जी.के. अवधिया जी एक संवेदनशील, सादे विचार वाले, सरल, सेवानिवृत व्यक्ति हैं । इन्हें अपनी मातृभाषा हिंदी पर गर्व है। आप सभी लोगों का स्नेह प्राप्त करना तथा अपने अर्जित अनुभवों तथा ज्ञान को वितरित करके आप लोगों की सेवा करना ही इनकी उत्कृष्ट अभिलाषा है। इनका प्रमुख ब्लॉग है धान के देश में . प्रस्तुत है हिंदी ब्लोगिंग के संबंध में मेरे द्वारा ओनलाईन पूछे गए कुछ प्रश्नों के सारगर्भित उत्तर -


(१) आपकी नज़रों में साहित्य-संस्कृति और समाज का वर्त्तमान स्वरुप क्या है?

साहित्य सृजन के मूल में सृजनकर्ता के विचार होते हैं। विचार बनते हैं संस्कार से और संस्कार बनते हैं शिक्षा से। अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में हमारे लिये ऐसी शिक्षानीति का निर्माण किया जिससे कि भारतीय अपनी भाषा और संस्कृति की अपेक्षा अंग्रेजी भाषा और संस्कृति को अधिक महत्वपूर्ण समझने लगें। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी हमारे देश की शिक्षानीति लॉर्ड मैकॉले की बनाई गई उसी शिक्षानीति पर ही आधारित रही जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज भी हम अंग्रेजी भाषा और संस्कृति को अपनी भाषा और संस्कृति की अपेक्षा अधिक उत्तम समझकर उन्हीं का अन्धानुसरण कर रहे हैं। इन्हीं सब कारणों से मुझे लगता है कि साहित्य-संस्कृति और समाज का वर्त्तमान स्वरूप अत्यन्त असन्तोषजनक है।

(२) हिंदी ब्लोगिंग की दिशा दशा पर आपकी क्या राय है ?

अंग्रेजी विकीपेडिया के अनुसार अंग्रेजी ब्लोगिंग की शुरुवात दिसम्बर 1997 से हुई; इस प्रकार अंग्रेजी ब्लोगिंग की उम्र लगभग 12 वर्ष है। इन 12 वर्षों में अंग्रेजी ब्लोगिंग निरन्तर विकास करती रही। हिन्दी ब्लोगिंग की शुरुवात लगभग 5-6 वर्ष पूर्व हुई; इसका स्पष्ट अर्थ है कि हिन्दी ब्लोगिंग की उम्र अंग्रेजी ब्लोगिंग की उम्र से लगभग आधी है। किन्तु अपने इन 5-6 वर्ष की अवधि के दौरान हिन्दी ब्लोगिंग में अंग्रेजी ब्लोगिंग जैसा विकास देखने में नहीं आया, बल्कि कहा तो यह जा सकता है कि हिन्दी ब्लोगिंग में नहीं के बराबर ही विकास हुआ। विशाल संख्या में पाठकों को आकर्षित करना अंग्रजी ब्लोग्स की सबसे बड़ी सफलता रही है किन्तु हिन्दी ब्लोगिंग के पाठकों की संख्या आज भी नगण्य है। ऐसा भी नहीं है कि इंटरनेट में आने वाले हिन्दीभाषी लोगों की कमी है; किन्तु इन लोगों को आकर्षित करने में आर्कुट, फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स जितनी सफल रही हैं उतनी हिन्दी ब्लोगिंग नहीं रही। हिन्दी ब्लोगिंग का विकास क्यों नहीं हो पाया यह शोध का विषय है किन्तु अपनी भाषा के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव न होने को ही मैं इसका प्रमुख कारण समझता हूँ। आज भी अधिकतर लोग हिन्दी को अंग्रेजी की अपेक्षा हीन समझते हैं। यह सिर्फ हमारी शिक्षानीति का ही दुष्परिणाम है। हिन्दी ब्लोगिंग को उपयुक्त दिशा प्रदान करने के लिये हिन्दी के प्रति पूर्णतः समर्पित ब्लोगरों को सामने आकर अथक परिश्रम करना होगा।

(३) आपकी नज़रों में हिंदी ब्लोगिंग का भविष्य कैसा है ?

हिन्दी ब्लोगिंग के भविष्य का निर्माण करने वाले हम हिन्दी ब्लोगर्स ही तो हैं! प्रसन्नता की बात है कि हिन्दी के प्रति समर्पित ब्लोगर्स की संख्या में शनैः शनैः वृद्धि होते जा रही है और हिन्दी ब्लोगिंग का भविष्य उज्ज्वल दिखाई दे रहा है।

(४) हिंदी के विकास में इंटरनेट कितना कारगर सिद्ध हो सकता है ?

