डा.सुभाष राय हिंदी ब्लोगिंग के समर्पित व सक्रिय विद्यार्थियों में से एक हैं...इनके अनुसार ये साहित्य और दर्शन का विद्यार्थी हैं । निरंतर सीखते जाना और जीवन को समझना ही इनका लक्ष्य है। यह हम सभी के लिए वेहद सुखद विषय है कि वे ब्लोगिंग के माध्यम से अपने अर्जित ज्ञान को बांटने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं ...... ब्लोगोत्सव-२०१० पर प्रकाशित इनके आलेख : जाति न पूछो साध की को आधार मानते हुए ब्लोगोत्सव की टीम ने इन्हें वर्ष के श्रेष्ठ सकारात्मक ब्लोगर (पुरुष ) का खिताब देते हुए सम्मानित करने का निर्णय लिया है . "जानिये अपने सितारों को" के अंतर्गत प्रस्तुत है इनसे पूछे गए कुछ व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर-


(१) पहले तो आप अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताएं



मैं अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना के लिये विख्यात कस्बा मऊ नाथ भंजन से सटे हुए गांव बड़ा गांव निवासी श्री रामायन राय और श्रीमती शाहजादी राय के पुत्र के रूप में 1957 की जनवरी के प्रथमदिवस यानि पहली तारीख को ननिहाल मधेसिया में जन्मा. तब मेरा गांव और ननिहाल दोनों ही राहुल और हरिऔंध के जनपद आज़मगढ़ में पड़ते थे. पढ़ाई और जीविका के संघर्ष ने अपने घर से बहुत दूर ला पटका.


(२) आप पत्रकार हैं और सीहित्य से जुड़े हैं,इस आभासी दुनिया में आकर आपको कैसा महसूस हुआ ?

अभी मैं ब्लाग जगत में नया हूं और इस भूलभुलैया में अनियंत्रित घूम-घूम कर मजे ले रहा हूं, साथ ही साथ इसकी सम्भावनाओं और असम्भावनाओं पर चिंतन-मनन भी कर रहा हूं, इसलिये अपनी पसन्द के ब्लागों के नाम ले पाना थोड़ा मुश्किल है. पर धीरे-धीरे मोती चुन रहा हूं. साहित्यिक रुचि होने के कारण काव्य और आलोचना शैली से साबका रखने वाले ब्लाग मुझे पसन्द हैं. मेरी प्रारम्भिक शिक्षा विज्ञान की रही है, इसलिये कोई भी अगर तर्कसम्मत और विवेचनात्मक तरीके से कहीं भी अपनी बात कह रहा है, तो वह मेरी पसन्द में आज नहीं भी है तो कल जरूर होगा. विज्ञान और साहित्य मेरी जीवन शैली के अभिन्न अंग हैं, इसलिये जहां भी इनसे सम्बन्धित बात होती हुई दिखती है, वहां ठहरना मेरे सहज स्वभाव में है. मार्च 2010 में ब्लाग की दुनिया में दाखिल हुआ और अब गति तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है.


(3) क्या ब्लोगिंग से आपके अन्य आवश्यक कार्यों में अवरोध उत्पन्न नहीं होता ?
कीर्ति, कामिनी और कंचन, यही इस दुनिया के बड़े आकर्षण हैं. इन्हीं से बंधा हुआ हर कोई चकरघिन्नी होकर भाग रहा है. पर जहां तक मेरी बात है, मुझे कंचन कभी बांध नहीं सका. कामिनी से कभी छूट नहीं सकूंगा, वह निरंतर वामा के रूप में मेरे साथ विद्यमान रहती है. नहीं कहूंगा कि कीर्ति की आकांक्षा ही नहीं रही. झूठ बोलना ठीक नहीं. लेखन से कीर्ति बढ़ती है, सम्मान मिलता है और यह यश किसे प्रसन्नता नहीं देता. मैं कहूंगा कि यह सम्मान पाकर मैं प्रसन्न अनुभव कर रहा हूं. मेरी कोशिश होती है कि अपने कार्यालयीय दायित्व से अपने निजी शौक को अलग रखूं. ब्लागिंग मेरा निजी शौक है, इसलिये कार्यालय के समय का इसमें इस्तेमाल करने से बचने का प्रयास करता हूं. हां इस शौक से कुछ निजी और जरूरी कामों में व्यवधान जरूर पड़ता है. इस व्यवधान से जो क्षति होती है, उसके बदले घर में डांट खाने के लिये हमेशा तैयार रहता हूं. उसकी क्षतिपूर्ति हर बार मेरी अर्धांगिनी को करनी पड़ती है.


