बहुत से चिट्ठाकारों ने कुछ अद्भुत काम किये. कह सकते है कि परमार्थ का पुरुषार्थ किया. सब अपनेअपने स्तर पर महान काम करते हैं, किन्तु एक ऐसे चिट्ठाकार जिनकी अवधारणाएँ हिंदी ब्लोगोंग की समृद्धि में जहा सहायक की भूमिका निभाती है, वहीं शब्द-दर-शब्द प्राणवान उर्जा को पूरी दृढ़ता के साथ प्रसारित भी करती है ! नाम है श्री गिरीश पंकज , जिनके इस आलेख की श्रेष्ठता के आधार पर ब्लोगोत्सव की टीम ने वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग विचारक का अलंकरण देते हुए सम्मानित करने का निर्णय लिया है ! "जानिये अपने सितारों को" के अंतर्गत आज प्रस्तुत है उनसे पूछे गए कुछ व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर-

(१) पूरा नाम : गिरीश पंकज

(२) पिता/ श्री कृष्णप्रसाद उपाध्याय माता का नाम/ श्रीमती सावित्री देवी

जन्म स्थान :वाराणसी

(३) वर्तमान पता : जी-३१, नया पंचशील नगर, रायपुर -४९२००१ (छत्तीसगढ़)

ई मेल का पता :girishpankaj1@gmail.com

टेलीफोन/मोबाईल न. 0771-2427100, 094252 12720

(४) आपके प्रमुख व्यक्तिगत ब्लॉग : ''गिरीश पंकज'' एवं '' सद्भावाना दर्पण''

(५) अपने ब्लॉग के अतिरिक्त अन्य ब्लॉग पर गतिविधियों का विवरण -

अन्य कुछ ब्लागों में सामयिक विषयों पर लेखन, जैसे ''सृजनगाथा'',''अभिव्यक्ति'', ''प्रवक्ता'', ''स्वतंत्र आवाज़'', '' रचनाकार '', ''चर्चा पान दुकान पर '' , ''बाल संसार'' , ''आज की ग़ज़ल'', ''सुबीर संवाद सेवा'' आदि कुछ पोर्टल-ब्लॉगों में समय-समय पर वैचारिक- लेखन.

(६) अपने ब्लॉग के अतिरिक्त आपको कौन-कौन सा ब्लॉग पसंद है ?:

इसका उत्तर कठिन है, क्योंकि अभी अनेक अच्छे ब्लाग होंगे , जिन तक मैं पहुँच ही नहीं पाया हूँ. और कभी-कभी अनजाने में कुछ महत्वपूर्ण नाम भी छूट जाते हैं, फिर भी जिन्हें मैंने देखा है, और अभी जो याद आ रहे हैं, उनमें- प्रवक्ता, हँसते रहो, परिकल्पना, किससे कहें, उड़न तश्तरी, मीडिया विमर्श, उदय प्रकाश, बिगुल, ललित डाट कॉम, अड़हा के गोठ,शिल्पकार, गीत गाता चल, काव्य मंजूषा, मीडिया मोर्चा, उष्मा, हिंदी भारत, दिव्य नर्मदा, गीत सलिला, दृष्टिपात, प्रेम जनमेजय, गीत मेरे, गीत, हिंदी कुञ्ज, कडुआ सच, राजतन्त्र, जे कृष्णमूर्ति, ओशो गंगा, शस्वरम, गुरतुर गोठ, यायावर, अलबेला खत्री, शहरोज़ का रचना संसार, शरद कोकास, कुसुम की यात्रा, चिट्ठाचर्चा, ब्लाग फार वार्ता, मोहल्ला, जिन्दगी के मेले, नुक्कड़, शब्दों का सफ़र, विस्फोट, पराया देश, अजय-दृष्टि, आरम्भ, आज की ग़ज़ल, भड़ास, संस्मरण, रचनाकार, चिकोटी, चक्रधर की चकल्लस, गवाक्ष, बाल मन, सहज साहित्य, नीरज, कोहबर, मुस्कराते पल, ज़िंदगी खामोश सफ़र, हिंदी टेक. ब्लाग, सुशीला पुरी, नन्हा मन, मेरे गीत, धान के देश में, बुरा भला, लावण्यम, ,श्रद्धा जैन, आदत मुस्कराने की, दिल की कलम से, गत्यात्मक चिंतन, स्वप्न, आदि. (मै जानता हूँ,कि अनेक महत्वपूर्ण नाम छूट गए होंगे, लेकिन मेरी याददाश्त की भी सीमा है. अभी इतने ही याद आ रहे है.)


