आपके आशीष से ,तालीम से और ज्ञान से
उपदेश से ,उसूल से , सार और व्याख्यान से

अप्रमाण जीवन को मिली परिधि नई,नव दिशा
श्वेत मानस पटल पर स्वरूप विद्या का धरा

डगमगाते कदम को नेक राह दी,आधार दिया
संकीर्ण ,संकुचित बुद्धि को अनंत सा विस्तार दिया

पहले सेमल से कपास पश्चात कपास को सूत कर
रूई को आकृति एक और बाती सा सुन्दर नाम दिया

कभी आचार से ,सदाचार से ,कभी नियम-दुलार से
उद्दंडता को दंड देकर हमे विकसित किया,आयाम दिया.

निर्लोभ रह देते रहे सब , न कुछ अभिलाषा रही
पात्र जीवन मे सफल हो शायद यही आशा रही

आपके ऋण से उऋण किसी हाल हो सकते नहीं
कुछ शब्द मे अनुसंशा कर जज़्बात कह सकते नहीं

गुरुवर मेरे सिर पर पुनः आशीषमय कर रख दीजिये
“दीपक “जले सूरज जैसा इतना प्रकाश भर दीजिये !

()कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.com/

4 comments:

aaditiya kiran ने कहा… 5 सितंबर 2010 को 9:05 am

easi nazm na padi na suni kabhi...kiya baat hai ...wah wah
aaditiya

mala ने कहा… 5 सितंबर 2010 को 1:14 pm

बहुत सुन्दर विचार , आभार !

गीतेश ने कहा… 5 सितंबर 2010 को 1:21 pm

बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति है यह, अच्छा लगा पढ़कर

पूर्णिमा ने कहा… 5 सितंबर 2010 को 1:25 pm

सुन्दर और सारगर्भित अभिव्यक्ति

 
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