आज हम एक ऐसे व्यक्तित्व का साक्षात्कार प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जिनकी मौन साधना हिंदी चिट्ठाकारी में आगे-आगे चलती है और सारे स्वर-व्यंजन के साथ समय पीछे-पीछे चलता है. एक ऐसा चिट्ठाकार जिन्हें साईंस ब्लोगर असोसिएशन ने "ब्लोगर ऑफ दि ईयर" का खिताब दिया , संवाद डोट कोंम ने संवाद सम्मान से नवाजा और पिछले वर्ष परिकल्पना ब्लॉग विश्लेषण के अंतर्गत हिन्दी के नौ श्रेष्ठ चिट्ठाकारों में शामिल किया गया . जब मैंने उनसे ब्लोगोत्सव हेतु साक्षात्कार लेने की कोशिश की तो उन्होंने पहले मना कर दिया क्योंकि वे अपनी पहचान जग-जाहिर नहीं होने देना चाह रहे थे . जब मैंने उन्हें यह भरोसा दिलाया कि इस उत्सव में केवल आपके विचार ही प्रदर्शित किये जायेंगे कहीं भी आपके व्यक्तिगत विवरण नहीं दिए जायेंगे तब कहीं वे इस साक्षात्कार हेतु अपनी सहमति दी . प्रस्तुत है हिंदी चिट्ठाकारी के प्रखर साधक श्री उन्मुक्त से हिंदी चिट्ठाकारी की दिशा-दशा पर हुई मेरी बातचीत के मुख्य अंश-

(१) हिंदी ब्लोगिंग की दिशा दशा पर आपकी क्या राय है?


हिन्दी चिट्ठाकारी परिपक्व होती जा रही है। लेकिन जरूरत है अधिक विषयों पर लिखने की - जैसे तकनीक, चिकित्सा, विज्ञान, मैनेजमेन्ट। अभी भी, अधिकतर चिट्ठियां, कविताओं और विविध तक ही सीमित हैं। जरूरत है अन्तरजाल पर हिन्दी के ऐसे लेखों कि यदि लोग किसी विषय पर सूचना ढ़ूंढ़ना चाहें तो वे हिन्दी में ढ़ूंढ़े न कि अंग्रेजी में और वे मिल सकें। इसका अभी आभाव है। मैं भी अपने लेखों के लिये अंग्रेजी में सूचना ढूंढ़ता हूं न कि हिन्दी में।

(२) आपकी नज़रों में हिंदी ब्लोगिंग का भविष्य कैसा है?

उज्जवल।

(३) हिंदी के विकास में इंटरनेट कितना कारगर सिद्ध हो सकता है?

बहुत कुछ। इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है जहां कोई भी, कम खर्च में, अपनी बात सबके सामने ला सकता है। हिन्दी मातृ भाषा होने के कारण किसी अन्य भाषा से ज्यादा आसानी से समझ में आती है।

(४) आपने ब्लॉग लिखना कब शुरू किया और उस समय की परिस्थितियाँ कैसी थी?

मैं तीन चिट्ठे उन्मुक्त , छुटपुट , और लेख नाम से लिखता हूं।

उन्मुक्त में अपनी बातों को, कड़ियों में पिरो कर लिखता हूं। छुटपुट में अन्तरजाल या कहीं अन्य रोचक सूचना को बताने का प्रयत्न करता हूं और लेख पर उन्मुक्त चिट्ठे पर श्रंखला में लिखी बातों को एक जगह सम्पादित करके रखता हूं।
मैंने सबसे पहले चिट्ठी 'अभिनेता तथा गायक' नाम से २७ फरवरी २००६ नाम से लिखी। उस समय कम लोग लिखते थे। आजकल अक्सर हो जाने वाले व्यक्तिगत विवाद भी कम थे। अब यह संख्या भी बढ़ गयी है और विवाद भी।

(५) आपके हिन्दी चिट्ठाकारी में आने के बाद क्या अच्छे कार्य हुए और आगे क्या होना चाहिये?

