दिल्ली निवासी श्रीमती वन्दना गुप्ता एक समर्पित ब्लोगर ही नहीं कुशल गृहणी भी हैं । इन्हें  पढ़ने-लिखने का शौक है तथा झूठ से सख्त नफरत । ये  जो भी महसूस करती हैं , निर्भयता से उसे लिखती हैं । अपनी प्रशंसा करना इन्हें आता नही इसलिए इन्हें  अपने बारे में सभी मित्रों की टिप्पणियों पर कोई एतराज भी नही होता है। इनका  ब्लॉग पढ़कर आप इनकी सृजनधर्मिता को महसूस कर सकते हैं । प्रस्तुत है विभिन्न विषयों पर इनकी सुन्दर और सारगर्भित कविताएँ - 
"पत्थर हूँ मैं"

पत्थर हूँ ना 
खण्ड- खण्ड
होना मंजूर
पर पिघलना
मंजूर नहीं

स्थिर , अटल
रहना मंजूर
पर श्वास , गति
लय मंजूर नहीं

पत्थर हूँ ना
पत्थर- सा
ही रहूँगा
अच्छा है
पत्थर हूँ
कम से कम
किसी दर्द
आस , विश्वास
का अहसास
तो नहीं
कहीं कोई
जज़्बात तो नहीं
किसी गम में
डूबा तो नहीं
किसी के लिए
रोया तो नहीं
किसी को धोखा
दिया तो नहीं
अच्छा है
पत्थर हूँ
वरना
मानव
बन गया होता
और स्पन्दनहीन बन
मानव का ही
रक्त चूस गया होता
अच्छा है
पत्थर हूँ
जब स्पन्दनहीन
ही बनना है
संवेदनहीन
ही रहना है
मानवीयता से
बचना है
अपनों पर ही
शब्दों के
पत्थरों से
वार करना है
मानव बनकर भी
पत्थर ही
बनना है
तो फिर
अच्छा है
पत्थर हूँ मैं
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"मैं हिन्दुस्तानी हूँ"

मै हिन्दुस्तानी हूँ
मजहब की दीवार
कभी गिरा नहीं पाया
किसी गिरते को
कभी उठा नहीं पाया
नफरतों के बीज
पीढ़ियों में डालकर
इंसानियत का दावा
करने वाला
मैं हिन्दुस्तानी हूँ

भाषा को अपना
मजहब बनाया
देश को फिर भाषा की
सूली पर टँगाया
अपने स्वार्थ की खातिर
भाषा का राग गाया
कुर्सी की भेंट मैंने
लोगों का जीवन चढ़ाया
क्षेत्रवाद की फसल उगाकर
इंसानियत का दावा
करने वाला
मैं हिन्दुस्तानी हूँ

जातिवाद की भेंट चढ़ाया
लहू को लहू से लडवाया
गाजर -मूली सा कटवाया
फिर भी कभी सुकून ना पाया
नफरत की आग सुलगाकर
अमन का दावा करने वाला
मैं हिन्दुस्तानी हूँ


शहीदों के बलिदान को
हमने भुलाया
कुछ ऐसे फ़र्ज़ अपना
हमने निभाया
फ़र्ज़ का, बलिदान का,
देशभक्ति का पाठ
सिर्फ दूसरों को समझाया
आतंक को पनाह देने वाला
शहीदों के बलिदान को
अँगूठा दिखाने वाला
मैं हिन्दुस्तानी हूँ
हाँ, मैं सच्चा हिन्दुस्तानी हूँ
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"नारी को नारी रहने दो"