(७) ब्लॉग पर कौन-सा विषय आपको ज्यादा आकर्षित करता है?-

सामाजिक जागरण को ले कर किये गए साहित्यिक-सामाजिक विमर्श, जीवन को नयी दृष्टि देने वाले सहज-आत्मीय-विचार, अन्याय के खिलाफ हस्तक्षेप करने वाला लेखन, व्यंग्य एवं छान्दस कविताए, ब्लॉग तकनीक और पुराने कर्णप्रिय फ़िल्मी गीतों से सम्बंधित कुछ ब्लाग भी मुझे अपनी ओर खींचते हैं.

(८) आपने ब्लॉग कब लिखना शुरू किया ?-

अगस्त, २००९ से.

(९) यह खिताब पाकर आपको कैसा महसूस हो रहा है ?

भला ऐसा कौन अभागा होगा जो कहेगा कि यह खिताब पा कर अजीब-सा महसूस हो रहा है. मैं तो इसे अपना परम सौभाग्य मानता हूँ, कि ब्लागों की भारी भीड़ में शामिल मुझ नाचीज़ पर भी आपकी नज़र पडी. आपने साबित किया है,कि अभी भी न्याय ज़िंदा है. साहित्य की दुनिया की माफिया- आलोचना ने मेरे साथ निरंतर अन्याय किया है. इसलिए यहाँ जब मेरा चयन हुआ तो लगा जख्मों पर मरहम-सा लग गया है. मेरे वैचारिक-सृजन को पहचान देने वाले ईमानदार एवं समर्पित लोग विद्यमान हैं. मुझे अनेक पुरस्कार मिले है, लेकिन यह पुरस्कार मेरे लिए और बेहतर काम करने की चुनौतियों का उपहार भी ले कर आया है. इसलिये बहुत अच्छा लग रहा है. एक और कारण भी है, वो यह कि कुछ वर्ष पहले लखनऊ में मुझे ''अट्टहास'' सम्मान मिला था, और अब यह सम्मान मिल रहा है.

(१०) क्या ब्लोगिंग से आपके अन्य आवश्यक कार्यों में अवरोध उत्पन्न नहीं होता ?

ज़रूर होता है. मेरा अन्य साहित्यिक लेखन प्रभावित हुआ. लेकिन ब्लाग के माध्यम से मै जो कुछ दे रहा हूँ, वह भी साहित्य ही है.

यदि होता है तो उसे कैसे प्रबंध करते है ?

इसलिए अब इसे थोड़ा-थोड़ा कम कर रहा हूँ. संतुलन बनाकर चल रहा हूँ. ब्लागिंग के माध्यमसे ही मै अनेक अच्छे लोगों तक पहुँच सका, इसलिए थोड़ा-बहुत नुकसान उठा कर भी इस कार्य को करता रहूँगाक्योंकि ब्लाग से जुड़ कर मै अपने आपको पहले से ज्यादा वैश्विक महसूस कर रहा हूँ.
(११) ब्लोगोत्सव जैसे सार्वजनिक उत्सव में शामिल होकर आपको कैसा लगा ?

एक नया अनुभव रहा. जब से ब्लाग की दुनिया में आया हूँ, तब से कुछ निम्नस्तरीय गतिविधियाँ भी देखी, लेकिन '' परिकल्पना' जैसे ब्लाग को देख कर लगा कि, हर कोई ऐसा नहीं है. आपने जिस मेहनत-लगन के साथ हजारों ब्लागों के बाग़ से तरह-तरह के फूल चुनने की जो कोशिश की है, उसे कोईभूल नहीं सकता. आभारी हूँ ब्लागोत्सव का, कि इसी बहाने मैं ब्लाग की दुनिया पर एक सार्थक लेख भी लिख सका.

(१२) आपकी नज़रों में ब्लोगोत्सव की क्या विशेषताएं रही ?-

सबसे बड़ी बात यह रही कि ब्लाग-समुद्र को आप ने ऐसा मथा...ऐसा मथा, कि अलग-अलग श्रेणियों की अनेक प्रतिभाएं, अनेक निधियां सामने आ सकी.ये प्रतिभाएं अपने-अपने क्षेत्र में अपना काम कर रही थी, मगर उनके बारे में कहीं कोई खास नोटिस नहीं लिया जा रहा था. लेकिन ब्लागोत्सव के बहाने ऐसे ब्लॉग और ब्लागरों पर ब्लाग-जगत की नज़र पड़ सकी. यही सबसे बड़ी विशेषता रही ब्लागोत्सव की.

