नमस्कार!
मैं अरुण चन्द्र राय
बिहार के मधुबनी में जन्म, धनबाद, झारखंड में शिक्षा दीक्षा, दिल्ली में अपना विज्ञापन एजेन्सी चला रहा हू.. बचपन से कविता पढने और लिखने का शौक था लेकिन करियर में ये शौक दब गया था. अविनाश वाचस्पती जी, रश्मि जी के प्रोत्साहन से ब्लोग पर काविताये लिख रहा हू... आज इस ब्लोगोत्सव में प्रस्तुत है मेरी दो  कविताएँ--

!! गुल्लक !!


बच्चों को
अच्छा लगता है
गुल्लक

क्योंकि
अच्छा लगता है
दादा की चवन्नी
दादी की अठन्नी
काका का सिक्का
बच्चों को
अच्छा लगता है
गुल्लक
क्योंकि
अच्छा लगता है
छोटी छोटी बचत से
'सपनो को सच करने' का सपना
माँ के लिए इक अदद साड़ी लाने का सपना
पिता के लिए चश्मे का सपना
गुल्लक के भर जाने के बाद...

अब गुल्लक
नहीं रहे
और नहीं रहे
छोटी छोटी बचत से
पूरे होने वाले सपने !

!! निःशब्द !!

निःशब्द
स्तब्ध
खामोशी के प्रति प्रतिबद्ध
स्ट्रीट लाईट की तरह
मै जडा हू

देख राहा हू
भीड अपार
मोटरो और उनके हर्णो का शोर
और स्वार्थी समूहो की भरमार
बस
फुटपाथ से संबद्ध
खामोशी के प्रति प्रतिबद्ध
स्ट्रीट लाईट की तरह
मै गडा हू

मेरे लिये सामान्य सी बात है
किसी पैदल सवार का कुचला जाना
या फिर
किसी मा का बेटा छिन जाना
अब तो अपनी ही द्रिष्टी से ओझाल हो रहा हू
जीने को बाध्य
खामोशी के प्रति प्रतिबद्ध
स्ट्रीट लाईट की तरह
मै अडा हू

फैला रहा हू
चारो ओर प्रकाश
क्षणिक अंधकार मिटाने को
किंतु
अन्तः करण के अंधेरे से
अपनी छाया के थपेडे से
मौन धडक्नो के चीख्ते सान्नात्ते से
डर कर हो जाता हूँ  स्तब्ध
खामोशी के प्रति प्रतिबद्ध
स्ट्रीट लाईट की तरह
मै बस जहा हूँ
वही पडा हूँ
********************************
पुन: परिकल्पना पर वापस जाएँ

9 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा… 24 मई 2010 को 1:56 pm

पर आज भी जब गुल्लक (जो आज भी विश्वास से रखते हैं), फोड़ने का वक़्त आता है तो फोड़ने से लेकर गिनने तक आँखों में कुछ मासूम असली से ख्वाब तैरते हैं ...........
कवितायेँ दोनों बहुत अच्छी है

Sonal Rastogi ने कहा… 24 मई 2010 को 2:01 pm

sundar kavitaayein

संजय भास्कर ने कहा… 24 मई 2010 को 2:27 pm

कवितायेँ दोनों बहुत अच्छी है

संजय भास्कर ने कहा… 24 मई 2010 को 2:27 pm

हमेशा की तरह ये पोस्ट भी बेह्तरीन है
कुछ लाइने दिल के बडे करीब से गुज़र गई....

पूर्णिमा ने कहा… 24 मई 2010 को 3:47 pm

सार्थक रचना। हार्दिक बधाई।

गीतकार /geetkaar ने कहा… 24 मई 2010 को 3:49 pm

कविता अच्छी लगीं.बधाई।

mala ने कहा… 24 मई 2010 को 4:07 pm

सार्थक कविताये, हार्दिक बधाई।

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 24 मई 2010 को 4:10 pm

न रहीं चवन्नियां
न रहीं अठन्नियां
न रही गुल्‍लक
देखा सिक्‍कों का लक
भागेगा एक का सिक्‍का भी
गोल होते हैं
इसलिए रूक नहीं सकते
चलन से बाहर हो जाते हैं
घूमते घूमते।

किरण राजपुरोहित नितिला ने कहा… 24 मई 2010 को 6:32 pm

गुल्लक में बंद मासमू सपने !

 
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