वो तो सीता ही थी
वो तो लक्ष्मी ही थी
त्याग , तपस्या
प्रेम समर्पण की
बेड़ियों में जकड़ी ही थी
अपने अरमानो की राख
ओढ़ पड़ी ही थी
फिर क्यूँ तुमने मजबूर किया
सीता से मेडोना बनने को
क्यूँ तुमको बाहर ही
उर्वशी रम्भा दिखाई देती थीं
जब तुमने मजबूर किया
उसने आगे कदम बढाया था
तुम्हारे दिखाए रास्ते
को ही अपनाया था
फिर क्यूँ आज हर गली
हर चौराहे, हर मोड़ पर
बातों के दंश लगाते हो
अपने झूठे दंभ की खातिर
क्यूँ नारी को प्रताड़ित करते हो
रूप सौंदर्य के पिपासुक तुम
क्यूँ मानसिक बलात्कार करते हो
सिर्फ अपना वर्चस्व कायम रहे
इसलिए मानसिक प्रताड़ना देते हो
सिर्फ एक दिन नारी का
सम्मान सह नहीं पाते हो
फिर कैसे तुम नारी को दुर्गा कहते हो
नारी पूजा का राग अलापते हो
खुद ही नारी को शोषित करते हो
दोहरे मानदंडों में जीने वाले
पुरुष तुम
क्यूँ अपनी हार से डरते हो
अपने अहम् की खातिर तुम
नारी की अवहेलना करते हो
तेरी जननी है वो
कैसे खुद से तुलना करते हो
वो तो आज भी सावित्री ही है
क्यूँ अपना नज़रिया नही बदलते हो
नारी की आवृत्ति को
नारित्त्व में ही रहने दो
अपने पुरुषत्व की छाँव
में ना जकड़ने दो
उसे जीने दो और आगे बढ़ने दो
बस नारी को नारी रहने दो
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परिकल्पना पर पुन: वापस जाएँ

13 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 10 मई 2010 को 3:44 pm

इनकी हर रचनाएँ इनके स्पष्ट व्यक्तित्व का स्वक्ष आइना होती हैं

mala ने कहा… 10 मई 2010 को 4:32 pm

बहुत ही सुंदर कविताएँ, समय के धरातल पर सत्या से साक्षात्कार कराती हुई, बधाइयाँ !

पूर्णिमा ने कहा… 10 मई 2010 को 4:56 pm

तीनों कविताएँ बहुत ही सुंदर है वंदना जी, आभार

zeal ने कहा… 10 मई 2010 को 5:05 pm

उसे जीने दो और आगे बढ़ने दो
बस नारी को नारी रहने दो
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waah !

राजकुमार सोनी ने कहा… 10 मई 2010 को 8:55 pm

सभी रचनाएं उम्दा है।

sangeeta swarup ने कहा… 11 मई 2010 को 10:53 am

तीनो रचनाएँ बहुत खूबसूरत हैं....बहुत बढ़िया

दीपक 'मशाल' ने कहा… 19 मई 2010 को 12:25 pm

वंदना जी की बेहतरीन कविताओं को इस मंच पर स्थान मिलना ही था.. बधाई.

aarya ने कहा… 19 मई 2010 को 12:28 pm

सादर वन्दे !
नारी है अपराजिता |
रत्नेश त्रिपाठी

दिगम्बर नासवा ने कहा… 19 मई 2010 को 1:40 pm

Lajawaab hain teeno rachnaayen ... bahut hi kamaal ka likha hai ..badhaai ..

Virender Rawal ने कहा… 19 मई 2010 को 7:06 pm

वंदना जी के लेखन में हमेशा सरसता और संवेदना दोनों होती हैं . साथ ही वो पूरी परिक्वता से ओतप्रोत होता हैं .
वैसे मैं उनका उनका लेखन की वजह से फैन नहीं हूँ बल्कि उनकी अध्यात्मिक सोच जो लेखन में हमेशा दिखती हैं वो बिलकुल आपके मन को आनंदित कर देती हैं . मेरे जैसे सामान्य से व्यक्ति के कहने से उनका कद बड़ा तो नहीं होगा क्योंकि वो तो वो पहले से ही बहुत ऊंचाई पर हैं . पर
उनके निष्काम लेखन और वो भी इतनी सामाजिक जिम्मेदारियो के बीच इतना सब कर पाना उनकी महानता ही दिखाता हैं . खैर ईश्वर उन्हें और खुशिया दे जो वो चाहती हैं .
साधुवाद हैं आप सभी सज्जनों का .
वीरेन्द्र .

kshama ने कहा… 19 मई 2010 को 8:11 pm

Oh Vandna! Tum mook kiye deti ho...!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा… 19 मई 2010 को 9:50 pm

तीनो ही रचनाएँ बहुत सुन्दर और सारगर्भित हैं!
बहुत-बहुत बधाई!

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 27 मई 2010 को 7:41 am

अर्थपूर्ण और संवेदनापूर्ण अभिव्यक्ति की माहिर रचनाकार है वन्दना जी !
कविताएं उत्तम हैं ! आभार प्रस्तुति के लिए !

 
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