श्री ललित शर्मा हिंदी चिट्ठाकारी में वह मुकाम प्राप्त करने में सफल हुए हैं जो शायद ही इतने कम समय में किसी ने प्राप्त किया हो . सहृदय और मृदुभाषी ललित जी एक साथ कविता, व्यंग्य, गीत और पेंटिंग में सार्थक हस्तक्षेप रखते है ,  प्रस्तुत  है आज इस अवसर पर उनका एक व्यंग्य : यम के भैंसासुर का भंडाफ़ोड़--चित्रगुप्त ने लगाया जोड़तोड़.....




व्यंग्य :
!! यम के भैंसासुर का भंडाफ़ोड़--चित्रगुप्त ने लगाया जोड़तोड़ !!
() ललित शर्मा


यमराज ने रात को चित्रगुप्त को बुलाकर चे्ताया कि मेरी सवारी भैंसा को कल सुबह अच्छे से नहला धुलाकर, खिला पिला कर तैयार रखना, कल मुझे अपने कोर्ट मे जल्दी जाना है। एक विशेष मुकदमे की सुनावाई करनी है, भुलना मत। अब राजा के यहां तो नौकर का भी चाकर होता है, चित्रगुप्त ने सेवकों को बुलाकर यमराज का फ़रमान सुना दिया और सोने चले गए। इधर सुबह हुई, यमराज कोर्ट जाने के लिए तैयार बैठे थे। चित्रगुप्त को बुलाकर पुछा-"क्यों सब तैयार है ना? चित्रगुप्त ने कहा-"हां महाराज, सब तैयार है"। यमराज ने कहा-जाओ एक बार देखकर आओ।

चित्रगुप्त यमराज के आदेश पर भैंसा के कोठा में जाते है तो देखते हैं कि सभी सेवक मुंह लटकाए खड़े हैं, उन्होने पुछा-'क्या हो गया? कौन मर गया जो तुम सभी लोग मुंह लटकाए खड़े हो, और रे मेहतरु तेरे को क्या हो गया है? जो पसीना छुट रहा है। मेहतरु भैंसा कोठा का मुकर्दम था। मेहतरु ने कहा- महाराज अभी भोर में ही मैं उठकर भैंसा को सुंदर धो मांज कर खिला पिला कर तैयार किया था। तभी रानी बाई का बुलव्वा आ गया पानी भरने का, मैं उनकी सेवा में चला गया, अभी आकर देखा तो कोठे से भैंसा नदारत है। सभी सेवकों को उसे ढुंढने के लिए भेजा हुं। अब क्या करना चाहिए आप ही सलाह दिजिए। इतना सुनना था कि चित्रगुप्त को लगा,पैरों के नीचे की धरती खिसक रही है। चित्रगुप्त ने कहा-जाओ जल्दी ढुंढ कर लाओ, अगर यमराज महाराज को पता चल गया तो सभी को रौरव नरक में भेज देंगे। जल्दी ढुंढो रे। तब तक मै महाराज का क्रोध शांत करने का उद्यम करता हुँ।

अब सभी सेवकों ने भैंसा को ढुंढना शुरु किया, खेत-खलिहान, बाड़ी-बखरी सब जगह ढुंढा जा रहा है। खोज तीव्र गति से जारी थी। इधर यमराज महाराज बार-बार चित्रगुप्त से पुछ रहे थे-क्या हो गया? मे्री सवारी अभी तक नहीं आई है? मेरा कोर्ट जाने का समय निकला जा रहा है। ऐसा ही होता है जब मुझे कोई विशेष कार्य होता है तब ये सब लेट लतीफ़ी का तमाशा करते करते हैं। नही तो दिन रात भैंसा पगुराते हुए बैठा रहता है। भेजो तो सभी को रौरव नरक में, साले वहीं पर सुधरेंगे जाकर, यहां तो हराम का खा-खा के मोटा गये हैं। चित्रगुप्त ने कोध्र शांत करने की दृष्टि से दांत निपोरते हुए कहा- इतना कोध्र ना करें महाराज, बस आपकी सवारी आती ही होगी। जैसे ही भैंसा को आपकी सेवा में लाया जा रहा था, उसने गोबर कर दिया, जिसमें उसकी पुंछ और पैर सन गए हैं, तो उसे धोने के लिए मैने फ़िर से वापस भेज दिया हैं। अब आप गोबर से सने हुए भैंसा की सवारी करेंगे तो अशोभनीय होगा। राह में चलते हुए लोग देखेंगे तो खिल्ली उड़ाएंगे। इसलिए यमराज के भैंसा का साफ़ सुथरा होना आवश्यक है।

