श्री प्रमोद ताम्बट मूलत: लेखक और व्यंग्यकार हैं। इनके व्यंग्यव्यंग्यलोक नामक दो व्यक्तिगत ब्लॉग है। इन ब्लॉगों के अलावा भोपाल एवं देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनके आलेख व व्यंग्य प्रकाशित होते रहते हैं। प्रस्तुत है हिंदी ब्लोगिंग के संबंध में इनका उद्देश्यपूर्ण आलेख-




आलेख :

ब्लॉगिंग को परिवर्तन के हथियार के रूप में ढालने की ज़रूरत है....


बाज़ारवाद के इस निर्मम दौर में जब लोकतंत्र का चौथा खंबा कही जाने वाली पत्रकारिता और मीडियामंडी बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों के हाथों की कठपुतली बनी, दंभपूर्ण बुद्धिजीविता के शिकार पत्रकार-मीडियापुरुषों से घिरी हुई है, ब्लॉगजगत मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवियों के बीच एक किस्म के लोकतांत्रिक स्तंभ के रूप में उभरकर सामने आने की कोशिश कर रहा है, जिसे, यदि चौथे खंबे को कोई ऐतराज़ ना हो तो, बिलाशक पाँचवे खंभे की उपमा दी जा सकती है। हालाँकि यह सच है कि जनसंख्या के लिहाज़ से 'लोक' के पास इस आधुनिक चेतना और सुविधा का, जिसमें कम्प्यूटर नामक एक महँगा यंत्र और इंटरनेट सुविधा आवश्यक रूप से जुड़े हुए हैं, अभाव है, लेकिन फिर भी पत्र-पत्रिकाओं और मीडिया में स्पेस और समय के अभाव में उपेक्षित पड़े रचनाशीलता से लबरेज़ हज़ारों प्रतिभावान सृजनधर्मी महिला-पुरुषों के लिए ब्लॉगजगत अभिव्यक्ति के एक लोकप्रिय माध्यम के रूप में उभरकर सामने आता चला जा रहा है।



हालाँकि ब्लॉगिंग अब भी एग्रीगेटरों के सामूहिक प्लेटफार्म और सर्च इंजनों के भरोसे ही चल रही है फिर भी रोज़ाना लगने वाली पोस्टों और सर्च के आँकड़ों से यह पता लगता है कि बड़ी तादात में लोग तकनीक के इस माध्यम को पसंद कर रहे हैं और सिर्फ इसी वजह से ब्लॉगिंग का महत्व अभिव्यक्ति के दूसरे माध्यमों से बिल्कुल भी कम नहीं आंका जा सकता जिसकी कोशिशें उच्च प्रबुद्ध साहित्यिक तबके की ओर से लगातार चल रही है।



मेरे मत में ब्लॉग जगत की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह विरोधाभासों और टकराहटों से युक्त हर तरह की विचारधाराओं और विधाओं के लिए एक निरपेक्ष प्लेटफार्म सा है। किसी विशाल पुस्तकालय में तो फिर भी पूर्वाग्रहग्रस्त नीतिगत दादागिरी के चलते ठेठ विरोधी विचारधाराओं का साहित्य नदारद मिल सकता है, लेकिन यहाँ इस प्रकार का कोई पूर्वाग्रह थोपा नहीं जा सकता है। किसी भी तरह की एकाकी प्रतिबद्धता अथवा राजनैतिक गुटबंदी से मुक्त इस स्थली पर दरअसल देखा जाए तो अभिव्यक्ति की विभिन्न विधाओं के ज़रिए विचारधाराओं का एक सत्संग अथवा शास्त्रार्थ सा चलता रहता है, जिसका माध्यम विभिन्न एग्रीगेटर बनते हैं। किसी ब्लॉग में अभिव्यक्त विचारों को पढ़ना या ना पढ़ना ब्लॉग प्रेमियों की अपनी पसंद-नापसंद और इच्छा पर निर्भर करता है लेकिन ऐसा नही है कि किसी विचारधारा विशेष की अभिव्यक्ति के लिए यहाँ कोई घोषित किस्म की पाबंदी लागू हो। ऐसे में विचारों के आपसी संघर्ष के ज़रिए 'सत्य' के लिए जगह बनाने का इससे अच्छा माध्यम और क्या हो सकता है। अभिव्यक्ति के अन्य सभी माध्यम पूँजीवादी घरानों और उनकी सत्तामार्गी विचारधारा विशेष के 'माइक' होने के कारण एक ही सुर में आलापते हुए खुद भी गुटों में बँटे हुए नज़र आते हैं और इनके सायास प्रयत्नों के चलते जनसाधारण भी वैचारिक स्तर पर आपस में बँटा हुआ आचरण करता प्रतीत होता है।