(१३) ब्लोगोत्सव में वह कौन-सी कमी थी जो आपको हमेशा खटकती रही ?

अरे भाई, इस बारे में तो मैंने कभी सोचा ही नहीं.शायद होगी कुछ कमी लेकिन क्या करुँ, बेचारी मेरी ' सीमित नज़र' कभी उस दिशा में जा ही नहीं सकी. और सच कहूँ तो मै उतना ''प्रतिभाशाली'' भी नहीं हूँ, कि कमियाँ निकाल सकूं. यह काम ब्लागजगत के कुछ 'अज्ञात', 'गुमनाम' और ''बेनाम'' किस्म के लोग कर ही रहे हैं. इसी किस्म के कुछ ज्ञानी लोग ही कमियों पर प्रकाश डालेंगे . कमियों पर कभी मैंने सोचा ही नहीं इसलिए वे कभी खटकी भी नहीं.

(१४) ब्लोगोत्सव में शामिल किन रचनाकारों ने आपको ज्यादा आकर्षित किया ?

-बाप रे.....? फिर एक कठिन सवाल है. इसका उत्तर देना संभव नहीं. जो नाम छूट जाते है, वे लोग शत्रुता गाँठ लेते है.

(१५) किन रचनाकारों की रचनाएँ आपको पसंद नहीं आई ?

मुझे तो सभी अच्छे लगे. सच कहूँ, तो सबसे मैंने कुछ न कुछ सीखा है.

(१६) क्या इस प्रकार का आयोजन प्रतिवर्ष आयोजित किया जाना चाहिए ?

जी हाँ, ऐसे सुन्दर आयोजन प्रतिवर्ष होने चाहिए. आर्थिक-दृष्टि से साधन-संपन्न प्रायोजक मिल जाएँ तो एक राष्ट्रीय सम्मलेन भी करना चाहिए. इसमे बाहर से लोग बुलाये जाएँ. चुनिन्दा लोग आपस में मिलें. चर्चा हो. संगोष्ठियाँ हों. तब और अच्छा लगेगा जब उत्सव साकार होगा. अभी तो यह उत्सव केवल ''नेट'' वाला है. यह ''भेंट'' वाला भी बने. मेरी शुभकामना है, कि आप ऐसा कर सकें. इस बहाने पुनरावलोकन, परिमार्जन, आत्ममंथन, विश्लेषण, मेल-मुलाकातें, आलोचना-समालोचना आदि हो जाती है.

(१७) आपको क्या ऐसा महसूस होता है कि हिंदी ब्लोगिंग में खेमेबाजी बढ़ रही है ?

-हाँ, इस कटु सत्य को स्वीकारना ही होगा. खेमेबाज़ी एक तरह का अपरिहार्य अपराध है, किसी को जानबूझ कर अनदेखा करना, उसको काटना, उसका नाम उड़ा देना, किसी का ज़िक्र न करना यह सब अपराध है. हर अच्छी जगह जब आपराधिक फितरत के लोग आ जाते है, तब ऐसा ही होता है, यह मानवीय स्वभाव भी है. जो कुछ साहित्य की दुनिया में घटित हो रहा है, वो ब्लाग जगत में भी हो रहा है. मतलब यह कि बुरे लोग कहाँ नहीं हैं. और अच्छे लोग भी कम नहीं है. मानवीय स्वभाव बदला नहीं जा सकता. इससे जूझना ही पड़ता है. खेमे बनें, यह कोई बुरी चीज़ नहीं है. लेकिन अच्छे लोगों का खेमा बने यानी संगठन, मगर अच्छे लोग तो किनारे रह जाते हैं और बुरे लोगों का खेमा बन जाता है. और फिर शुरू होता है विद्वेष, साजिश, नफ़रत, टांग-खिंचाई आदि-आदि.

(१८) क्या यह हिंदी चिट्ठाकारी के लिए अमंगलकारी नहीं है ?

