इस उम्मीद में, इंतज़ार का वक़्त भी गुज़र जायेगा.
अगर न मिले, तो एक अरमान लिए दम निकल जायेगा .
आखिरी वक़्त पर...
दम निकलने तक बस तुम्हें ही याद किये जायेंगे.
अपनी पलकों को,
तुम्हारे हाथों से बंद करने की चाह लिए मर जायेंगे
तब तो शायद...
इस बेरहम वक़्त को हम पर थोड़ा सा रहम आ जाए.
तुम से मिलने की,
बस एक, हमारी आखिरी तमन्ना को तुम तक पहुँचा जाए .

शील निगम. 
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3 comments:

अक्षिता (पाखी) ने कहा… 24 मई 2010 को 3:59 pm

बढ़िया है...बधाई.

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'पाखी की दुनिया' में 'अंडमान में आए बारिश के दिन'

mala ने कहा… 24 मई 2010 को 4:05 pm

सार्थक रचना। हार्दिक बधाई।

Mrs. Asha Joglekar ने कहा… 17 जुलाई 2010 को 4:27 am

बहुत सुंदर ।

 
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