मेरे विचार से जब से मैंने लिखना शुरू किया तब से सबसे अच्छी बात यह हुई कि हिन्दी फीड ऐग्रेगेटर की संख्या बढ गयी। किसी भी हिन्दी चिट्ठे का बहिष्कार किया जाय अथवा नहीं यह अपने में मुश्किल सवाल है। लोगों में गलत सही के बारे में अलग अलग विचार हैं। हिन्दी फीड एग्रेगेटर की संख्या बढ़ने से यह विवाद समाप्त सा हो गया है।

हिन्दी चिट्टाकारी को ऊपर आने के लिये जरूरत है एक अच्छे चिट्टाचर्चा के मंच की। इसका इस समय अभाव है। इसमें भी जरूरत है कि विषयानुसार चिट्ठाचर्चा हो। अंग्रेजी में इस तरह के कई बेहतरीन मंच हैं पर हिन्दी में नहीं।

मेरे विचार से चिट्टाचर्चा के मंच का संपादन वह व्यक्ति अच्छा कर सकता है जो स्वयं खुद चिट्टा न लिखता हो।

(६) आप तो स्वयं साहित्यकार हैं, एक साहित्यकार जो गंभीर लेखन करता है उसे ब्लॉग लेखन करना चाहिए या नहीं?

आपने मुझे साहित्यकार कहा इसके लिये धन्यवाद। लेकिन मैं साहित्यकार नहीं हूं। हांलाकि मैंने अंग्रेजी में दो पुस्तकें लिखीं है। पहली में अखबारों में छपे मेरे लेख हैं, जिनमें मेरे अनुभवों, उनकी विविधता का वर्णन है और दूसरी विश्वविद्यालय स्तर पर चलने वाली पुस्तक है।

मेरे विचार से साहित्यकारों को ब्लॉग लेखन करना चाहिये। इस समय भी, अंग्रेजी के साहित्यकार ब्लॉग लेखन कर रहे हैं। वे इस माध्यम से अपनी रचनाओं के बारे में लोगों को बता रहे हैं। अभी वे इसका प्रयोग विज्ञापन की तरह से कर रहें हैं।

ब्लॉग पर साहित्य रचना कम हो रही है। इसका कारण इससे पैसा न कमा पाना और कॉपीराइट का आसानी से उल्लंघन है। जिस दिन इसमें अच्छा पैसा मिलना शुरू हो जायगा और कापीराइट की चोरी के रोकने का उपाय हो सकेगा तब यह भी शुरू होगा।

नयी पीढ़ी पुस्तकें कम और अन्तरजाल पर अधिक विश्वास करती है। उसी पर सहूलियत महसूस करती है। आने वाले समय में, अन्तरजाल का महत्व बढ़ेगा ही। इस लिये, मेरे विचार से, अन्तरजाल पर साहित्य लेखन करना चाहिये।

इसका दूसरा कारण अन्तरजाल पर लिखा ज्यादा समय तक लोगों के बीच रहेगा। पुस्तकें जब प्रकाशन से बाहर हो जाती हैं तब वे गायब हो जाती हैं। अन्तजाल पर लिखा तब तक रहेगा, जब तक वह वेबसाइट रहेगी। यह ज्यादा लोगों के पास भी पहुंचता है,

(७) विचारधारा और रूप की भिन्नता के वाबजूद साहित्य की अंतर्वस्तु को संगठित करने में आज के ब्लोगर सफल हैं या नहीं?

शायद हिन्दी चिट्ठाकारी में तो नहीं। इसमें अभी कुछ समय और लगेगा।


(८) कुछ अपनी व्यक्तिगत सृजनशीलता से जुड़े कोई सुखद संस्मरण / सुखद पहलू /बताएं?

बहुत कुछ लिखा जा सकता है, बहुत कुछ कहा जा सकता है। मेरी पत्नी शुभा ने इसे एक जगह संकलित कर लिखा है। यहां पर अन्य लोगों के द्वारा लिखी गयी कड़ियां भी हैं।
http://munnekimaa.blogspot.com/2006/11/blog-post_28.html

मैंने भी अपने कुछ सुखद-दुखद अनुभव रिश्तों की श्रृंखला 'हमने जानी है रिश्तों में रमती खुशबू' नामक श्रृंखला में यहां संकलित करके रखी है।

http://unmukth.wordpress.com/2009/04/18/relationship/

(१०) परिकल्पना ब्लॉग उत्सव की सफलता के सन्दर्भ में कुछ सुझाव देना चाहेंगे आप?