आज इंटरनेट सामान्य जीवन का अंग बन चुका है; भारत में भी लोग इंटरनेट का अधिक से अधिक प्रयोग करने लग गये हैं। ऐसी अवस्था में यही कहना उचित है कि हिन्दी के विकास में भी इंटरनेट बहुत अधिक कारगर सिद्ध होगा। किन्तु इसके लिये इंटरनेट में हिन्दी के प्रयोग को बहुत अधिक बढ़ावा देना आवश्यक है। शासकीय तथा अन्य महत्वपूर्ण वेबसाइटों में आज भी अंग्रेजी ने ही मुख्य भाषा का स्थान ले रखा है; हिन्दी के विकास के लिये इन समस्त साइट्स का हिन्दी संस्करण होना आवश्यक है। बेहतर तो यह होगा कि भारत के समस्त वेबसाइटों में मुख्य भाषा हिन्दी ही हो।

(५) आपने ब्लॉग लिखना कब शुरू किया और उस समय की परिस्थितियाँ कैसी थी ?

आपके इस प्रश्न के उत्तर देने के पहले मैं यह बताना चाहूँगा कि मैं कवि, लेखक अथवा साहित्यकार नहीं हूँ। हाँ, मेरे पूज्य पिताजी स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया जी का साहित्य के प्रत्येक विधा पर बहुत अच्छा अधिकार था और उनकी रचनाओं का प्रकाशन स्थानीय, प्रादेशिक तथा राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में हुआ है। अक्टूबर सन् 2005 में स्वैच्छिक सेवानिवृति ले लेने के बाद मैं नेट की दुनिया.में कुछ अतिरिक्त आय के उद्देश्य से आया था और अंग्रेजी के कुछ वेबसाइट्स बनाकर मैं कुछ अंश तक अपने उद्देश्य में सफल भी हुआ। आज भी मेरा मुख्य उद्देश्य नेट से अतिरिक्त आय प्राप्त करना ही है किन्तु इसके साथ ही साथ मैं मातृभाषा हिन्दी की सेवा भी करना चाहता हूँ।
अब आता हूँ मैं आपके प्रश्न की ओर। स्टेटिक वेबसाइट और अंग्रेजी ब्लोग के विषय में तो मुझे पहले ही जानकारी थी किन्तु हिन्दी ब्लोगिंग के विषय में मैं सितम्बर 2007 में ही जान पाया। अपने पिताजी स्व। श्री हरिप्रसाद अवधिया जी के हिन्दी उपन्यास "धान के देश में" को इंटरनेट में डालने के उद्देश्य से मैंने इसी नाम से अपना हिन्दी ब्लोग बनाया। चूँकि उस समय मेरा उद्देश्य अपने पिताजी की रचना को ही प्रसारित करना था, इसलिये हिन्दी ब्लोगिंग की उस समय की स्थिति की ओर मेरा ध्यान ही नहीं गया। पिताजी के उपन्यास तथा अन्य रचनाओं के समाप्त हो जाने पर अपने ब्लोग को जारी रखने के उद्देश्य से ही मैंने स्वयं लिखना आरम्भ किया। इस प्रकार से धीरे-धीरे लोग मुझे पहचानने लग गये और मेरे लेखन ने गति पकड़ ली।

(६) आप तो स्वयं गंभीर लेखन करते हैं, जो गंभीर लेखन करता है उसे ब्लॉग लेखन करना चाहिए या नहीं ?

मेरा लेखन कैसा है इस विषय में तो आप सुधी पाठकगण ही बता पायेंगे किन्तु मैं इतना अवश्य कहूँगा कि गम्भीर लेखन करने वाले लेखकों को अवश्य ही ब्लॉग लेखन करना चाहिये। उनके लेखन के गाम्भीर्य से हिन्दी के स्तर में बहुत अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

(७) विचारधारा और रूप की भिन्नता के वाबजूद साहित्य की अंतर्वस्तु को संगठित करने में आज के ब्लोगर सफल हैं या नहीं ?

