(एक)

हवा में घुला हुआ ये जहर क्यों है
फरेब के जैसा मेरा शहर क्यों है

भोला दीखता है उसके चहरे जैसा-
हालात साजिशों की तरह मगर क्यों है

फूल भी है, शबनम भी, गुलाब भी-
किसी के नसीब में हरदम पत्थर क्यों है

आँखों में जिसने उम्र भर सहेजा था आसमां-
कटे हुए आज उसी के पर क्यों है

उठ रही है आंधियां बिखर रहा है कुछ-
बनबास के जैसा आज यह घर क्यों है

रात भर ये दुनिया आराम से सोती है-
मेरे दिल में वेचैनी हर पहर क्यों है

नाव टूटी हुई मुझे तैरना नहीं मालूम-
नदी के प़र फिर उसका घर क्यों है

(दो)

न उसका ख़त आया न खबर आयी
किसे न मार डाले भला ऐसी तन्हाई

मेरे गम का कुछ हिसाब न पूछो यारो -
नाम सुना जो उसका तो आंख भर आयी

वही थी या मेरी आँखों का भरम था वह-
उसके छत पर जो दिखी धुंधली परछाई

सुबह, दोपहर या शाम मत कहना-
उसकी खुशबू आँखों में हर पहर आयी

एक उम्र तक बस रतजगा करता रहा-
उसकी याद सपनों में ऐसे लिपटकर आयी

हाँ मेरी कब्र ने आह भरी थी उस दिन-
फूल चढाने वो इसतरह सज-संवरकर आयी ।


() बसंत आर्य
http://thahakaa.blogspot.com/

1 comments:

निर्मला कपिला ने कहा… 10 सितंबर 2010 को 9:46 pm बजे

दोनो गज़लें बहुत अच्छी लगी। धन्यवाद।

 
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