(४) परिकल्पना ब्लॉग उत्सव में शामिल होना और फिर इस खिताब को पाकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?
परिकल्पना ब्लागोत्सव इस नयी दुनिया में मेरे लिये एक नया अनुभव लेकर आया. अपने ब्लाग पर तो कोई कुछ भी लिखने और छापने के लिये स्वतंत्र होता है. उसकी कसौटी वह स्वयं तय करता है या कभी-कभी बिना किसी कसौटी के मनमाना लिखता है. पर जब किसी के लेखन को एक खास तरह की कसौटी से गुजरना हो तो यह लेखक के लिये तो एक चुनौती तो होती ही है, इसका सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि सम्पादक, संकलक या आयोजक अपने निर्धारित मानकों के अनुसार चुनी हुई रचनाओं को प्रस्तुत करने में सफल होता है. और ऐसी स्थिति में वह वांछित सन्देश देने में कामयाब होता है. जाहिर है, इस तरह की प्रक्रिया में चुने हुए लेखकों, रचनाकारों को ही अवसर मिल पाता है लेकिन इससे उन लोगों को अच्छा लिखने की प्रेरणा मिलती है, जो भविष्य में कुछ चुने हुओं में शामिल होना चाहते हैं. एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का जन्म होता है. मैं कहूंगा कि इस नजरिये से ब्लागोत्सव कामयाब रहा. असल में अब लेखन का आयाम बहुत विस्तार ग्रहण कर चुका है. साहित्य की तमाम विधाओं के अलावा जीवन के अनेक उपयोगी क्षेत्रों पर बहुत सारा लेखन हो रहा है. संस्कृति, स्वास्थ्य, परिवार, प्रबन्धन, मीडिया, कला के क्षेत्र तथा अन्यान्य विषयों पर प्रचुर सामग्री लिखी जा रही है. अनुवाद भी खूब हो रहे हैं. अगर वर्गीकृत तरीके से इन सब क्षेत्रों पर अच्छे लेखकों को अवसर दिया जाता तो उत्सव और भी महत्वपूर्ण हो सकता था. इसके लिये ब्लाग जगत के बाहर से भी अगर अद्यतन खोजकर प्रकाशित करने की कोशिश होती तो ब्लाग लेखन को समृद्धि और सबक हासिल करने का मौका मिलता. अपनी सीमाओं के बावजूद ब्लागोत्सव सफल माना जायेगा. मेरे प्रिय भाई रवीन्द्र प्रभात जिस तरह इसमें ज़ुटे रहे और जिस तरह आगे इसे और बेहतर बनाने के लिये लोगों से सुझावों की अपेक्षा की जा रही है, निस्सन्देह भविष्य में यह और सुगठित, संस्कारित होकर सामने आयेगा. मेरी शुभाशंसायें हैं, मैं चाहूंगा कि हर वर्ष यह आयोजन होता रहे और उत्तरोत्तर बेहतर होता जाये।


(५) आपको क्या ऐसा महसूस होता है कि हिंदी ब्लोगिंग में खेमेवाजी बढ़ रही है ?