ब्लॉग जगत एक ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ तमाम विरोधों के बावजूद नामी-दामी बुद्धिजीवी साहित्यकार भी आने का मोह छोड़ नहीं पा रहे हैं। नौसीखिएँ लिख्खाड़ भी अपने दूध के दाँत यहीं आकर मजबूत कर रहे हैं। यहाँ संघवालों को भी खुली छूट है कि वे अपने राष्ट्रवादी विचारों को प्रचारित करें और वामपंथियों को भी मार्क्सवाद का झंडा फहराने की इजाज़त है, दलित भी यहाँ अपनी आवाज़ स्वतंत्रतापूर्वक उठा सकते हैं, ब्राम्हण-मनुवादी भी अपनी भड़ास निकाल सकते हैं। जात, पात, भाषा, प्रांत के बंधन से मुक्त हर प्रकार का विचार यहाँ स्वतंत्रतापूर्वक अपनी दस्तक दे सकता है। हिन्दी ब्लॉगों पर ही नहीं बल्कि अन्य भाषाओं के ब्लॉगों पर भी सृजनप्रेमी पूरी शिद्दत से कार्टून, कविता, कहानी, व्यंग्य, ग़जल, रिपोर्ताज, यात्रा वर्णन, यहाँ तक कि पूरा का पूरा उपन्यास लेकर भी उपस्थित हैं। कई ब्लॉगों में देशभर में स्थानीय स्तर पर चल रहीं गतिविधियों, सत्ता संस्थानों में चल रही हलचलों, कला-संस्कृति के क्षेत्र की घटनाओं आदि की एकदम ताज़ा-ताज़ा रिपोर्टिंग भी देखी जा सकती है। तू-तू मैं-मैं गाली-गलौज, टाँग खिचाई, वस्त्रलोचन, आदि-आदि का 'रचनात्मक' कार्यक्रम भी खूब चलता रहता है। तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, गंडा-ताबीज से लेकर धार्मिक विचारों और घृणा का प्रचार-प्रसार भी यहाँ जोर-शोर से किया जाता रहता है। अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता दूसरे किसी माध्यम में उपलब्ध नहीं है। देखा जाए तो यह घातक भी है और फायदेमंद भी। जहाँ विचारों के प्रदूषण से पीढ़ियों का भविष्य बिगाड़ने की सम्पूर्ण व्यवस्था भी यहाँ उपलब्ध है वहीं सामाजिक दृष्टि से प्रगतिशील विचारधाराओं के लिए काम करने और विचारों की श्रेष्ठता स्थापित करने का एक सुनहरा मौका भी उपलब्ध है। यदि सही मायने में प्रगतिशील विचारधारा, सचेत रूप से, वैज्ञानिक कला-कौशल और प्रतिबद्धता के साथ अराजक से प्रतीत होने वाले इस ब्लॉग मंच पर गतिशील होती है तो नतीजे उत्साहजनक प्राप्त हो सकते हैं। लेकिन वर्तमान में ब्लॉगजगत में प्रगतिशील वैचारिक आन्दोलन के संगठित प्रयासों का सर्वथा अभाव दिखाई देता है, यह व्यक्तिवादी चिंतन और प्रयोजन के अड्डे के रूप में एक नामालूम दिशा में बढ़ता चला जा रहा प्रतीत होता है जहाँ अधिकांश फुरसतिए किस्म के लोग महज़ अपनी छपास की खाज को शांत करने के लिए सक्रिय प्रतीत होते हैं।