इधर मेहतरु भैंसा को ढुंढते-ढुंढते हलाकान हो चुका था, उसका कहीं पता नहीं चल रहा था। तभी रास्ते में बरातु पहाटिया मिल गया । "राम-राम मेहतरु भैया" - कहां निकल पड़े सुबह-सु्बह? कुछ हलाकान दिख रहे हो? सब कुशल तो है? मेहतरु ने कहा-" क्या बताउं बरातु भाई! यमराज महाराज कोर्ट जाने के लिए तै्यार बैठे हैं, इधर भैंसा को मै नहला-धुला कर, खिला-पिलाकर तैयार किया था, पता नही अचानक कहाँ खिसक दिया है,उसी को ढुंढ रहा हुँ। बरातु ने कहा-" अरे! अभी तो भैंसा मुझे बाजार के पास मिला था, मैने उसे पुछा भी था कि कहां जा रहा है? तो उसने लछमन के लड़के भुलाऊ की कम्प्युटर दुकान में जाने की बात बताई थी, अब बाकी तुम समझो, मैने उसका पता बता दिया है। मेहतरु सबसे पहले समाचार देने के लिए चित्रगुप्त के पास दौड़े-दौड़े गया और बोला-"महाराज भैंसा मिल गया है, जल्दी चलिए बाजार में है नही तो फ़िर और कहीं खिसक गया तो समझ लो आफ़त आ जाएगी, हमारी सजा पक्की समझो।" चित्रगुप्त तुरंत मेहतरु के साथ चल पड़े, बाजार में पहुँचे तो भैंसा मिल गया। वह कम्प्युटर की दुकान में बैठा-बैठा पगुरा रहा था। चित्रगुप्त और मेहतरु को देख के बोला-" आओ आओ मै तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा था।"

भैंसा को देखते ही चित्रगुप्त का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ गया-" साले नमक हराम तु यहाँ पर बैठा पगुरा रहा है और वहां महाराज कोर्ट जाने के तेरा ईंतजार कर रहे हैं।" भैंसे ने भी गुस्से में आकर कहा-" आले-साले मत बोल चित्रगुप्त नहीं तो ठीक नहीं होगा। जैसे तुम लोग सेवक हो यमराज के वैसे मै भी हुँ। मैं यहां पर तुम्हारा ही काम लगाने आया हुँ। "क्या काम लगाने आया है?"-चित्रगुप्त ने पुछा। भैंसा बोला-" तुम लोग महाराज-महाराज कहके यमराज को कितना बेवकूफ़ बना रहे हो मैं सब जान गया हुँ मुझे इसी बात का यहाँ भंडाफ़ोड़ करना है। कल ही मुझे भुलाउ ने बताया कि एक इंटरनेट नाम की एक चीज आई है कम्प्युटर में। अगर तुम्हे किसी का भंडाफ़ोड़ करना है तो आना, मैं उसमें तुम्हारा ब्लाग बना दुंगा फ़िर तुम अपनी बात वहां लिखकर छाप देना। सारी दुनिया जान जाएगी और पोल भी खुल जाएगी, मै इसी लिए यहाँ पर आया हुँ।