मेरा मानना है, कि अपराधी लोग बहुत दिनों तक सक्रिय नहीं रह सकते.कुछ दिनों तक वह खुराफातें करके वे थक जाते हैं और अपना दूसरा रास्ता चुन लेते है. चाकू से घरेलू काम कम होते हैं, यानी सब्जियां कम कटती हैं, हत्याएं ज्यादा होती हैं. चीज़ों का इस्तेमाल शातिर लोग भी करने लगते हैं, कम्प्यूटर, मोबाईल आदि तकनीकों का इस्तेमाल माफिया भी कर रहे हैं. यह तो होता ही है. ब्लाग-जगत में भी कुछ अमंगलकारी तत्व दीखते है. मगर मेरा विश्वास है, कि आने वाले समय में केवल भले लोग ही ब्लाग जगत में बचे रहेंगे. यह अमंगल भी जल्दी गल जाएगा... टल जाएगा और केवल मंगलकारी तत्व अपने अस्तित्व के साथ विराजमान रहेंगे और ऐसे लोगो की संख्या बढ़ रही है. इधर आने वाले कुछ चिट्ठे अपनी मौलिक स्थापनाओं एवं चिन्तन के साथ ही सामने आ रहे हैं.

(१९) आप कुछ अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताएं :
मेरा एक भाई है सतीश उपाध्याय. वह शिक्षक है. व्यंग्य भी लिखता है. दो बहिनें है. कल्पना शर्मा (अंबिकापुर) और अर्चना शर्मा (सिलीगुड़ी) . अर्चना भी कवितायेँ लिखती है. पत्नी मंजुला कालेज में हिन्दी प्राध्यापक है. पुत्र साहित्य बी.ई कर रहा है. गांधीवादी पिताजी जीवन भर खादी-कार्य में लगे रहे. उन्हीं के साथ रह रहा हूँ. साहित्य एवं पत्रकारिता के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर भी समाज में सक्रिय रहने की कोशिश करता हूँ. किशोरावस्था पार करते ही अपने नाम से अपनी जाति हटा दी थी और पिताजी की प्रेरणा से दूसरा संकल्प लिया आजीवन खादी वस्त्र पहनने का. इस पर अब तक अमल कर रहा हूँ. यही मेरा जीवन है.

(२०) चिट्ठाकारी से संबंधित ऐसा कोई संस्मरण जिसे आप इस अवसर पर सार्वजनिक करना चाहते हैं ?

एक-दो रोचक संस्मरण हैं. ब्लागिंग के कारण ही मुझे वर्षों बाद अपने एक ममेरे भाई का पता चल सका, जो आजकल वाशिंगटन में पत्रकारिता कर रहा है. सबसे बड़ी बात, यह है कि चिट्ठाकारी ने मुझे और व्यापक बनाया. अभी तक साहित्यिक लेखन के कारण एक सीमित पाठक वर्ग तक ही मेरी पहुँच थी. लेकिन जब से चिट्ठाकारी शुरू की है, अनेक नए मित्र बन गए है. बहुत-से चाहने वाले हो गए है. मेरा दायरा बढ़ा है. मेरे ब्लॉग की रचनाएँ कुछ पत्र-पत्रिकाओं में भी नियमित रूप से स्थान पा रही है. जब लोगों का फोन आता है तो और ज्यादा ख़ुशी होती है. नागपुर से एक साप्ताहिक निकलता है- ''दुनिया''. उसके संपादक कृष्ण नागपाल जी का एक दिन फोन आया. उन्होंने कहा कि आपके ब्लॉग की ग़ज़लें अपने अखबार में प्रकाशित करना चाहता हूँ. आपकी अनुमति चाहिए. मैंने खुशी-खुशी अनुमति दे दी क्योंकि इसके लाखों पाठक है. मेरी ग़ज़लें हर सप्ताह छप रही है. ग़ज़ल के साथ मेरा मोबाईल नंबर भी छपता है. लोग मुझे फोन करते है, मेरे विचारों की तारीफ करते है तो सुकून मिलता है. इसी तरह ब्लाग के चलते रांची से 'दृष्टिपात' निकलने वाले भाई अरुणकुमार झा से इतनी गहरी आत्मीयता हुई कि उन्होंने मुझे अपनी पत्रिका का मुख्य सलाहकार ही बना दिया जबकि हम आपस में कभी मिले भी नहीं यह बड़ी बात है. तो चिट्ठाकारी ने मुझे ''बहुत कुछ'' दिया है.