एक और समस्या ब्लॉगिंग में देखने में आ रही है। लोग खूब लिख रहे हैं, नया-नया और अनोखा लिख रहे हैं, यानी अभिव्यक्ति तो खूब हो रही है मगर पढ़ने-लिखने की लगातार कम होती चली जा रही आदतों के कारण ब्लॉगों पर प्रकाशित ज़्यादातर सामग्री अनपढ़ी रहती है। सुधी पाठकों का अभाव यहाँ काफी खलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि लिखने वाले तक कुछ पढ़ नहीं रहे हैं। लोकप्रिय ब्लॉग एग्रीगेटरों पर कई बार देखने में आता है कि कई बहुत अच्छी पोस्टों को महज़ दो या चार बार और घटिया पोस्टों को काफी तादात में खोला जाता है। हल्के विषयों, घटिया चर्चाओं, अश्लील, सनसनीखेज़ विषयों को लेकर उपस्थित पोस्टों को खूब पाठक मिलते देखे जाते हैं और उन पर टिप्पणियों की भी बहुतायत देखी जाती है। एक गुटबंदी सी चलती प्रतीत होती है, लोग अपने-अपने गुट के सदस्य की पोस्टों पर धड़ाधड़ टिप्पणियाँ भेज कर ऊलजलूल बकवास का भी समर्थन करते दिखाई देते हैं। महिला ब्लॉगरों के ब्लॉगों पर टिप्पणियों का ढेर दिखाई देता है, भले ही वे नारी विमर्श के महत्वपूर्ण विषयों को दरकिनार कर नीरा कचरा लेकर उपस्थित हों। जबकि कई पुरुष ब्लॉगर बेचारे सामाजिक सरोकारों के साथ उपस्थित होने के बावजूद एक टिप्पणी को भी तरसते दिखाई देते हैं। यह एक चिंता का विषय है कि पाठकों में उन्नत अभिरुचि के निर्माण और विकास के साथ-साथ एक प्रगतिशील वैचारिक माहौल का निर्माण करने में ब्लॉगजगत अपनी भूमिका संजीदगी से नहीं निभा पा रहा है, मौजूदा समय में अभिव्यक्ति के किसी भी सजग माध्यम का जो कि अन्तिम ध्येय होना चाहिए।



ब्लॉगिंग को खेल समझकर रात-दिन धड़ाधड़ पोस्टों और टिप्पणियों के उत्पादन में लगे तमाम उत्साही लोगों को एक बात और समझना बेहद ज़रूरी है जिसकी कमी से हिन्दी ब्लॉगिंग जगत बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधकचरे अपरिपक्व रूप से स्वच्छंद उपयोग कर लेने का कोई ऐतिहासिक लाभ नहीं है। यदि कोई विधा अपने मानदंडों पर खरी नहीं उतरती है तो यह पाठकों के लिए रसास्वादन में बाधा उत्पन्न करती है। जैसे, कविता लिखी जा रही हो, वह भले ही छंद मुक्त आधुनिक कविता हो, मगर उसमें कोई लय न हो तो पाठक दो से तीसरी लाइन नहीं पढे़गा। कविता, गज़ल, यदि महत्वपूर्ण कथ्य के साथ-साथ शास्त्रीय अर्थों में अपने शिल्प में नहीं है तो पाठक उसे कतई पसंद नहीं करेगा। इसी तरह अन्य विधाओं में भी रचना की संप्रेक्षणीयता उसके गठन पर काफी कुछ अवलंबित होती है। व्यंग्य में यदि व्यंग्य ना हो, कहानी यदि कहानी की रोचकता में आबद्ध होकर प्रस्तुत नहीं होती, निबन्ध यदि निबन्ध के समस्त तत्वों को अपने साथ समेटे नहीं होता तो इन्हें समुचित पाठक मिलना और इनका प्रशंसित होना नामुमकिन है।