खेमेबाजी से जीवन का कोई क्षेत्र अछूता नहीं है. जब भी कोई प्रयास छोटे से बड़ा होने लगता है, प्रभाव और शक्ति ग्रहण करने लगता है, कुछ लोग उसका ज्यादा से ज्यादा लाभ लेने का प्रयास करने लगते हैं. यही प्रयास खेमेबाजी को जन्म देता है. ब्लाग जगत में भी अगर ऐसा है तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है. इससे नुकसान होता है. कुछ अयोग्य लोगों को ज्यादा महत्व मिल जाता है और कुछ निहायत सक्षम और सही लोग अपने प्राप्तव्य से वंचित रह जाते हैं. इसलिए जो लोग ब्लागजगत को समृद्ध देखना चाहते हैं, उन्हें इस तरह की खेमेबाजी का खुलकर प्रतिरोध करना चाहिए. मेरा मानना है कि ब्लागों के जरिये जो एक संगठित लेखकीय ताकत खड़ी हो रही है, उसे बहुत हल्के से नहीं लिया जाना चाहिये. यह एक गम्भीर रचनात्मक आन्दोलन का बीज-सूत्र है बशर्ते हम ठीक से समझ पायें।


(६) एक सुन्दर और खुशहाल सह अस्तित्व की परिकल्पना को मुर्रूप देने के उद्देश्य से परिकल्पना द्वारा जो सात्विक अभियान चलाया जा रहा है उसके बारे में आपकी क्या राय है ?

समाज, देश और उससे भी ऊपर दुनिया को बदलने की आकांक्षा से प्रेरित होकर अगर हम इस अभियान को आगे बढाएं तो बात ही कुछ और होगी. समाज तुरंत बदल जायेगा, न तो यह उम्मीद करनी चाहिए न ही यह जरूरी है पर बदलने की आग अगर बुझ गयी तो बहुत बड़ा खतरा हमारे सामने खड़ा होगा. उससे निपटना कठिन हो जायेगा. मुझे व्यक्तिगत तौर पर कुछ बातों से निराशा होती है. जब कोई लेखक केवल प्रतिक्रिया की चाह या प्रेरणा से लिखता है या ज्यादा से ज्यादा प्रतिक्रिया पाने के हथकंडे इस्तेमाल करता दिखता है, तो लगता है कि वह भटकाव में है. प्रतिक्रिया यह तय नहीं करती कि कोई चीज कितनी महत्वपूर्ण है, वह भी प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया तो बिल्कुल ही नहीं. हर ब्लागर को आलोचना के लिये तैयार रहना चाहिये और हर पाठक को, चाहे वह ब्लागर ही क्यों न हो, प्रतिक्रिया देते समय यह जरूर ध्यान रखना चाहिये कि वह लेख या कविता या जो भी सामग्री हो, उसे पहले पूरा पढ ले और फिर एक आग्रहहीन आलोचक की तरह अपना मत दे. किसी को भी इस बात का बुरा नहीं मानना चाहिये कि कोई उसके लिखे पर नकारात्मक टीका-टिप्पणी कर रहा है. अगर हम ऐसा निश्चय करके आगे बढ़ें तो हम स्वस्थ बहस की शुरुआत कर पायेंगे. बहुत अच्छा, बढिया, सार्थक, सुन्दर, शुभकामनायें आदि इत्यादि जैसी निरर्थक टिप्पणियों का कोई मतलब नहीं है. इससे अच्छा तो कोई टिप्पणी न करें. ब्लागों को सार्थक बहस का मंच बनाने की आवश्यकता है ताकि हम समाज की, देश की परिस्थितियों मे सम्यक और सार्थक हस्तक्षेप कर सकें. अगर हम वक्त से ऐसा नहीं कर पाये तो ब्लाग की दुनिया और उसकी ताकत को कोई स्वीकार नहीं करेगा और यह कुछ खाली लोगों के मनोरंजन और शगल के अलावा अपनी कोई और छवि नहीं बना सकेगा.