"हम लोग क्या बेवकूफ़ बना रहे हैं रे? मेहतरु बोला। " चुप बे! (भैंसा को गुस्सा आ गया) मेरा दिमाग खराब होगा तो अभी सींग मार कर सुधार दुंगा साले तेरे को। बहुत हलाकान कर दिया है तुने मुझे। साले! मेरा खल्ली-चुनी, बिनौला को चोरी करके ले जाता है और अपनी भैंस को खिला देता है। मेरे लिए जो हरी घास आती है उसे अपने घर ले जाता है, पता नही क्या अपनी बीबी को खिलाता है या भैंसी को और मेरे को पुछ रहा है कि क्या बेवकू्फ़ बनाता हुँ। मेरा नहाने का साबुन, सर्फ़ एक्सेल, पीने का दारु सब चोरी करके अपने घर ले जाता है, मेरी परेशानी की पराकाष्ठा कल हो गयी,साले! कल रात को मेरा पड़वा भुखा रह गया। उसके खाने के लिए कुछ भी नही था। मेरी आत्मा ही तड़फ़ उठी, ऐसा क्या काम करना जिससे मेरा बच्चा ही भुखा रह जाए। सारी दुनिया बच्चों का पालन पोषण करने के लिए ही काम करती है। यमराज मेरा जो खाना खर्चा देते हैं उस पैसे तुम दोनो मौज उड़ा रहे हो और मुंछ में ताव देते घुम रहे हो और उधर पांच मन की सवारी का बोझा ढोते-ढोते मेरी हालत खराब हो गयी है। ये यमराज महाराज को भैंसे की सवारी का क्या शौक चढा है, राजा है तो घोड़े-वोड़े पर चढना चाहिए।

अब चित्रगुप्त तुम्हारी सुन लो, तुम्हारा भी मजा चखाऊंगा। तुम क्या करते हो मुझे नही मालुम क्या? यमराज की नाक के नीचे। यमराज के कोर्ट में पुरा भ्रष्ट्राचार का खेल तुम ही खेल रहे हो। जब कोई बड़ा मुकदमा आता है तो, पेशी बढाने का पैसा, गवाही आया है तो उससे पैसा, मुद्दई से पैसा, मुजरिम से पैसा, सभी तरफ़ से पैसा ही पैसा सकेल रहे हो। चारों तरफ़ से खाओ बाबु। यदि यमराज ने किसी को कुम्भिपाक नरक की सजा सुना दी तो उसकी फ़ाइल गायब कर दो, नरक वाले जब सजा का आदेश मंगाएं तो कह दो फ़ाईल नही मिल रही है और मुजरिम को यहीं मजा कराओ, तबियत खराब करवा के अस्पताल में दाखिल कर दो। तुम्हारी तो और भी बहुत ज्यादा पोल है जिसे मुझे दुनिया के सामने खोलना है। कम से कम सभी को पता तो चल जाएगा कि मृत्यु लोक का वायरस यहाँ तक आ गया है। मेरा दाना-पानी और चारा तक तुम लोग खा जाते हो, जाओ कह दो यमराज से मैं नही आने वाला। ये मेहतरु ही अपनी पीठ पर बैठा कर ले जाएगा कोर्ट यमराज को। जाओ तुम लोग, मेरा समय खराब मत करो, अब मुझे ब्लाग बनाकर तुम्हारी पोल खो्लनी है।