ब्लॉगजगत में ऐसे कई रचनाकार हैं जो शिल्प और भाषा के अभाव में एक प्रकार के निरर्थक थोक उत्पादन में लगे हुए हैं। भाषा के उच्च साहित्यिक मानदंडों को यदि नज़रअन्दाज भी कर दिया जाए तब भी किसी भी रचना की ग्राह्यता बढ़ाने के लिए कम से कम भाषा की शुद्धता का ध्यान तो रखना ही पडे़गा। ब्लॉगजगत में देखा जाता है कि बेहद त्रृटिपूर्ण भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है जो कि ब्लॉगजगत के विकास के लिए बेहद बाधक है। ऐसे महारथियों की बाकायदा ट्रेनिंग होना बेहद ज़रूरी है और ब्लॉगजगत को संगठित रूप से ऐसे आयोजन भी हाथ में लेते रहना चाहिए। हालाँकि मेल-मिलाप के प्रयोजन से देश में कई जगह ब्लॉगर बंधु एकत्र होते रहते हैं लेकिन इन आयोजनों में ब्लॉगजगत की दशा और दिशा पर वैचारिक चर्चा शायद ही आहूत की जाती हो। ब्लॉगर बंधु हँसी-ठट्ठा लगाकर, खा-पीकर अपने घर चलते बनते हैं और महीनों अपने-अपने ब्लॉगों पर इस घटना की निरर्थक चर्चा चलाते रहते हैं। कोई ठोस परिणाम ऐसे ब्लॉगर सम्मेलनों का निकलते नहीं देखा जाता है।



सबसे महत्वपूर्ण बात! देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक परिस्थितियों से ब्लॉगजगत में सक्रिय बुद्धिजीवी वर्ग परिचित नहीं है, यह कहना मूर्खता पूर्ण होगा। भारतीय समाज पतन के भयानक दौर से गुज़र रहा है। नीति-नैतिकता का दयनीय ह्नास हो रहा है। स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे के मूल्यों का लोप होकर फासीवादी संस्कृति का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। सत्ता संस्थान भष्टाचार के अड्डे बनते जा रहे हैं। इसी के समानान्तर आम जनसाधारण में श्रद्धा-आस्था के नाम पर अंधविश्वास और अवैज्ञानिक चिंतन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। दुनिया के एक हिस्से में जब बिग बैंग/महाविस्फोट की परिस्थितियों की रचना कर ब्रम्हांड की उत्पत्ति का राज़ जानने की महान कोशिशें चल रहीं हैं, भारतीय समाज अपने सामंती दौर की कुप्रथाओं, असत्य धारणाओं को मजबूत करने में लगा हुआ है। हालाँकि इस विषय विशेष की विवेचना के लिए यह आलेख नहीं लिखा गया है परन्तु जब हम इन सब बिन्दुओं पर ध्यान देते हैं तो पाते हैं कि वैज्ञानिक चिंतन पद्धति के आधार पर सचेत प्रतिक्रियाओं के ज़रिए ही इन सब परिस्थितियों से मुकाबला किया जा सकता है। समाज में हर स्तर पर विशेषकर शिक्षा-संस्कृति-साहित्य के क्षेत्र में इस सचेत प्रतिक्रिया की खास ज़रूरत है। ब्लॉगिंग का क्षेत्र भी भूमिका के मुद्दे पर इस महती आवश्यकता से मुक्त नहीं रखा जा सकता। हालाँकि कुछेक ब्लॉगों पर पर्याप्त संजीदगी के साथ उच्च रचनात्मक मानदंडों को कायम रखते हुए कलात्मक अभिव्यक्ति के ज़रिए अच्छा काम किया जा रहा है फिर भी अधिकांश लोगों को यह समझना जरूरी है कि एक प्रभावशाली माध्यम में निहित संभावनाओं को सतही, अगम्भीर किस्म की चुहलबाज़ी के ज़रिए ज़ाया नहीं किया जाना चाहिए।