(७) आप कुछ अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में और बताएं
मेरा अपना जीवन एक सतत खोज की तरह रहा है. राजनीति, अध्यात्म, तंत्र-मंत्र से होता हुआ पत्रकारिता तक निरंतर मैं अपने को ही खोजता रहा हूं. प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई गांव की पाठशाला में हुई। शुरुआती दिनों में विज्ञान का विद्यार्थी रहा। मऊ के डी सी एस के डिग्री कालेज से हिंदी, अंग्रेजी और मनोविज्ञान विषयों के साथ स्नातक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आगरा विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध साहित्य संस्थान के.एम.आई. से हिंदी भाषा और साहित्य में स्नातकोत्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वहीं से विश्वविद्यालयीय शिक्षक योग्यता परीक्षा नेट पास की, विधि की पढ़ाई पूरी की और उत्तर भारत के विख्यात संत कवि दादूदयाल के रचना संसार पर शोध किया। डाक्टरेट मिली। पर यहां तक पहुंचा बहुत टेढ़े-मेढ़े रास्ते से.जब बी ए की पढ़ाई कर रहा था, इमरजेंसी लग गयी. भीतर का स्वाधीनचेता व्यक्ति उठ खड़ा हुआ, नारेबाजी और आन्दोलन का दौर चला और उसने ला पटका आजमगढ़ जेल में. शिक्षा में व्यवधान पैदा हो गया. बाद में प्रयाग आ गया. वहां जीविका के लिये अखबारनवीसी शुरू की और गुपचुप तांत्रिकों की मंडली में शामिल हो गया. वह लम्बी कहानी है. 1986 में शादी के बाद जीवन एक रास्ते पर आया. 1987 में आगरा आ गया. बाकी शिक्षा आगरा में ही हुई. यहां आने के बाद 20 वर्षों तक मैं खुद अपने को भी भूल गया. काम में इस तरह जुटा कि कुछ और सोचने का अवसर ही नहीं मिला. इधर तीन सालों से थोड़ा अवकाश मिलना आरम्भ हुआ है.


(८) चिट्ठाकारी से संवंधित क्या कोई ऐसा संस्मरण है जिसे आप इस अवसर पर सार्वजनिक करना चाहते हैं ?
वैसे तो जब मैट्रिक का विद्यार्थी था, तभी से जनवार्ता, गांडीव जैसे काशी के समाचारपत्रों में कविताएं, कहानियां और आलेख प्रकाशित होने लगे थे। इंटर पास करने के बाद का समय विकट युद्ध का रहा। साहित्य के प्रति लगाव की एक धारा लगातार भीतर उपस्थित रही लेकिन विधिवत लेखन और प्रकाशन के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिला। सच कहें तो शोध पूरा करने के बाद फिर से मैं नींद से उठा. सम्प्रति रचना कर्म में निरंतरता. हिंदी क्षेत्र की लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं जैसे वर्तमान साहित्य, अभिनव कदम, अभिनव प्रसंगवश, धरती, लोकगंगा, मधुमती, आजकल, वसुधा, शोध-दिशा, समन्वय आदि में लगातार लेख, व्यंग्य, समीक्षा और कविताओं का प्रकाशन। सृजनगाथा में प्रकाशित मेरी कविताएं मई माह में लोकप्रियता की दृष्टि से शीर्ष पर रहीं हैं. ई-मैगजीन अनुभूति, सृजनगाथा, कृत्या, रचनाकार, गर्भनाल और भोजपुरी की प्रसिद्ध वेब मैगजीन अँजोरिया में कवितायेँ और अन्य रचनाएं। कविता कोश और काव्यालय में भी कवितायें. अपने ब्लाग बात-बेबात के अलावा मीडिया-मंच, नुक्कड़, भड़ास४मीडिया पर निरंतर लेखन.
(९) आप अपनी सृजनात्मकता के बारे में कुछ बताएं
नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर डा. उमा शंकर तिवारी, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक डा. कन्हैया सिंह, नयी कविता के शीर्ष रचनाकारों में शामिल श्रीराम वर्मा के अलावा हिंदी के अनन्य साधक डा रघुवंश, जगदीश गुप्त, मार्कंडेय जी, दूधनाथ सिंह, सोम ठाकुर, प्रो हरिमोहन और डा जय सिंह नीरद के सानिध्य में बैठकर साहित्य पढ़ने का अवसर मिला। केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के पत्रकारिता विभाग में छः माह तक अध्यापन. प्रयाग के नार्दर्न इंडिया पत्रिका ग्रुप में सेवा शुरू करके तीन दशकों की इस पत्रकारीय यात्रा में अमृत प्रभात, आज, अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभालने के बाद इस समय आगरा में पत्रकारिता के मिशन में सक्रिय.फिलहाल मेरा निवास है-ए:158, एम आई जी, शास्त्रीपुरम, आगरा. ईमेल पता -raisubhash953@gmail.com/ मोबाइल नम्बर-09927500541.सक्रिय ब्लाग है बात-बेबात (http://www.bat-bebat.blogspot.com/). वेबदुनिया पर भी इसी नामाक्षर से मेरा ब्लाग है. शब्दांत और कहानी नाम से दो निष्क्रिय ब्लाग भी हैं, जिन्हें मैं ड्राफ्ट ब्लाग की तरह प्रयोग करता हूं. ब्लागजगत के जादुई व्यक्तित्व अविनाश वाचस्पति के नुक्कड़, पिताजी और तेताला से तथा प्रिय यशवंत सिंह के भड़ास ब्लाग से जुड़ा हूं।

