समारोह में किसी का सम्मान हो गया है,
क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...?

सिर पर पत्थर उठाता है बबुआ,
क्या बचपन सच में जवान हो गया है...?
क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...

बूढ़े बाप का ख़ून जलाता है बेटा,
क्या सही में लायक संतान हो गया है...?
क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...

नारी है आज इस देश की राष्ट्रपति,
क्या चंपा का घर में बंद अपमान हो गया है...?
क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...

आज़मगढ़ में पंचर लगाता है जमाल,
क्या किस्मत का शाहरुख़ ख़ान हो गया है....
क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...?
समारोह में किसी का सम्मान हो गया है...

मेरे बारे में :
मेरे बारे में बस इतना जान लीजिये कि बंदा 15 साल से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है... अपनी अभिव्यक्ति को कभी कविता, कभी ग़ज़ल तो कभी व्यंग्य का का स्वरुप देकर आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ , ऐसा करना मुझे अच्छा लगता है .....ब्लोगोत्सव के लिए मैंने दो रचनाएँ भेजी थी, किन्तु ब्लोगोत्सव का समापन सन्निकट होने के कारण केवल एक व्यंग्य उस उत्सव में शामिल हो पाया ...यह ग़ज़ल रुपी मेरी व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति रवीन्द्र जी को काफी पसंद है , इसलिए उन्होंने ब्लोगोत्सव के बाद प्रस्तुत करने की इच्छा व्यक्त की और मैंने स्वीकार कर लिया !
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18 comments:

kshama ने कहा… 11 जून 2010 को 2:11 pm

Vidambnayen bahut sahi hain..lekin sadiyon se chali aa rahee hain...aaj kee baat to nahee!
Lekin in halaaton kaa izhaar behad sucharu roop se kiya hai aapne!

आचार्य जी ने कहा… 11 जून 2010 को 2:40 pm

आईये पढें ... अमृत वाणी।

Shekhar Kumawat ने कहा… 11 जून 2010 को 2:52 pm

सुंदर पोस्ट

Jandunia ने कहा… 11 जून 2010 को 2:55 pm

सुंदर पोस्ट

सतीश सक्सेना ने कहा… 11 जून 2010 को 3:16 pm

अरे वाह खुशदीप मियाँ !
पंकचर लगाने कहाँ पंहुच गए , कविता लेखन में भी वही दर्द ...शुभकामनायें

Mukesh Kumar Sinha ने कहा… 11 जून 2010 को 4:02 pm

kya bachpan sach me jawan ho gaya.......??

umda rachna!!

mala ने कहा… 11 जून 2010 को 5:58 pm

बहुत खूबसूरत कविता

पूर्णिमा ने कहा… 11 जून 2010 को 6:01 pm

भावपूर्ण रचना,बधाई।

गीतकार /geetkaar ने कहा… 11 जून 2010 को 6:03 pm

vaah, blogotsav ke baad kee rachanaayen itani sundar hai ki man ko mohit kar gayi....badhayi

shubham ने कहा… 11 जून 2010 को 6:19 pm

सुंदर पोस्ट,बधाई।

महेन्द्र मिश्र ने कहा… 11 जून 2010 को 6:43 pm

आज तो कविता पढ़कर तबियत खुश हो गई ..वाह वाह ..बढ़िया रचना ...आभार

दिलीप ने कहा… 11 जून 2010 को 7:02 pm

bahut sundar rachna sirji

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा… 11 जून 2010 को 11:37 pm

बहुत सुन्दर रचना। ब्लोग उत्सव मे प्रविष्टि पाना ही था उसे। और वैसे भी खुशदीप भाई की रचना पढ्कर आनन्द आ जाता है।

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 12 जून 2010 को 8:34 am

ब्‍लॉगोत्‍सव के बाद भी ब्‍लॉगोत्‍सव। खुशदीप जी की कविता के पंक्‍चर की तरह बुराईयों के टायरों में पंक्‍चर लगाने का दायित्‍व सभी को संभाल देना चाहिए।

डा० अमर कुमार ने कहा… 12 जून 2010 को 9:01 am


रचना बहुत अच्छी है,
जाने पहचाने भाव और कुरेद
सँदर्भों की तलाश कभी अँतहीन न होगी !

shikha varshney ने कहा… 12 जून 2010 को 12:33 pm

नारी है आज इस देश की राष्ट्रपति,
क्या चंपा का घर में बंद अपमान हो गया है...?
क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...
क्या बात कही है ...एकदम सटीक खुशदीप जी !

 
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