इस स्थिति से निकलने के लिए ब्लॉगरों के बीच ऐसे चिन्तन शिविरों की महती आवश्यकता है जहाँ ब्लॉगर अपनी भूमिका को समझ सकें, और अपनी रचनात्मक कमियों-खामियों को दूर करने के लिए आवश्यक ज्ञान भी जुटा सकें, और वे ब्लॉगर जो कलम के तो धनी है परन्तु वैचारिक स्तर पर कोई खास उल्लेखनीय भूमिका नहीं निभा पाते, सामाजिक जागृति की दिशा में अपनी कलम का उपयोग नहीं कर पाते, उनको लाभ हो और ब्लॉगिंग एक रचनात्मक प्रगतिशील आन्दोलन के महत्वपूर्ण हथियार के रूप में विकसित हो सके।



मैं जानता हूँ कुछ ब्लॉगर मेरी इस बात से असहमत हो सकते हैं जो यह सोचते हैं कि ब्लॉगिंग को किसी विचारधारा (जबकि मैंने किसी विचारधारा की हिमायत नहीं की है।) के दायरे में नहीं जकड़ा जाना चाहिए। वैचारिक स्तर पर ढुलमुल रवैया रखने वाले कुछ लोगों को इसमें तुरंत राजनीति की बू आने लगेगी। मेरा उनसे कहना है कि अभिव्यक्ति के गोरखधंधे में उलझा कोई भी सज्जन या दुर्जन व्यक्ति, वह चाहे या ना चाहे, जाने अनजाने में किसी ना किसी विचार को अपने साथ ढोया करता है। अगर वह मौजूदा कठिन सामाजिक परिस्थितियों से मुक्ति का विचार नहीं है तो फिर वह निश्वित रूप से किसी भी रूप में हो, उन सब परिस्थितियों के मूक समर्थन का विचार होगा जिनका ज़िक्र मैंने ऊपर किया है। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो वर्तमान में ब्लॉग जगत यथास्थितिवाद के भँवर में फँसा हुआ गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाए चलता हुआ दिखाई दे रहा है। इसे इस स्थिति से निकालकर परिवर्तन के एक ताकतवर हथियार के रूप में ढालने की महती आवश्यकता है तभी तकनीक के इस लोकप्रिय और प्रभावशाली माध्यम की सही उपयोगिता साबित हो सकेगी।

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5 comments:

honesty project democracy ने कहा… 7 नवंबर 2010 को 12:02 pm

आज के सन्दर्भ में ब्लोगिंग के असल मकसद को दिशा निर्देशित करती सर्वश्रेष्ठ पोस्ट ..........शानदार विचार... मैं हार्दिक रूप से इसका समर्थन करता हूँ.....

संगीता पुरी ने कहा… 7 नवंबर 2010 को 1:02 pm

बहुत ही बढिया आलेख .. ब्‍लॉगिंग के माध्‍यम से एक स्‍वस्‍थ और सार्थक आंदोलन चलाया जा सके .. इससे अच्‍छी बात क्‍या हो सकती है ??

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा… 7 नवंबर 2010 को 1:44 pm

बहुत खरी और विचारणीय बातें कही हैं आपने। निश्चित रूप से अब हमें जिम्मेदार हो जाना चाहिए। सकारात्मक दृष्टिकोण से समाजोपयोगी लेखन करके ही हम इस माध्यम की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं।

वर्धा विश्वविद्यालय ने इस दिशा में ठोस कदम उठाने का काम किया है।

कविता रावत ने कहा… 7 नवंबर 2010 को 2:38 pm

बहुत ही बढिया आलेख ..

निर्मला कपिला ने कहा… 8 नवंबर 2010 को 11:52 am

ाच्छा लगा आलेख। धन्यवाद।

 
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