पहले मिलवा चुका हूँ आपको हिंदी ब्लोगिंग के कई महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों से , किन्तु अब जिस व्यक्तित्व से आपको मिलवाने जा रही हैं रश्मि प्रभा वे आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर जी के विशेष सहयोगी हैं और .......जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने वाले एक जिंदादिल इंसान , नाम है सुमन सिन्हा , पटना में रीजेंट सिनेमा के स्वामी .......



आज जीवन के व्यापार से जुड़े श्री सुमन सिन्हा से मैं आपको रूबरू करवाती हूँ . बचपन के कोमल मन की लकीरें, दृढ़ता कैसे बनती हैं, किस तरह अच्छे-बुरे दोनों किनारों के मध्य से व्यक्ति अपनी दिशा निर्धारित कर्ता है, इसका एक सशक्त उदहारण हैं सुमन सिन्हा . आज ये पटना के चर्चित सिनेमा घर 'रीजेंट' के मालिक हैं , जिसकी नीव इनके दादा स्व.कैलाश बिहारी ने डाली , जिसमें प्राण दिया स्व. सुशील कुमार सिन्हा ने और एक ख़ास उंचाई दी सुमन सिन्हा ने . बचपन से लेकर आज तक की सोच से चलिए हम भी मिलते हैं ----

नमस्ते सुमन जी
-- नमस्ते

आज आपका व्यक्तित्व एक तराशे हुए हीरे की तरह है , चंद सवालों के घेरे से इसकी चमक का राज हम भी जानना चाहेंगे .तो अपने सवालों के तरकश से निकलती हूँ कुछ उत्सुक बाण....................

१--- आपका बचपन कैसा रहा? कहाँ बीता ?

---मेरा बचपन पटना में बीता . बहुत ही ज्यादा असमंजसता में रहा शुरू से . घर के बड़ों की दोहरी नीति और व्यवहारिकता के नाम पर

आपसी छल देख कर एक जिद सी बचपन से ही हो गयी थी -- सच बोलने की.

२.--- रीजेंट पिक्चर हॉल आपके पापा स्व. सुशील कुमार सिन्हा जी की नीव थी , बचपन से वहाँ आते -जाते आपने क्या सोचा उनको और उनके कार्यों को लेकर?

---आज मैं जो भी हूँ , उसके लिए उन्हें श्रद्धा से सब समर्पित करता हूँ .

मेरे लिए वो एक सम्पूर्ण विचारधारा थे .

उनसे क्या नहीं सीखा , -----

प्यार करना हो तो बिना किसी शर्त के ; देना हो तो बिना किसी प्राप्य की उम्मीद के ; सबको सम -भाव से देखना ; अपनी बातों को समझदारी और बेहतर तरीके से रखना ; अपनों से प्यार करना मगर पक्षपात नहीं , अपने निर्णय के साथ आँख मिला कर खड़े रहना ; विकट परिस्थिति में भी शांत रहना ; जो कमज़ोर हैं उनकी आवाज बनना , न कि उसका फायदा उठाना ...


३---इसके विस्तार को लेकर आपने किस तरह अपनी योजना बनाई?

----रीजेंट मेरे लिए एक व्यक्तित्व है .
मैं आज भी रीजेंट की देख भाल एक कार्यकर्ता की तरह ही करता हूँ . मुझे लगता है --- मेरे दादाजी ने , जिन्होंने उसे 1929 में समय से पहले शुरू किया और अपना सब गँवा बैठे , मेरे पिताजी ने परिवार की इस पहचान को बनाये रखने की खातिर हर संभव कदम उठाया , वो दोनों मुझसे कुछ उम्मीद करते हैं .

मेरे दादा जी स्वप्नशील रहे और मेरे पिता ज़मीन से जुड़े एक व्यवहारिक सोचवाले व्यक्ति रहे , मैंने दोनों की ज़िन्दगी के बेहतरीन ख्यालों को अपने भीतर सींचा . मुझे खुद में एक कोलंबस मिला --- और मैं एक ख़ास तलाश में निकल पड़ा विरासत में मिले मजबूत जड़ों को लेकर .

आज रीजेंट एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हॉल बनने जा रहा है .निःसंदेह - बिहार की प्रगति का एक उज्जवल प्रतीक होगा यह !.

४--- 'आर्ट ऑफ़ लिविंग ' से आप कैसे जुड़े?

---मैं कहाँ जुड़ा ? बस गुरूजी ने अपने पास बुला लिया . मैंने उनकी एक किताब ' God Loves Fun ' पढ़ी थी , जिसका अमिट प्रभाव मेरे अंतर और बाह्य पर पड़ा ---

ईश्वर के पास कभी भी अपराध और उसके भय से जाने की ज़रुरत नहीं , इस एक विचार ने मानो सब बदल दिया .

2002 में वो पटना आए , उनसे एक भजन सुना और खींचता चला गया .

५---क्या परिवर्तन आपने महसूस किया श्री रवि शंकर के शिविर में जाकर?

----जीवन एक उत्सव है और हर क्षण महत्वपूर्ण . खुश रहना भी एक प्रार्थना है . कृतज्ञता के भाव से जो है उसे स्वीकारना .
अपने आप को सम्मान से देखना .

६ --- आपके परिवार का क्या सहयोग रहा ? उन्होंने इस दिशा में आपकी सोच के साथ क्या योगदान दिया?
---सब में श्रद्धा थी ही , तो बस एक पवित्र साथ मिल गया .

७---ज़िन्दगी कभी एक राग नहीं गाती , उसके सुर बदलते रहते हैं... आपने इस बदलाव के साथ सामंजस्य कैसे बिठाया ?

---सब हो रहा है , मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ . न कर्ता , ना भर्ता , मैं तो सिर्फ द्रष्टा हूँ .
अक्सर जो लोग आध्यात्मिकता से जुड़ते हैं , वे शरीर और इन्द्रियों का दमन करते हैं , उसे सम्मान नहीं दे पाते .
मगर मैंने इन्द्रियों को और शरीर को ज्ञान के साथ बराबर का स्थान दिया है .
हमारा कुछ भी है क्या ? सारा कुछ ईश्वर का ही दिया है ना ?
८--- ज़िन्दगी के प्रति अपने परिवर्तित दृष्टिकोण के आधार पर आप क्या कहना चाहेंगे नए क़दमों से?

---किसी भी परिस्थिति में घबराना नहीं ." Never tell God how big your problem is,
always tell your problem how BIG your God is. Love you all. "

९--- परिकल्पना उत्सव के विस्तृत आकाश पर जो सितारे बिखरे हैं, उनके लिए तथा उत्सव की कामयाबी के लिए दो शब्द कहें -

----परिकल्पना का हर क्षेत्र का आगाज़ बना है, दूरगामी स्वस्थ परिणामों की संभावनाओं से भरा , 'हिंदी' की आवाज़ बना है , हर विधा के लोगों के संग हाथ मिला रहा है ------ इसकी कामयाबी में संशय कहाँ? इस उत्सव को समय देख रहा है, सुना रहा है, हर काल के परिवेश में ढला है......... बस यही कहूँगा कि ' अच्छे कार्य हर रुकावटों पर विजय पाते हैं ' आमीन !

1 comments:

Udan Tashtari ने कहा… 29 अक्तूबर 2010 को 11:51 pm

अच्छा लगा मिल कर.

 
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