विचारधारा और रूप कि भिन्नता तो प्रत्येक काल में रही है किन्तु साहित्य की अंतर्वस्तु का संगठन होता ही आया है। हमारे अधिकतर हिन्दी ब्लोगरों की शिक्षा हिन्दी माध्यम में न होकर अंग्रेजी माध्यम में ही हुई है फिर भी वे हिन्दी ब्लोगिंग कर रहे है। यह सिद्ध करता है कि वे अवश्य ही साहित्य की अंतर्वस्तु को संगठित करने में सफल होंगे।

(८) आज के रचनात्मक परिदृश्य में अपनी जड़ों के प्रति काव्यात्मक विकलता क्यों नहीं दिखाई देती ?
मैं पहले कह चुका हूँ कि मैं कवि नहीं हूँ इसलिये हो सकता है कि मैं इस प्रश्न का उत्तर अच्छी तरह से न दे पाऊँ। कवि न होने के बाद भी मैंने बहुत से काव्यों को पढ़ा है और मुझे यही लगा है कि काव्यात्मक विकलता हृदय के भीतर से उपजती है। बहेलिये के द्वारा मैथुनरत क्रौञ्च पक्षी के जोड़े में से नर क्रौञ्च के वध और उसके पश्चात् मादा क्रौञ्च के विलाप ने महर्षि वाल्मीकि के हृदय को इतना अधिक आंदोलित किया कि "रामयाण" के रूप में उनकी काव्यात्मक विकलता फूट निकली। आदिकवि वाल्मीकि और गोस्वामी श्री तुलसीदास जी की "उर्मिला" के प्रति उपेक्षा ने राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त जी के हृदय को ऐसा प्रभावित किया कि उनकी काव्यात्मक विकलता ने "साकेत" का रूप धारण कर लिया।
आज भी काव्यात्मक विकलता अवश्य दिखाई दे सकती है यदि हमारे कविगण भावनाओं की सतह तक ही सीमित न रह कर उनकी गहराइयों में डुबकी लगाने का प्रयास करें।

(९) आपकी नज़रों में चिट्ठाकारी संवेदना का मुख्य आधार क्या होना चाहिए ?

मेरी राय में चिट्ठाकारी संवेदना का मुख्य आधार नेट में हिन्दी भाषा का सम्पूर्ण विकास ही होना चाहिये।

(१०) आज के लेखन की आधुनिकता अपनी देसी जमीन के स्पर्श से वंचित क्यों है?

हजारों वर्ष की परतन्त्रता के कारण हम अपनी संस्कृति को भुलाते चले आये हैं और जो थोड़ी सी संस्कृति शेष है उसे हमारी विदेश आधारित शिक्षानीति विनष्ट किये जा रही है। हमारी कुशिक्षा ने हमें अपने जमीन से बहुत दूर कर रखा है यही कारण है कि आज के लेखन की आधुनिकता अपनी देसी जमीन के स्पर्श से वंचित है।

(११) क्या हिंदी ब्लोगिंग में नया सृजनात्मक आघात देने की ताक़त छिपी हुई है ?

अवश्य!

(१२) कुछ अपनी व्यक्तिगत सृजनशीलता से जुड़े कोई सुखद संस्मरण बताएं ?

सेवानिवृति से पूर्व लेखन में कभी रुचि रही ही नहीं पर आज आपने मुझे साक्षात्कार के योग्य समझा यही मेरे लिये सुखद अनुभूति है।

(१३) कुछ व्यक्तिगत जीवन से जुड़े सुखद पहलू हों तो बताएं ?

व्यक्तिगत जीवन से जुड़ बहुत सारे सुखद पहलू हैं तो अवश्य, किन्तु इतने उल्लेखनीय भी नहीं हैं कि यहाँ पर उनका उल्लेख हो।

(१४) परिकल्पना ब्लॉग उत्सव की सफलता के सन्दर्भ में कुछ सुझाव देना चाहेंगे आप ?

आप जैसे लगने के पक्के और उत्साही व्यक्ति का आयोजन तो सफल होकर ही रहेगा। फिलहाल तो नहीं किन्तु जब कभी भी आवश्यकता प्रतीत होगी अवश्य ही अपना सुझाव प्रस्तुत करूँगा।

(१५) नए ब्लोगर के लिए कुछ आपकी व्यक्तिगत राय?

केवल इतना ही कि मातृभाषा हिन्दी के प्रति समर्पित भाव से ब्लोगिंग करें। सभी नये ब्लोगर की सफलता के लिये मेरी शुभकामनाएँ!

प्रस्तुति: रवीन्द्र प्रभात

2 comments:

निर्मला कपिला ने कहा… 19 सितंबर 2010 को 10:32 pm

ावधिया जी को हम जानते तो हैं मगर आज और अधिक जानकारी पा कर बहुत खुशी हुयी। उनको पढना हमेशा ही अच्छा लगता है। आवधिया जी को शुभकामनायें और आपका आभार।

बेचैन आत्मा ने कहा… 19 सितंबर 2010 को 11:04 pm

प्रेरक वार्ता

 
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