(२२ ) नए ब्लागरों के लिए कोई विशेष सन्देश..?
-बस यही सन्देश देना चाहूंगा, कि इस नए ' अद्भुत नए लोकतंत्र ' यानी ब्लाग का हम दुरुपयोग न करें, इसे अपनी कुंठाओं के वमन का साधन या ' डस्टबिन' न बनाये. बल्कि अपने भीतर के अच्छे मनुष्य और सर्जक को लोकव्यापी करें ताकि आपका यश फैले. ब्लाग निहायत व्यक्तिगत चीज़ है, इसका मतलब यह नहीं, कि इसमे कुछ भी लिख दिया जाये. ब्लाग बनाया और शुरू कर दिया अपनी कुंठा का लोकार्पण. कोई धर्म-कर्म का विवाद पैदा कर रहा है, तो कोई अश्लील शब्दावली से भारी कवितायें कर रहा है. ''ब्लाग'' एक सुन्दर ''बाग़'' है. आप यहाँ एक फूल की तरह महके, कांटे बन कर समरसता, सद्भावना, नैतिकता, जीवन -मूल्यों की देह को लहूलुहान न करे, बल्कि अपनी उन्नत परिकल्पनाओं के सहारे दुनिया को और बेहतर बनाने की कोशिश करें. जीवन के हर श्रेठ रंग ही यहाँ बिखेरे.

(२३) अपनी कोई पसंदीदा रचना की कुछ पंक्तियाँ सुनाएँ :हो मुसीबत लाख पर यह ध्यान रखना तुम

मन को भीतर से बहुत बलवान रखना तुम
बहुत संभव है बना दे भीड़ तुमको देवता
किन्तु मन में इक अदद इनसान रखना तुम.
यह भी देखे-
सुबह मोहब्बत, शाम मोहब्बत
अपना तो है काम मोहब्बत
हम तो करते है दोनों से
अल्ला हो या राम मोहब्बत
अनेक रचनाये है, लेकिन एक आख़िरी सुना ही देता हूँ, कि,
आपकी शुभकामनाएं साथ हैं,
क्या हुआ गर कुछ बलाएँ साथ हैं,
हारने का अर्थ यह भी जानिए
जीत की संभावनाएं साथ हैं,
इस अँधेरे को फतह कर लेंगे हम
रोशनी की कुछ कथाएं साथ हैं


बहुत बहुत धन्यवाद गिरीश जी .....इस अवसर पर ऋग्वेद की दो पंक्तियां आपको समर्पित है कि - ‘‘आयने ते परायणे दुर्वा रोहन्तु पुष्पिणी:। हृदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमें ।।’’अर्थात आपके मार्ग प्रशस्त हों, उस पर पुष्प हों, नये कोमल दूब हों, आपके उद्यम, आपके प्रयास सफल हों, सुखदायी हों और आपके जीवन सरोवर में मन को प्रफुल्लित करने वाले कमल खिले।

आपका और आपकी टीम का बहुत-बहुत धन्यवाद , ब्लोगोत्सव जैसी खुबसूरत और नायाब परिकल्पना को मूर्तरूप देने हेतु ...!

प्रस्तुति : रवीन्द्र प्रभात

11 comments:

पूर्णिमा ने कहा… 2 अगस्त 2010 को 4:24 pm

गिरीश पंकज जी को हार्दिक बधाई।

mala ने कहा… 2 अगस्त 2010 को 4:26 pm

गिरीश जी के बारे में काफी कुछ जानने को मिला। आभार एवं बधाई।

गीतेश ने कहा… 2 अगस्त 2010 को 4:28 pm

गिरीश पंकज जी को बधाई !

ललित शर्मा ने कहा… 2 अगस्त 2010 को 5:17 pm

वाह गिरीश भैया,
बेबाक राय के लिए शुभकामनाएं

Dr Subhash Rai ने कहा… 2 अगस्त 2010 को 7:53 pm

Girish bhaai ko badhaaiyaa aur shubhkaamanayen.

Udan Tashtari ने कहा… 2 अगस्त 2010 को 8:19 pm

गिरीश पंकज जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ.

Rajendra Swarnkar ने कहा… 2 अगस्त 2010 को 9:57 pm

बधाई गिरीश पंकज जी !
ब्लॉगोत्सव में वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग विचारक के रूप में सम्मानित-पुरस्कृत होने पर !

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 3 अगस्त 2010 को 8:25 am

ऐसे ही होते हैं सुविचार
गिर के ईश गिरीश भाई
की वैचारिकता के सहारे
हम सब परवान चढ़ रहे हैं
मन से शुभकामनाएं।
गिरीश भाई से नेट मुलाकात ही हुई है, अब भेंट मुलाकात की घनघोर तमन्‍ना है।

खुशदीप सहगल ने कहा… 3 अगस्त 2010 को 1:49 pm

गिरीश पंकज जी को बहुत-बहुत बधाई...

रवींद्र जी और ब्लॉगोत्सव टीम २०१० का आभार...

जय हिंद...

 
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