बहुत बहुत धन्यवाद आपका समय देने के लिए ...!


.....इस अवसर पर ऋग्वेद की दो पंक्तियां आपको समर्पित है कि - ‘‘आयने ते परायणे दुर्वा रोहन्तु पुष्पिणी:। हृदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमें ।।’’अर्थात आपके मार्ग प्रशस्त हों, उस पर पुष्प हों, नये कोमल दूब हों, आपके उद्यम, आपके प्रयास सफल हों, सुखदायी हों और आपके जीवन सरोवर में मन को प्रफुल्लित करने वाले कमल खिले।



प्रस्तुति : रवीन्द्र प्रभात

12 comments:

girish pankaj ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 11:49 am

vaah-vaah, subhash bhai, sammanit hone ke liye badhai. aap jaise logon ka samman to tay hi tha. achchha laga. nirantar likhate rahe, jagaran karate rahe. shubhkamanaye.

Rajendra Swarnkar ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 1:27 pm

आदरणीय डॉ.सुभाष राय जी
बहुत बहुत बधाई !
ब्लॉगोत्सव में इतने जाने - अनजाने लोगों को सम्मान मिला , वहां यदि " डॉ.सुभाष राय " नाम न होता तो मलाल रहता ।
सच, हार्दिक प्रसन्नता हुई ।
रवीन्द्र प्रभात जी सहित परिकल्पना ब्लॉगोत्सव टीम को भी बधाई और साधुवाद !

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

संगीता पुरी ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 1:59 pm

डॉ सुभाष राय जी के बारे में जानकर बहुत अच्‍छा लगा .. उन्‍हें बधाई और रविन्‍द्र प्रभात जी के सहित परिकल्‍पना की पूरी टीम को धन्‍यवाद !!

ललित शर्मा ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 3:09 pm

सुभाष जी के बारे में जानकार अच्छा लगा।

सभी को ढेर सारी बधाईयां

mala ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 3:31 pm

सुभाष जी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ।

गीतेश ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 3:32 pm

आदरणीय डॉ.सुभाष राय जी
बहुत बहुत बधाई !

पूर्णिमा ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 3:34 pm

बहुत बहुत बधाई !

Udan Tashtari ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 4:51 pm

बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ.

संजीव गौतम ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 6:49 pm

bahut dinon baad ek sahi kkarya dekha. rai sir ko bahut-bahut badhai.

arun c roy ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 7:56 pm

डॉ. सुभाष जी से मिलकर अच्छा लगा! आपका जीवन हमे भी प्रेरित कर रहा है! सम्मान के लिए बहुत बहुत बधाई !

अविनाश वाचस्पति ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 9:42 pm

सकारात्‍मकता
संगीता जी
सुभाष जी
सत्रयी

पिछली टिप्‍पणी रिपीट करने को मजबूर हूं

सकारात्‍मकता के लिए सुभाष और संगीता जी। तीनों स से। क्‍या खूब रही। एक सार्थक सकारात्‍मकता। बधाई तीनों को। अब यह मत पूछिएगा कि तीसरा कौन ?

राजीव तनेजा ने कहा… 5 अगस्त 2010 को 9:59 pm

डॉ.सुभाष राय जी को बहुत-बहुत...बहुतायत में बधाई

 
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