भैंसा की बातें सुन कर दोनों को सांप सुंघ गया। पुरी दुनिया के सामने नंगे हो जाएंगे, सारी पोल खुल जाएगी सोच कर दोनों ने भैंसे के पैर पकड़ लिए और कातर स्वर में बोले-" आज के बाद ऐसी गलती नही होगी भैंसा महाराज, आप क्रोध त्याग दिजिए। आपके जैसे ज्ञानी को क्रोध शोभा नही देता। हमें माफ़ करें और ये छापने-वापने का काम ना करें। "बोलो ना रे! अभी तो तुम लोग मुझे आले-साले कह रहे थे, और अभी पैर पकड़ कर माफ़ी मांग रहे हो, कैसे बे मेहतरु! छापुं क्या?" भैंसा ने कहा। "नही नही भैंसासुर जी, ऐसे मत किजिए, आप जो कहेगें वो सब मान्य होगा,- मे्हतरु की बजाय चित्रगुप्त ने रोंवासु होगे जवाब दिया।" चलो ठी्क है, लेकिन मे्री कुछ शर्तें हैं, जिन्हे तुम्हे माननी पड़ेंगी, बोलो तैयार हो?-भैंसे ने कहा।

चित्रगुप्त ने कहा-"बताईए भैंसासुर जी, आपकी सारी शर्तें मान्य होंगी। तो सुनो! भैंसासुर बोला- पहली शर्त मेरे कोठा में दो-दो घंटे मे गोबर कचरा साफ़ होना चाहिए, दुसरी बात, कुलर और पंखे का ईंतजाम होना चाहिए। तीसरी बात- इंटरनेट कम्प्युटर की व्यवस्था हो्नी चाहिए, टीवी डिस्क का कनेक्शन होना चाहिए, राखी का स्वयंवर देखने के लिए वो मुझे बहुत भाती है। रोज हरी हरी घास और खल्ली-चुनी की व्यवस्था दिन में दो बार होनी चाहिए, नहाने के लिए फ़व्वारा और बाथटब की व्यवस्था होनी चाहिए, लगाने के लिए फ़ेयर एन्ड लवली और बिल क्रीम होना चाहिए और मेहतरु मुझे दिन में दो बार डेटाल साबुन से नहलाएगा, मेरे पड़वा के लिए मेहतरु के भैंस के दुध का इंतजाम होना चाहिए, बोलो मंजुर है?

चित्रगुप्त और मेहतरु ने पैर पकड़ कर भैंसा से कहा- हमें मजुंर है भैसासुर महाराज, आप क्रोध त्यागकर हमारे साथ चलें, यमराज जी आपकी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे हैं, नाराज हो रहें हैं। "यमराज नाराज होगें तु्म्हारे उपर, मुझे उससे क्या लेना देना, और मेरे को कहीं क्रोध से कु्छ कहे तो तुम्हारा सब भेद यमराज के सामने ही खोल दुंगा" - भैसा ने कहा। चित्रगु्प्त ने कहा-"आप चलो भैंसासुर जी, वहां की बात मैं संभाल लुंगा, आपको कोई कुछ नही कहेगा, पुरी मेरी जिम्मेदारी हैं"। "चलो फ़िर चलता हुँ लेकिन जान लेना कि मैं भी छापना जान गया हुँ"-ऐसा कहकर भैंसासुर यममहल की ओर चल पड़े।

() ललित शर्मा

5 comments:

ललित शर्मा ने कहा… 5 मई 2010 को 4:05 pm

ऐकौ दर्शक नहीं है भैया,
अभी बाबा को भेजे थे वो भी खिसक दिए,
लोगन के पास टैइमे नहीं है का किजिएगा।

हम तो है।
बहुत बढिया रविंद्र भैया।

बी एस पाबला ने कहा… 5 मई 2010 को 5:40 pm

बढ़िया!
अंत तक बांध कर रखा ललित जी ने

बी एस पाबला

mala ने कहा… 5 मई 2010 को 7:46 pm

बहुत बढ़िया

रश्मि प्रभा... ने कहा… 5 मई 2010 को 10:13 pm

वाह, बहुत अच्छा लिखा

हिमांशु । Himanshu ने कहा… 27 मई 2010 को 7:18 am

ललित जी की सुघर कलम !
चुटीली शैली !
प्रविष्टि का आभार ।

 
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