न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
सारे जहां में हो रही रुसवाई है।

’सारे जहां से अच्छा’ गाते रहे हैं हम
अतीत के गौरव को मिट्टी में मिलाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

लूटमार, बलात्कार रोज बढ़ रहे हैं
कानून भी अपराधी को सज़ा दे न पाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है।

दल बदल रहे हैं कुर्सी के वास्ते सब
निज स्वार्थ के लिए सब लड़ रहे लड़ाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

जाने कहां गए वे जो वतन पे जान देते थे
आज तो पद के लिए हो रही आपाधाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

गैरों के ज़ुल्म सहते, शिकवा न था किसी से
अपनों के ज़ुल्म देखकर, रूह थर्राई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

अंधेरों से उजालों में खतरे का डर है ज्यादा
मंदिरों में भी ज़िन्दगी खून से नहाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

दहेज वास्ते बहुएं सताई जाती हैं
अपनों के द्वारा ही नारी गई जलाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

नारी पे ज़ुल्म करके, मर्दानगी दिखाते
किस धर्म ने यह क्रूरता सिखाई है?
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

आज़ाद देश में नारी पे ज़ुल्म होते क्यों?
हमारे देश की यह कौन सी बड़ाई है?
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

गुजरात और कश्मीर में लाशें पटी हुई हैं
खुदा बचाओ अब जान पर बन आई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

चारो तरफ है दहशत, सुरक्षित नहीं कहीं?
हत्यायें देख-देख ज़िन्दगी खुद पे लजाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
रमा द्विवेदी
ग्राम पाटनपुर, जिला हमीरपुर, उत्तर प्रदेश, भारत

2 comments:

Coral ने कहा… 17 अगस्त 2010 को 3:39 pm

चारो तरफ है दहशत, सुरक्षित नहीं कहीं?
हत्यायें देख-देख ज़िन्दगी खुद पे लजाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?


bahut sahi bat kahi hai aap ne ...

क्या मायिने है ऐसे आज़ादी के ?

mala ने कहा… 28 अगस्त 2010 को 11:41 am

बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति

 
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