एम० वर्मा एक ऐसे चिट्ठाकार हैं जिन्हें हिंदी ब्लॉग जगत खूब सम्मान देता है , इसका सबसे बड़ा कारण है उनकी बौद्धिक विनम्रता . अपने बारे में ये कुछ इसतरह बयान करते हैं-"वाराणसी में पला-बढ़ा, दिल्ली में अध्यापन कार्य में संलग्न हूँ। जब कभी मैं दिल के गहराई में कुछ महसूस करता हूँ तो उसे कविता के रूप में पिरो देता हूँ। अभिनय भी मेरा शौक है।" इस अवसर पर प्रस्तुत है उनकी एक वहुचर्चित कविता -

इस वारदात में मेरा कोई हाथ नहीं है ~~ 



~~

इस वारदात में
मेरा कोई हाथ नहीं है
क्योंकि,
जिस समय यह वारदात घटी
मैं अपने अपनों के बीच था
अपने सुमधुर और सलोने
मासूम से -
सपनों के बीच था।
मैने तो
एक अरसा पहले
थमायी थी बन्दूकें
मचलते हुए उन
अबोधों; दुधमुहों को
ताकि वे बहल जायें
मैनें तो
उन्हें इन बन्दूकों को
चलाना भी नहीं सिखाया था.
नफरत के शोलों से
इन्हें, इन बन्दूकों ने ही
रूबरू करवाया होगा
ये सारी साज़िशें
इन बन्दूकों की ही लगती है
क्योंकि,
वारदात के समय
पंचतारा होटल के
'स्विमिंग पुल' में
मैं निर्वस्त्र मछलियाँ
पकड़ रहा था
अब तो यकीनन
यकीन हो गया होगा
कि इस वारदात में
मेरा कोई हाथ नहीं है.
~~ () एम वर्मा
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8 comments:

nilesh mathur ने कहा… 7 मई 2010 को 4:13 pm

waah, bahut sundar rachna!

Shekhar Kumawat ने कहा… 7 मई 2010 को 4:18 pm

एम० वर्मा ji ko badhai

Udan Tashtari ने कहा… 7 मई 2010 को 4:29 pm

बहुत उच्च रचना.

mala ने कहा… 7 मई 2010 को 5:33 pm

....बेहतर प्रस्तुति , बधाईयाँ !

shashisinghal ने कहा… 7 मई 2010 को 5:47 pm

बहुत खूब वर्माजी क्या सुन्दर शब्द बुने हैं चुन - चुन कर , मजा आ गया । वास्तव में मेरा कोई हाथ नहीं है उस वारदात में..... मैंने तो बस बंदूक ही पकडाई थी ....चलाना थोडे ही सिखाया था .......वो तो कसूर बंदूक का है जो चल गई.......

Razia ने कहा… 7 मई 2010 को 6:31 pm

बहुत सुन्दर रचना
जितनी तारीफ की जाये कम
संवेदनशील

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 7 मई 2010 को 8:09 pm

वाह वर्मा जी क्‍या वार किया है। दांत दिखाने को मन करता है पर आपने तो पूरा तिलमिला दिया है।

रश्मि प्रभा... ने कहा… 8 मई 2010 को 8:25 am

satya se munh modte gunaah ka chhadm roop....bahut badhiyaa

 
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