यह एक बहुत अच्छा कार्य है लेकिन हिन्दी चिट्ठाकार भी मानव हैं, भगवान नहीं। उनमें मानवीय गुण हैं। इस कारण कई अन्य अच्छी पहल, किसी न किसी कारणवश पटरी से उतर गयीं या विवाद में फंस गयीं। जरूरत है एतिहात बरतने की - ताकि यह हर साल चल सके। केवल इसी साल तक सीमित न रहे।

(११) नए ब्लोगर के लिए कुछ आपकी व्यक्तिगत राय?

अच्छा लिखो, अच्छा पढ़ो। यदि हो सके तो अच्छे से लिखे पर प्यारी सी टप्पणी करो।
कूड़ा न ही पढ़ने की जरूरत है, न ही उस पर टिप्पणी करने की, या उनके साथ विवाद पर पड़ने की। वे लोग उलझने के लिये लिखते हैं या चिट्ठियों पर टिप्पणी करते हैं। उसी से उनको ऊर्जा मिलती है। जितना उन पर टिप्पणी करोगे, जितना विवाद करोगे, या उनका जवाब दोगे उतना ही उनका महत्व बढ़ता है। उन्हें नज़र अन्दाज करो।

प्रस्तुति: रवीन्द्र प्रभात
(परिकल्पना ब्लॉग उत्सव के दौरान प्रकाशित साक्षात्कार श्रृंखला की कड़ी के अंतर्गत प्रस्तुत )

3 comments:

रेखा श्रीवास्तव ने कहा… 17 सितंबर 2010 को 12:22 pm

उन्मुक्त जी का साक्षात्कार सार्थक है, बहुत सही कहा है , ब्लॉग्गिंग के लिए - इसको कविता , कहानी और समसामयिक लेखों के अतिरिक्त विभन्न क्षेत्रों से भी जुड़ना चाहिए ताकि वे जानकारियाँ जिन्हें हर व्यक्ति नहीं जानता जान सके. चिकित्सा के क्षेत्र को ही ले लें तो कितने ऐसे प्रश्न होते हैं जिनके बारे में हम सिर्फ सोच पाते हैं उनके कारणों से अनभिज्ञ है और उससे सम्बंधित लोग अनजान होने के नाते पैसे वसूल करते रहते हैं और नतीजा सिफर ही होता है.

ajit gupta ने कहा… 17 सितंबर 2010 को 12:31 pm

साक्षात्‍कार प्रभावी रहा। विषय विशेष के लेखन के लिए तो विषय विशेषज्ञ ही लिख सकते हैं। यदि कोई भी चिकित्‍सा या विज्ञान पर लिखेगा तो वह प्रमाणिक नहीं होगा। हाँ साहित्‍यकारों को साहित्‍य की विभिन्‍न विधाओं के बारे में अवश्‍य विस्‍तार से लिखना चाहिए जिससे आम व्‍यक्ति को जानकारी मिले। आज ब्‍लागिंग पर प्रत्‍येक व्‍यक्ति लिखने का प्रयास कर रहा है और उसमें साहित्‍यकार तो नाम मात्र के ही हैं। इस कारण उनका लेखन विधा विशेष के सांचे में नहीं होता है। इसी प्रकार सामाजिक मुद्दों पर भी आलेख आने चाहिए जिससे युवा पीढी को हिन्‍दी ब्‍लोग से भी सामग्री उपलब्‍ध हो सके।

महेन्द्र मिश्र ने कहा… 17 सितंबर 2010 को 3:53 pm

बढ़िया साक्षात्कार रहा है .उन्मुक्त जी के विचारों को जानने का मौका मिला . ... प्रस्तुति के लिए आभार ...

 
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